जंगलराज की यादें

#जंगलराज_की_यादें

तिथि- 01/01/2000 ईस्वी !
समय- शाम के ठीक साढ़े 5 बजे ।
घटनास्थल- ग्राम- मन्जौरा,
जिला मधेपुरा ।

मित्रों, आज मैं अपने परिवार द्वारा भोगी हुई आपबीती बताने जा रहा हूँ.. और यह उस समय कि घटना है जब बिहार की जनता शाम के 5 बजे अपने घरों में छुप हो जाती थी.. तब हम एक 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छोटे बालक ही थे ।

अब बालक थे.... तो माँ कहती "बौआ, साँझ के इधर उधर न निकलिहैं, फैजान(बदमाश) तोरा के पकड़ लेतौ" हम भी माँ पिताजी की बातें मानते थे.. सवाल नहीं किया करते थे जैसे कि उस समय कोई व्यक्ति अपहरण होने पर लालू यादव से सवाल नहीं उठाया करता था...

सर्दियों के दिन थे... फर्स्ट जनवरी थी... शाम का धुंधलका छा गया था... हमारे चाचाजी शाम को कहीं घूमने निकल गए । उनके लिए यह सामान्य सी बात थी.. हमारे चचेरे भाई "रंगम भैया" बांका हॉस्टल से 10 दिनों की छुट्टी लेकर के आए हुए थे.. उस समय वह 8वीं कक्षा में पढ़ते थे...... हमारी चाचीजी रसोईघर में रंगम भैया के लिये सेवई-पूरी बना रही थी... इतने में आँगन में 10 आदमियों के कूदने की आवाज सुनाई दी ! धप-धप करके सब बॉउंड्री फांदकर पूरे घर को आगे-और पीछे से घेर लिया..... अब सामने 10-15 नकाबपोश डकैत खड़े थे.. चाची तो जैसे बेहोश सी हो गई रंगम भैया की कनपटी पर पिस्तौल सटाकर चाची को घसीटते हुए उनके कमरे में गए । दादी और साथ में रहने वाले एक मामाजी को घर में हाथ पैर बांध कर डकैतों ने उनके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, ताकि वे चिल्ला न पाएं ।

अब चाची के पास घर के जितने भी हीरे और सोने के जेवर-जेवरात थे.. सभी डकैतों ने बन्दूक की नोक पर लूट लिए । डकैतों ने एक लाइसेंसी ब्रिटिश रायफल और 10 लाख नगद भी लूट लिया । और फिर डकैतों ने रंगम भैया को साथ में ले जाते हुए कहा कि "अगर सात दिन के अंदर- अंदर तुमलोग 25 लाख रुपया देते हो तो बच्चा वापस किया जायेगा, नहीं तो गर्दन काटकर तुम्हारे दरवाजे पर फेंक जाएँगे" चाची तो यह सुनकर बेहोश हो गई..

डैकत लूट का सारा माल लेकर चलते बने । फिर जब चाचाजी लौटे तो उन्होंने पूरा घर-बाहर सब अस्तव्यस्त देखा ! तब तक गाँव में जिसने भी यह दर्दनाक खबर सुनी तो पूरा गाँव उमड़ पड़ा... गाँव के सबसे बड़े जमींदार ! वो भी एक ही बेटा ??अगर वह भी सुरक्षित न रहे तो एक पिता के लिए इससे भी बड़ा कोई दर्द होता है क्या ??????? चाचाजी को हार्ट अटैक आ गया.. लोगों ने किसी तरह संभाला !

अब बिहार की police ने अपना चिरपरिचित रंग दिखाते हुए अपराधियों को संरक्षण ही दिया... रंगम भैया की कहीं कोई खबर नहीं थी....! मेरे चाचा और चाची ने अन्न-जल सब कुछ छोड़ दिया था.... दिन भर रोते रहते थे.. चाचाजी जैसे पागल बन गए थे.. कह रहे थे- बेटा न मिला तो जीकर क्या करेंगे? इससे अच्छा तो मरना भला ! सारे गाँव में एक मातम पसरा हुआ था...... सब को हँसाने वाले चाचा जैसे काठ बन गए थे.. उन अपहरणकर्ताओं को पकड़ने के बजाय पुलिस और प्रशासन टाल-मटोल करती रही.... आईजी तक बात गई, लेकिन सब फेल !

फिर किसी शुभचिंतक ने सलाह दी कि पुलिस के चक्कर में रहिएगा तो बेटा भी गवां लीजिएगा..."ध्रुव बाबू" आप उनको पइसा दे दीजिये । बेटा दुबारा लौट कर नहीं आएगा । वही हुआ..... अपहरण कर्ताओं को फिरौती मिली और तब जाकर रंगम भैया वापस आये ।

अपराधियों के चंगुल से छूटने के बाद भी हमारे परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर खौफ का साया मंडराता ही रहा । रंगम भैया तो 5 साल तक हॉस्टल में ही रहे... इस घटना के 4 साल बाद ही वो अपने गाँव आ पाए । चाचाजी को इस घटना के बाद बहुत सदमा लगा । एक अच्छे खासे स्वस्थ आदमी को दिल का रोग हो गया । और उसके बाद रोग बढ़ते ही रहे... एक दहशत की तलवार हमेशा हमारे परिवार पर मंडराती रहती थी.... और इन सब वजहों के कारन चाचाजी को 3 साल बाद दोनों किडनी ने काम करना बंद कर दिया । और वो चल बसे.... !


मैंने अपना चाचा खोया है, मेरे रंगम भैया ने अपना पिता, और चाची ने अपने मांग का सिंदूर खो दिया ! और आज आप पूछो तो कहते हैं.. क्या है जंगलराज ? मैं बताऊँगा क्या होता है जंगलराज....

जंगलराज ने मेरे परिवार का सुख-चैन सब लूट लिया... और उस घटना को याद करते हुए कितना रोता है ये दिल ? मेरे चाचाजी को लील गया , जंगलराज ! यह जंगलराज न जाने कितने माँ के बेटों को लील गया, कितने सुहागिनों की माँग सूनी कर गया यह जंगलराज ! मैंने अपना बचपन कितने खौफ में गुजारा है, याद करते हुए अब मुझे डर नहीं लगता बल्कि क्रोध आता है कि इस "जंगलराज" को
लगातार 15 साल तक लाने के लिए पूरे बिहारवासी अधिक जिम्मेदार थे.... जाति- पांति में बंटकर सुख-चैन सब छिन गया। मैंने हमेशा जंगलराज के खिलाफ जाकर वोट किया है और मेरा वोट हमेशा जंगलराज के खिलाफ ही रहेगा ! क्योंकि जब वोट गिराने के समय मुझे अपने चाचा का रोता हुआ चेहरा याद आता है तो मैं क्रोधित हो उठता हूँ... कि मैंने आज यदि गलत का साथ दिया तो क्या ठीक है कि आने वाले दिनों में मेरे बेटों का अपहरण हो जाये ? और मैं भी उसी दर्द से गुजरूं जैसा कि आज से 15 साल पहले चाचाजी को अपने बेटे के लिए तड़पते देखा था.... नहीं, मेरा वोट जंगलराज के खिलाफ जायेगा ।

और यह घटना शब्दशः सच है। किसी को अगर कहानी लगे तो स्वंय इस गाँव में आकर तसदीक कर लें ।

- कुंदन कामराज

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