सुनो हिन्दुस्तानियों, अब इसे सुनना बेहद लाज़िमी है तुम्हारे लिए, अगर वाक़ई एक नाली में पलते कीड़े नहीं हो तुम. लेकिन सिर्फ मीठा- मीठा, सभ्य-सभ्य, नैतिक-नैतिक और शालीन-शालीन ही सुनना चाहते हो अगर तो फ़ौरन बंद कर दो इस खिड़की को, जाओ और विरह/मिलन की कविताएं सुनो कहीं, या अध्यात्म/सूफ़ियत की नाज़ुक-नाज़ुक पंक्तियों से ख़ुद को शुद्ध करो, मेरे लिए अब उसका वक़्त पीछे छूट चुका है.
जो मैं कहने जा रहा हूँ वह सुनने में कड़वा, नफ़रत से लबरेज और कहीं-कहीं असभ्य भी लगेगा तुम्हारे 'संस्कारी' कानों को, लेकिन सभ्यता को जूते की नोंक पर रखना उन लम्हों के लिए ज़रूरी हो जाता है, जब इंसान के तौर पर जीने और मरने के मायने भी कोई पूरी तरह बर्बर, असभ्य, वहशी और दरिंदगी से भरे हैवान तय करने लगें. अब भी अगर इसे सुन सकने का हौसला और जज़्बा है तुम्हारे पास तो आगे सुनो.
तुम लाख 'हाय सिकुलर-हाय वामपंथी-हाय कांग्रेसी-हाय जेहादी' रोते-पीटते रहो, तुम्हारे मां बाप/बेटे /बेटी /भाई/बहन यूं ही मरते-कटते बम विस्फोट में चिथड़ा-चिथड़ा होते रहेंगे, और उसके बाद उनकी लाशों के टुकड़े बटोरते तुम अपनी आंखों में ख़ून और सीने में आग भरे ऐसे ही तड़पते रहोगे 25-25 सालों तक - किसलिए?
सिर्फ इसलिए कि उसके बाद अदालत दर अदालत गुज़रता वह मुक़द्दमा पूरी पीढ़ी के बाद एक दिन सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचेगा - वह 'सर्वोच्च न्यायालय' जिसे इस मुल्क़ की सबसे बड़ी अदालत होने की ताक़त और रुतबा हासिल है. और उस मुक़द्दमे से जुड़े एक-एक सबूत और गवाही को एक नहीं पचास-पचास बार खंगालने के बाद, लंबी-लंबी बहसों के सालों तक खिंचे दौरों के बाद, पूरे मामले की हर पेचीदग़ी को बेहद बारीक़ी से परखने के बाद जब सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुंचेगा कि उसके आरोपियों में से गिरफ्तार एक दोषी की वहशियत इतनी नीच है कि न्याय होने के लिए उसे सज़ा-ए-मौत दिया जाने के सिवा कोई चारा नहीं, तब तुम्हारे सिर के ऊपर बैठे कुछ शदीद वहशियत से भरे ज़हरज़ेहन बौद्धिक हरामज़ादे सामने आएंगे.
ये वो लोग हैं जो ख़ुद अपनी गर्दन में 'जनवादी वामपंथी / क्रांतिकारी' के शातिर और फ़रेबी तमग़े और उपाधियाँ लटकाते हैं, और अपनी पूरी वैचारिक कमीनगी, बेग़ैरती ओर बौद्धिक हरमज़दगी का बिल्कुल नंगा, अश्लील, कुत्तई और धृष्टता से भरा दुस्साहसिक प्रदर्शन करते हुए यह सरे आम, खुले बाज़ार उसी सर्वोच्च न्यायालय के मुंह पर सीधे-सीधे थूकेंगे और उस हैवान के बचाव में हर क़िस्म का ज़हरीला आख्यान पूरी ताक़त और हिम्मत के साथ तुम्हारे मुंह पर फेंक कर मारेंगे - मानो कह रहे हों कि तुम और तुम्हारे प्रियजन तो ऐसे ही चिथड़ा-
चिथड़ा होकर मरेंगे और हम उनकी लाशों को अपने 'लाल' बूटों के नीचे ऐसे ही कुचलेंगे - कर लो जो तुमसे बन पड़े.
तो सुनो हिन्दुस्तानियों, तुम्हारी अदालतें, तुम्हारी सेना, तुम्हारे '56 इंच के सीने', यह सब मिल कर उन जेहादियों का तो सफ़ाया कर सकते हैं, बम विस्फोट करते उन 'सीधे-साधे, पढ़े लिखे, मासूम नौजवानों' को तो फांसी के तख़्ते तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन इन ज़हरीले कीड़ों - इन 'बौद्धिक हरामज़ादे नरपिशाचों' का कुछ नहीं बिगाड़ सकते. जानते हो क्यों?
क्योंकि यह 'सिविल सोसायटी' का बेहद महीन और ज़हरीला नक़ाब ओढ़े रखते हैं अपने ऊपर
- इनमें से कुछ ख़ुद को पत्रकार कहते हैं, कुछ लेखक का चोला ओढ़ते हैं, कुछ संगीतकार कहलाते हैं, तो कुछ अभिनेता, कुछ संगीतकार, कुछ इतिहासकार, कुछ खिलाड़ी और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता होने का दम भरते हैं.
हाँ, कुछ वकील भी हैं, और शर्म से कहना पड़ता है, कुछ पूर्व न्यायाधीश भी हैं इन हरामज़ादों में. तो इनमें से ज़ाहिर तौर पर कोई भी 'आतंकवादी' नहीं है, इसलिए कोई भी अदालत इनका बाल भी बांका नहीं कर सकती.
लेकिन इस बात की तस्दीक़ अच्छी तरह से, अपने दिमाग़ों में ठोंक-ठोंक कर भर लो कि यही बौद्धिक हरामज़ादे जो कहते-दिखाते हैं, उसे पूरा मुल्क़ सुनता और देखता है. हर कोई नहीं बैठा होता फेसबुक और ट्विटर पर तुम्हारी कही बातें सुनने, इसलिए इन सूअर के बच्चों का कहा- दिखाया सच मानने वालों की तादाद महज़ कुछ हज़ारों या लाखों में नहीं, करोड़ों में है. और इन करोड़ों में वो वाक़ई मासूम मुस्लिम बच्चे भी होते हैं, जो यह मान बैठते हैं कि इस मुल्क़ में मुस्लिम होने का मतलब ही पीड़ित होना है, और इन हैवानियत के गूं में पले कीड़ों की बात सच मानकर वो इन्हीं का अगला औज़ार और हथियार बनने को तैयार हो जाते हैं. और फिर इन्हें अपने लिए एक और नया शिकार मिलता है, और ये ज़हरीला सिलसिला यूं ही चलता जाता है. तो सुनो, इस हरमज़दगी से भरे ज़हरीले सिलसिले को तोड़ना, कमर से तोड़ना, पूरी तरह तोड़ना और बेरहम आतिश से इसकी चिंदी- चिंदी जला कर राख़ करना अब बेहद, बेहद ज़रूरी है. न सिर्फ ज़रूरी है बल्कि पूरे तौर पर लाज़िमी भी है अब इस वहशियत से सनी बौद्धिक हरमज़दगी के जाल का टुकड़ा-टुकड़ा काट कर पूरी तरह से जला देना, लेकिन जैसा कि मैंने कहा - तुम्हारी अदालतें, तुम्हारी चुनी हुई '56 इंच की सरकारें', तुम्हारी सेना, तुम्हारी पुलिस - कोई नहीं कर सकेगा यह काम, क्यों?
इसलिए कि यह 'सिविल सोसायटी' के नक़ाब के
पीछे छुपे हैवान हैं. तो सवाल है कि इस वहशियत से सनी बौद्धिक हरमज़दगी के जाल को ख़त्म करेगा कौन?? और इसका जवाब है - तुम ख़ुद!! हाँ, तुम ख़ुद ही काटोगे अपने फ़रसे से अब इस कमीनगी के जाल को. तुम्हें ही अपने हाथ में शमशीर उठा कर अब इन ज़हरज़ेहन दरिंदों के गंदे ख़ून से नहलाना पड़ेगा एक बार, अपने ही हाथ से इनके टुकड़े सड़क पर काट कर इनकी गर्दनों को लटकाना पड़ेगा !!
अपने ही हाथ से इन्हें सड़क पर ज़िंदा जलाना पड़ेगा तुम्हें - एक को नहीं, दो को नहीं, इन सैंकड़ों, हज़ारों में से 'हर एक को' - हर सड़क पर !! और ऐसा सिर्फ इसलिए ज़रूरी है कि अगर फिर कभी ज़हरीली सोच में अंधे किसी जेहादी की हिम्मत हो हिन्दुस्तान पर हमला करने की, तो कम से कम उसे इतना इल्म ज़रूर हो कि अगर वो बच गया, तो उसकी जान बचाने के लिए इस मुल्क़ के सर्वोच्च न्यायालय पर थूकने की हिमाक़त करने वाला कोई बौद्धिक हरामज़ादा उसे हिन्दुस्तान की ज़मीन पर
ज़िंदा नहीं मिलेगा -- और यक़ीन मानो, इन बौद्धिक हरामज़ादों को टुकड़ों मे काट कर इतना संदेश देना ही फ़िलहाल काफ़ी है, और यही है जो तुम्हारे बस में भी है!! कैसे होगा, कब होगा, कहाँ होगा पता नहीं, लेकिन ऐसा होना शुरू होगा ज़रूर अब यहाँ इस मुल्क़ की गली-गली के नुक्कड़-नुक्कड़ पर, इतना पूरा-पूरा यक़ीन है मुझे !! आख़िर बम विस्फोटों में शहीद हुए एक-एक इंसान की रूह अगर सच में कहीं होगी, तो उसका साथ तो मिलेगा ही इस मुहिम को हर सूरत में !!
अरविन्द अरोरा जी की फेसबुक वाल से साभार!!
जो मैं कहने जा रहा हूँ वह सुनने में कड़वा, नफ़रत से लबरेज और कहीं-कहीं असभ्य भी लगेगा तुम्हारे 'संस्कारी' कानों को, लेकिन सभ्यता को जूते की नोंक पर रखना उन लम्हों के लिए ज़रूरी हो जाता है, जब इंसान के तौर पर जीने और मरने के मायने भी कोई पूरी तरह बर्बर, असभ्य, वहशी और दरिंदगी से भरे हैवान तय करने लगें. अब भी अगर इसे सुन सकने का हौसला और जज़्बा है तुम्हारे पास तो आगे सुनो.
तुम लाख 'हाय सिकुलर-हाय वामपंथी-हाय कांग्रेसी-हाय जेहादी' रोते-पीटते रहो, तुम्हारे मां बाप/बेटे /बेटी /भाई/बहन यूं ही मरते-कटते बम विस्फोट में चिथड़ा-चिथड़ा होते रहेंगे, और उसके बाद उनकी लाशों के टुकड़े बटोरते तुम अपनी आंखों में ख़ून और सीने में आग भरे ऐसे ही तड़पते रहोगे 25-25 सालों तक - किसलिए?
सिर्फ इसलिए कि उसके बाद अदालत दर अदालत गुज़रता वह मुक़द्दमा पूरी पीढ़ी के बाद एक दिन सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचेगा - वह 'सर्वोच्च न्यायालय' जिसे इस मुल्क़ की सबसे बड़ी अदालत होने की ताक़त और रुतबा हासिल है. और उस मुक़द्दमे से जुड़े एक-एक सबूत और गवाही को एक नहीं पचास-पचास बार खंगालने के बाद, लंबी-लंबी बहसों के सालों तक खिंचे दौरों के बाद, पूरे मामले की हर पेचीदग़ी को बेहद बारीक़ी से परखने के बाद जब सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुंचेगा कि उसके आरोपियों में से गिरफ्तार एक दोषी की वहशियत इतनी नीच है कि न्याय होने के लिए उसे सज़ा-ए-मौत दिया जाने के सिवा कोई चारा नहीं, तब तुम्हारे सिर के ऊपर बैठे कुछ शदीद वहशियत से भरे ज़हरज़ेहन बौद्धिक हरामज़ादे सामने आएंगे.
ये वो लोग हैं जो ख़ुद अपनी गर्दन में 'जनवादी वामपंथी / क्रांतिकारी' के शातिर और फ़रेबी तमग़े और उपाधियाँ लटकाते हैं, और अपनी पूरी वैचारिक कमीनगी, बेग़ैरती ओर बौद्धिक हरमज़दगी का बिल्कुल नंगा, अश्लील, कुत्तई और धृष्टता से भरा दुस्साहसिक प्रदर्शन करते हुए यह सरे आम, खुले बाज़ार उसी सर्वोच्च न्यायालय के मुंह पर सीधे-सीधे थूकेंगे और उस हैवान के बचाव में हर क़िस्म का ज़हरीला आख्यान पूरी ताक़त और हिम्मत के साथ तुम्हारे मुंह पर फेंक कर मारेंगे - मानो कह रहे हों कि तुम और तुम्हारे प्रियजन तो ऐसे ही चिथड़ा-
चिथड़ा होकर मरेंगे और हम उनकी लाशों को अपने 'लाल' बूटों के नीचे ऐसे ही कुचलेंगे - कर लो जो तुमसे बन पड़े.
तो सुनो हिन्दुस्तानियों, तुम्हारी अदालतें, तुम्हारी सेना, तुम्हारे '56 इंच के सीने', यह सब मिल कर उन जेहादियों का तो सफ़ाया कर सकते हैं, बम विस्फोट करते उन 'सीधे-साधे, पढ़े लिखे, मासूम नौजवानों' को तो फांसी के तख़्ते तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन इन ज़हरीले कीड़ों - इन 'बौद्धिक हरामज़ादे नरपिशाचों' का कुछ नहीं बिगाड़ सकते. जानते हो क्यों?
क्योंकि यह 'सिविल सोसायटी' का बेहद महीन और ज़हरीला नक़ाब ओढ़े रखते हैं अपने ऊपर
- इनमें से कुछ ख़ुद को पत्रकार कहते हैं, कुछ लेखक का चोला ओढ़ते हैं, कुछ संगीतकार कहलाते हैं, तो कुछ अभिनेता, कुछ संगीतकार, कुछ इतिहासकार, कुछ खिलाड़ी और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता होने का दम भरते हैं.
हाँ, कुछ वकील भी हैं, और शर्म से कहना पड़ता है, कुछ पूर्व न्यायाधीश भी हैं इन हरामज़ादों में. तो इनमें से ज़ाहिर तौर पर कोई भी 'आतंकवादी' नहीं है, इसलिए कोई भी अदालत इनका बाल भी बांका नहीं कर सकती.
लेकिन इस बात की तस्दीक़ अच्छी तरह से, अपने दिमाग़ों में ठोंक-ठोंक कर भर लो कि यही बौद्धिक हरामज़ादे जो कहते-दिखाते हैं, उसे पूरा मुल्क़ सुनता और देखता है. हर कोई नहीं बैठा होता फेसबुक और ट्विटर पर तुम्हारी कही बातें सुनने, इसलिए इन सूअर के बच्चों का कहा- दिखाया सच मानने वालों की तादाद महज़ कुछ हज़ारों या लाखों में नहीं, करोड़ों में है. और इन करोड़ों में वो वाक़ई मासूम मुस्लिम बच्चे भी होते हैं, जो यह मान बैठते हैं कि इस मुल्क़ में मुस्लिम होने का मतलब ही पीड़ित होना है, और इन हैवानियत के गूं में पले कीड़ों की बात सच मानकर वो इन्हीं का अगला औज़ार और हथियार बनने को तैयार हो जाते हैं. और फिर इन्हें अपने लिए एक और नया शिकार मिलता है, और ये ज़हरीला सिलसिला यूं ही चलता जाता है. तो सुनो, इस हरमज़दगी से भरे ज़हरीले सिलसिले को तोड़ना, कमर से तोड़ना, पूरी तरह तोड़ना और बेरहम आतिश से इसकी चिंदी- चिंदी जला कर राख़ करना अब बेहद, बेहद ज़रूरी है. न सिर्फ ज़रूरी है बल्कि पूरे तौर पर लाज़िमी भी है अब इस वहशियत से सनी बौद्धिक हरमज़दगी के जाल का टुकड़ा-टुकड़ा काट कर पूरी तरह से जला देना, लेकिन जैसा कि मैंने कहा - तुम्हारी अदालतें, तुम्हारी चुनी हुई '56 इंच की सरकारें', तुम्हारी सेना, तुम्हारी पुलिस - कोई नहीं कर सकेगा यह काम, क्यों?
इसलिए कि यह 'सिविल सोसायटी' के नक़ाब के
पीछे छुपे हैवान हैं. तो सवाल है कि इस वहशियत से सनी बौद्धिक हरमज़दगी के जाल को ख़त्म करेगा कौन?? और इसका जवाब है - तुम ख़ुद!! हाँ, तुम ख़ुद ही काटोगे अपने फ़रसे से अब इस कमीनगी के जाल को. तुम्हें ही अपने हाथ में शमशीर उठा कर अब इन ज़हरज़ेहन दरिंदों के गंदे ख़ून से नहलाना पड़ेगा एक बार, अपने ही हाथ से इनके टुकड़े सड़क पर काट कर इनकी गर्दनों को लटकाना पड़ेगा !!
अपने ही हाथ से इन्हें सड़क पर ज़िंदा जलाना पड़ेगा तुम्हें - एक को नहीं, दो को नहीं, इन सैंकड़ों, हज़ारों में से 'हर एक को' - हर सड़क पर !! और ऐसा सिर्फ इसलिए ज़रूरी है कि अगर फिर कभी ज़हरीली सोच में अंधे किसी जेहादी की हिम्मत हो हिन्दुस्तान पर हमला करने की, तो कम से कम उसे इतना इल्म ज़रूर हो कि अगर वो बच गया, तो उसकी जान बचाने के लिए इस मुल्क़ के सर्वोच्च न्यायालय पर थूकने की हिमाक़त करने वाला कोई बौद्धिक हरामज़ादा उसे हिन्दुस्तान की ज़मीन पर
ज़िंदा नहीं मिलेगा -- और यक़ीन मानो, इन बौद्धिक हरामज़ादों को टुकड़ों मे काट कर इतना संदेश देना ही फ़िलहाल काफ़ी है, और यही है जो तुम्हारे बस में भी है!! कैसे होगा, कब होगा, कहाँ होगा पता नहीं, लेकिन ऐसा होना शुरू होगा ज़रूर अब यहाँ इस मुल्क़ की गली-गली के नुक्कड़-नुक्कड़ पर, इतना पूरा-पूरा यक़ीन है मुझे !! आख़िर बम विस्फोटों में शहीद हुए एक-एक इंसान की रूह अगर सच में कहीं होगी, तो उसका साथ तो मिलेगा ही इस मुहिम को हर सूरत में !!
अरविन्द अरोरा जी की फेसबुक वाल से साभार!!
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