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उदारीकरण छोडिये और देश हित में कठोर निर्णय लीजिये !!

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आज देश बहुत बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा हैं। चालु वित्त खाते का घाटा बेकाबू हो चूका है। चालु वित्त खाता देश की साख ही नहीं आर्थिक ताकत का बैरोमीटर कहा जाता है। इसको आप ऐसे समझ सकते हैं कि डॉलर चुकाकर विदेश से मंगवाए गए माल और विदेशी मुल्को को बेचकर कमाए गए डॉलर का अंतर ही- चालु वित्त खाते का घाटा कहा जाता हैं। जो अब इतना बेकाबू हो गया हैं कि देश की लाज यानि की देश का सोना गिरवी रख कर इसे पाटने की बात हो रही हैं जो हम सभी भारतीयों के लिये डूब मरने जैसी बात हैं।
अब यह हालत क्यों कर हुए जबकि देश को सँभालने वाले पीएम से लेकर वित्तमंत्री तक अर्थशास्त्री है फिर भी बनिया की मामूली गणित समझने में नाकाम रहे। खैर अब देश की हालत ऐसी क्यों हुई इस पर चर्चा करना निरर्थक है क्योकि इससे कोई लाभ नहीं होने वाला हैं।
पर हम सभी भारतीय इस संकट की घडी में देश और सरकार के साथ हैं। हम आपसे अपील करते हैं की इस घाटे को रोकने के लिए उदारीकरण पर आंशिक प्रतिबन्ध लगाया जाए, जीरो टेक्नोलाजी से बनी विदेशी चीजो पर पूर्णतया प्रतिबन्ध लगाया जाए, स्वास्थ्य सम्बन्धी हवाले देकर विदेशी खाने पीने की चीजो को बाजार में जाने से रोका जाए ऐसा विदेशी मुल्क भी हमारे देश के सामान के साथ करते हैं। देशी उद्योग धंधे को बढ़ावा दिया जाए उनके सामान सरकार खुद विदेशी बाजार में पहुंचाए। विदेशी सामान पर भारी आर्थिक कर लगा कर उनको महंगा किया जाए, उसके विपरीत देशी सामान पर कर घटा कर उन्हें सस्ता किया जाए। लग्जरी आयटम्स, निजी उपयोग के ऑटोमोबाइल्स पर भारी बिक्रीकर लगाया जाए ताकि जनता ताकि जनता उसे खरीदने में ह्तोउत्सहित महूसस करे।
सबसे जरुरी पेट्रोलियम का कोटा निर्धारित किया जाए, निजी उपयोग के वाहनों के पेट्रोल को मँहगा किया जाए उसके विपरीत सार्वजानिक उपयोग के पेट्रोलियम को सस्ता किया जाए।
इस तरह के तरीके और कठोर निर्णय से हम चालु खाते का घाटा नियंत्रित कर सकते है, प्रधानमंत्री जी देश की जनता के नाम सन्देश भी दे की देश की कोमा में पड़ी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सभी देशवासी स्वदेशी सामान का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करे मुझे उम्मीद है देश की जनता भले आप पर कितना भी अविश्वास कर रही हो पर अगर आप सच्चे दिल से देश की जनता की मदद मांगेगे तो भारत की देशभक्त जनता देश के लिए अपना खून तक बहा देगी और बहुत से मौके पर हम भारतीयों ने ऐसा करके दिखाया भी हैं।
अगर हम जैसे जिन्हें आप जैसे महान लोग दो कौड़ी का सड़क का आदमी समझते है कि सलाह बेहतर लगे तो देश के भले के लिए ये कठोर कदम उठाये, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है देश के हालत फिर सुधर जायेंगे।

आम आदमी और मँहगाई

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खाने में बिना मीन-मेख निकाले चुपचाप प्लेट साफ करके खाते हुए मेरे घर वाले देखते हैं तो बड़े आश्चर्यचकित होकर कहते हैं "तू तो पूरा बदल गयी हैं अब तो खाने में बिलकुल नखरे नहीं करती और ना ही कोई ड्रेस अब खरीदती हैं, कोई बात हैं क्या,सब ठीक तो हैं ना?"

अब मैं उनको क्या जवाब दूँ जब मार्केट सब्जी खरीदने जाती हूँ तो 15 से रूपये किलो आलू की भिन्डी, 100 रूपये के ऊपर का मस्टर्ड आयल/ रिफाइंड आयल और 45 का विष्णु भोग चावल १३० का आशीर्वाद आटा, और थोडा सा सामान खरीदने में 1000 रूपये की नोट खर्च करती हूँ तो मुझे बड़ी शिद्दत से अपने ऑफिस का ऑफिस बॉय याद आता हैं और सोचती हूँ कि कैसे वह 3000 रुपये में अपना घर चलाता होगा|

इस महँगाई में कैसे मुमकिन होता होगा की दो बच्चे और पति पत्नी का खर्च चलाना, कैसे वह बच्चो को पढ़ा पाता होगा सच में मन वितृष्णा से भर उठता हैं अब आप ही बताइए ऐसे में कैसे मैं खाने से शिकायत करू कैसे जूठन छोड़ दूँ प्लेट में|

और उतना ही गुस्सा सिस्टम और सरकार पर आता हैं जो 34 रुपये काफी मानते हैं एक दिन का खर्च, तो कुछ नेता 1 रुपये से लेकर 12 रुपये तक में भरपेट खाना मिलने का दावा करते हैं बहुत गुस्सा आता हैं जब एक ही समाज में इतना अंतर देखती हूँ तो, और यही एक वजह हैं कि हर भष्ट्र नेता से घृणा होती हैं मुझे उनका किरदार गंध मारता हुआ प्रतीत होता हैं और मन में गुस्से के साथ विद्रूपता उत्पन्न होती हैं, यही वजह हैं की राजनीति में मुझे रूचि हैं और मैं हर अच्छे और इमानदार नेता को इस देश की गद्दी पर देखना चाहती हूँ ताकि समाज की यह विद्रूपता ख़त्म हो|