नरेंद मोदी की बिहार जीत के मायने

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बिहार कौन जीत रहा हैं पता नहीं पर बिहार और यूपी अगर बीजेपी जीतती हैं तो यकीन रखियेगा सम्पूर्ण देश का भाग्योदय का सूर्य बिहार और यूपी से निकलेगा।

राज्यसभा में बहुत से बिल अटके पड़े हैं जिनसे हम विकास की नयी ऊंचाई छु सकते हैं पर बीजेपी के पास बहुमत नहीं हैं। एक बार राज्यसभा में बहुमत मिला तो पूरी दुनिया को हम अपने कदमो में झुका लेंगे। हमारी प्रतिभाये विदेश पलायित नहीं होगी वो हमारे लिए काम करेंगी ऐसा माहौल देश में तैयार होगा। चीन से ज्यादा प्रतिभा हमारे यहाँ मौजूद हैं बस हमे मौका नहीं मिल रहा हैं एक बार चीन जैसा ओद्योगिक माहौल यहाँ बन जाए तो हम भी चीनी सामानों की तरह भारतीय सामान से पूरा विश्व पाट सकते हैं। अब विश्व की अर्थव्यस्था ऐसी हैं कि हम बिना निर्यात के आगे बढ़ ही नही सकते, आयात कम हो निर्यात ज्यादा यही अच्छी इकोनॉमी हैं। गरीब तबके का भला भी इसी में मुमकीन हैं। आप लोगो में से जो किसान परिवार से हैं वो इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि बिना बाहरी आय के कृषि में कोई लाभ नहीं हैं यहाँ तक की खेती से परिवार का पेट तक नही भरा जा सकता, बाहरी कमाई खेती और परिवार दोनों को मदद करती हैं। बाहरी कमाई से वक्त पर खेती के लिए संसाधन जुटाए जा सकते हैं पर हमारे देश में रोजगार की बेहद कमी हैं और यह कमी हम इंड्रस्ट्री लगाकर पूरी कर सकते हैं। लगभग सारे विकसित देश इसी व्यवस्था से विकसित हुए हैं, जो अमीर हैं उन पर देश की गरीबी का कोई फर्क नहीं पड़ता उल्टा राजकोषीय घाटे से अकसर उन्हें फायदा ही पहुँचता हैं। चालु वित्त खाता ही देश में गरीबी और महंगाई का जिम्मेदार होता हैं, चालु वित्त खाते में जितना घाटा होगा उतना ही देश में आर्थिक आराजकता फैलेगी जो कई पाप साथ लेकर आती हैं।

मैं आपको आसान शब्दों में समझाती हूँ, आप पुरे विश्व को परिवार मान लीजिये, यह आप सभी को मालूम होगा परिवार चलाने के लिए हमे बाहर से पैसा कमाकर लाना होगा तभी बाबू जी की दवा, अम्मा की साड़ी, मुन्ने की फ़ीस की व्यवस्था हो पाएगी। बाहर से पैसा नहीं आएगा और हम अपनी बचत से सिर्फ बाहर का सामान खरीदते रहे तो एक दिन हमारी बचत खत्म और साथ में हम भी खत्म हो जायेगे। इसी तरह देश की अर्थव्यवस्था चलती हैं विदेशी सामान हम बहुत ज्यादा आयात कर रहे हैं और बदले में हमारा निर्यात बेहद कम हैं, अगर निर्यात बढ़ेगा तो पैसा आएगा, पैसा आएगा तो घर में टीवी आएगी फ्रिज आएगा कार आएगी देश में सड़के बनेगी हर घर बिजली पहुंचेगी, बेहतरीन अस्पताल, उच्च शिक्षा संसथान आदि खुलेंगे हमारी क्रय शक्ति बढ़ेगी तो जाहिर हैं हम विकसित होंगे और हमारे साथ देश भी।

पुरानी सरकारें गरीबी हटाओ का नारा जरूर देती रही पर उन्होंने इसको जड़ से मिटाने की अपेक्षा एलोपैथ का सहारा ले मर्ज को दबाया, सब्सिडी के नाम पर भीख बाँट जनता को नकारा किया। दो रूपये किलो चावल गेंहू दे जनता को मुफ्तखोरी की आदत लगाई। ताकि लोग नकारा बने कामचोर बने और गरीबी की समस्या ज्यो की त्यों बनी रहे और साथ में उनका वोट बैंक भी, पर मोदी सरकार मजबूत आर्थिक सुधार के पक्ष में जिसे वो राज्यसभा में बहुमत होने और विपक्षी पार्टियो की गन्दी राजनीती के चलते लागू नहीं कर पा रही हैं।

आरक्षण का मुद्दा इस देश में इतना प्रासंगिक सिर्फ इसीलिए हैं की देश में रोजगार नहीं हैं, लोग सरकारी नौकरी के जरिये अपना भविष्य सुधारना चाहते हैं एक बार अच्छी प्राइवेट नौकरियों की देश में बाढ़ आ जाए तो आरक्षण को अप्रसांगिक बनते देर न लगेगी, पर वोटबैंक की राजनीती करने वाली पार्टिया यह चाहती ही नहीं क्योकि उन्हें मालूम हैं उनकी कुर्सी इसी आरक्षण के पाये पर टिकी हैं। मोदी जी इसीलिए ज्यादा से ज्यादा रोजगार पैदा करना चाहते हैं ताकि आरक्षण अप्रसांगिक हो जाए।

खैर देखते हैं कि भारत का भाग्य उदय होगा, या फिर विधाता का हमेशा की तरह हमारे साथ अन्याय!!

जंगलराज की दर्दनाक दास्तान

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बात उन दिनों कि हैं जब बिहार में जंगलराज कि तूती बोलती थी । कोई भी गोप जी का नाम लेकर आता और बाजार से कुछ भी मंगनी में उबात उन दिनों कि हैं जब बिहार में जंगलराज कि तूती बोलती थी । कोई भी गोप जी का नाम लेकर आता और बाजार से कुछ भी मंगनी में उठा के ले जाता था , नहीं देने पर धंधा बंद या कुछ महीनों के लिए हाथ पैर तुडवाकर अस्पताल में भर्ती , कितनो का अता पता भी नहीं चला।

मेरी नई नई जवानी उफान मार रही थी, पिता जी गुजरने के बाद दुकान एवं घर कि जिम्मेवारी मेरे ही ऊपर आ गयी थी । हमारा दुकान पटना में नामी जगह पर था सामने ही जंगलराज के चमचों का पूरा मोहल्ला पडता था , मोड पर किसी के निकलते ही पूरे सडक के दुकानदार सिहड जाते थे । हमारा छोटा सा होटल था ,जिसमें रिक्शे ठेले वाले ,मजदूर खाना खाया करते थे । उसी से हमारा गुजर बसर एवं पढाई लिखाई भी होती थी । दुकान में हम सभी भाई ही मिलकर सारा काम करते थे, खाना बनाने से लेकर बर्तन ढोने तक । उस दिन मैं अकेला ही दुकान पर था , भाई ट्यूशन पढने गया था । अगले दिन मेरी कोलकाला में रेलवे कि परीक्षा थी , सो थोडा टेंशन मे थे ट्रेन भी पकडना था ,राखी का समय था एक दोस्त के लिए राखी लेना था उसके घर से जो उस समय कोलकाता में पढ रहा था ।इसी उधेडबुन में ग्राहकों को खाना भी खिला रहे थे तभी गोप जी (जो उस समय लालूजी के एक साले के खास आदमी हुआ करते थे) के कुछ आदमी खाना
खाने के लिए आए (फ्री में ही खाते थे )जो दिन में ही फुल पीए हुए थे , मैनें खाना निकालकर दिया वो खा रहे थे तभी बगल में खा रहे मजदूर से किसी बात को लेकर बहस हुई वो सब उस बेचारे को भद्दी भद्दी गालियाँ देने लगे , मैं समझाने गया तो मुझे भी भद्दी भद्दी गालियाँ देने लगे तथा खाना सब उलट दिया , मेरा तलवा का लहर कपार पर चढ गया (यह नई नई जवानी और कुछ जात का भी असर था) मैनें सब्जी चलाने वाला बडका छोलनी उठाया और दे दना दे दना दन मार मार के मोहल्ले के मोड तक खदेड दिया । वापस आकर भात पसाने लगा , तब तक सैकडो आदमी गोप जी के पीछे पीछे आ गये लाठी ,डंडा गोली बंदूक सब लिए हुए , गोप जी का आदेश हुआ मारो साले के हमर आदमी पर हाथ उठाता था । मैं भात ही पसा रहा था कि ईटा पत्थर उन्होनें बरसाना शुरू कर दिया , एक ईंट कपार पर और एक ईंट दाँतो पर लगी , कपार फट गया, होंठ फट गए आगे का एक दाँत टूट गया । तभी किसी ने थाना में फोन कर दिया , थाना कि जिप्सी तुरंत आ गयी लेकिन गोप जी को देखते ही चलते बनी । मैं दर्द सेकराह रहा था लेकिन कोई मदद को नहीं आया।

 अंत में मैनैं ही हथियार डालना उचित समझा और जाके गोप जी के पैर पकड लिए , मैं खून से लथपथ था ये देखकर गोपजी का दिल पसीजा और उन्होनें अपने सभी गुर्गों को भागने का आदेश दिया । मैं दो तीन घंटे यूँ ही दुकान के आगे सडक पर बैठा रहा पर कोई मदद को नहीं आया। कुछ घंटो बाद एक दूर के रिश्तेदार आए जिन्होंने मरहम पट्टी करवाई । चौंतीस टाँके पडे थे । होंठ के अंदर चार । चार पाँच महीने बिस्तर पर पडा रहा । न ठीक से खा पाता था न बोल पाता था । अगल बगल के लोग आश्चर्य कर रहे थे कि इतनी मार खाने के बाद भी ये बच कैसै गया ? कुछ लोग एफ आई आर करने को बोल रहे थे ,लेकिन बुद्धिजीवीयो ? ने सलाह दी कि और लफडा हो जाएगा धंदा बंद हो जाएगा , गवाही कोई नहीं देगा । पी एम सी एच में ईलाज कराने गए तो डॉक्टरों ने पुलिस केस बताकर ईलाज करने से मना कर दिया । थाना गए तो पुलिस ने गोप जी का नाम सुनते ही रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया ,बोले मैनैज कर लो । रोज धमकी मिलती रही केस नहीं करने को । बाबूजी के कुछ शुभचिंतको ने गोपजी को समझाया जाने दीजीए बिन बाप का बच्चा है कमाता-खाता,पढता-लिखता है कुछ नहीं करेगा । तब जाकर जान छूटी ।

अंदर से डर खत्म हो गया लोग बोलते रहे दाँत टूट गया है आगे का है अच्छा नहीं लग रहा लगवा लो मैनैं नहीं लगवाया । कुछ यादें जेहन में हमेशा रहनी चाहिए । मेरा वो रेलवे का परीक्षा नहीं छूटता तो शायद मैं अभी रेलवे में नौकरी कर रहा होता । खैर छोडिए जेहि विधी राखे राम, ताहि विधि रहिये।

जंगलराज की यादें

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#जंगलराज_की_यादें

तिथि- 01/01/2000 ईस्वी !
समय- शाम के ठीक साढ़े 5 बजे ।
घटनास्थल- ग्राम- मन्जौरा,
जिला मधेपुरा ।

मित्रों, आज मैं अपने परिवार द्वारा भोगी हुई आपबीती बताने जा रहा हूँ.. और यह उस समय कि घटना है जब बिहार की जनता शाम के 5 बजे अपने घरों में छुप हो जाती थी.. तब हम एक 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छोटे बालक ही थे ।

अब बालक थे.... तो माँ कहती "बौआ, साँझ के इधर उधर न निकलिहैं, फैजान(बदमाश) तोरा के पकड़ लेतौ" हम भी माँ पिताजी की बातें मानते थे.. सवाल नहीं किया करते थे जैसे कि उस समय कोई व्यक्ति अपहरण होने पर लालू यादव से सवाल नहीं उठाया करता था...

सर्दियों के दिन थे... फर्स्ट जनवरी थी... शाम का धुंधलका छा गया था... हमारे चाचाजी शाम को कहीं घूमने निकल गए । उनके लिए यह सामान्य सी बात थी.. हमारे चचेरे भाई "रंगम भैया" बांका हॉस्टल से 10 दिनों की छुट्टी लेकर के आए हुए थे.. उस समय वह 8वीं कक्षा में पढ़ते थे...... हमारी चाचीजी रसोईघर में रंगम भैया के लिये सेवई-पूरी बना रही थी... इतने में आँगन में 10 आदमियों के कूदने की आवाज सुनाई दी ! धप-धप करके सब बॉउंड्री फांदकर पूरे घर को आगे-और पीछे से घेर लिया..... अब सामने 10-15 नकाबपोश डकैत खड़े थे.. चाची तो जैसे बेहोश सी हो गई रंगम भैया की कनपटी पर पिस्तौल सटाकर चाची को घसीटते हुए उनके कमरे में गए । दादी और साथ में रहने वाले एक मामाजी को घर में हाथ पैर बांध कर डकैतों ने उनके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, ताकि वे चिल्ला न पाएं ।

अब चाची के पास घर के जितने भी हीरे और सोने के जेवर-जेवरात थे.. सभी डकैतों ने बन्दूक की नोक पर लूट लिए । डकैतों ने एक लाइसेंसी ब्रिटिश रायफल और 10 लाख नगद भी लूट लिया । और फिर डकैतों ने रंगम भैया को साथ में ले जाते हुए कहा कि "अगर सात दिन के अंदर- अंदर तुमलोग 25 लाख रुपया देते हो तो बच्चा वापस किया जायेगा, नहीं तो गर्दन काटकर तुम्हारे दरवाजे पर फेंक जाएँगे" चाची तो यह सुनकर बेहोश हो गई..

डैकत लूट का सारा माल लेकर चलते बने । फिर जब चाचाजी लौटे तो उन्होंने पूरा घर-बाहर सब अस्तव्यस्त देखा ! तब तक गाँव में जिसने भी यह दर्दनाक खबर सुनी तो पूरा गाँव उमड़ पड़ा... गाँव के सबसे बड़े जमींदार ! वो भी एक ही बेटा ??अगर वह भी सुरक्षित न रहे तो एक पिता के लिए इससे भी बड़ा कोई दर्द होता है क्या ??????? चाचाजी को हार्ट अटैक आ गया.. लोगों ने किसी तरह संभाला !

अब बिहार की police ने अपना चिरपरिचित रंग दिखाते हुए अपराधियों को संरक्षण ही दिया... रंगम भैया की कहीं कोई खबर नहीं थी....! मेरे चाचा और चाची ने अन्न-जल सब कुछ छोड़ दिया था.... दिन भर रोते रहते थे.. चाचाजी जैसे पागल बन गए थे.. कह रहे थे- बेटा न मिला तो जीकर क्या करेंगे? इससे अच्छा तो मरना भला ! सारे गाँव में एक मातम पसरा हुआ था...... सब को हँसाने वाले चाचा जैसे काठ बन गए थे.. उन अपहरणकर्ताओं को पकड़ने के बजाय पुलिस और प्रशासन टाल-मटोल करती रही.... आईजी तक बात गई, लेकिन सब फेल !

फिर किसी शुभचिंतक ने सलाह दी कि पुलिस के चक्कर में रहिएगा तो बेटा भी गवां लीजिएगा..."ध्रुव बाबू" आप उनको पइसा दे दीजिये । बेटा दुबारा लौट कर नहीं आएगा । वही हुआ..... अपहरण कर्ताओं को फिरौती मिली और तब जाकर रंगम भैया वापस आये ।

अपराधियों के चंगुल से छूटने के बाद भी हमारे परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर खौफ का साया मंडराता ही रहा । रंगम भैया तो 5 साल तक हॉस्टल में ही रहे... इस घटना के 4 साल बाद ही वो अपने गाँव आ पाए । चाचाजी को इस घटना के बाद बहुत सदमा लगा । एक अच्छे खासे स्वस्थ आदमी को दिल का रोग हो गया । और उसके बाद रोग बढ़ते ही रहे... एक दहशत की तलवार हमेशा हमारे परिवार पर मंडराती रहती थी.... और इन सब वजहों के कारन चाचाजी को 3 साल बाद दोनों किडनी ने काम करना बंद कर दिया । और वो चल बसे.... !


मैंने अपना चाचा खोया है, मेरे रंगम भैया ने अपना पिता, और चाची ने अपने मांग का सिंदूर खो दिया ! और आज आप पूछो तो कहते हैं.. क्या है जंगलराज ? मैं बताऊँगा क्या होता है जंगलराज....

जंगलराज ने मेरे परिवार का सुख-चैन सब लूट लिया... और उस घटना को याद करते हुए कितना रोता है ये दिल ? मेरे चाचाजी को लील गया , जंगलराज ! यह जंगलराज न जाने कितने माँ के बेटों को लील गया, कितने सुहागिनों की माँग सूनी कर गया यह जंगलराज ! मैंने अपना बचपन कितने खौफ में गुजारा है, याद करते हुए अब मुझे डर नहीं लगता बल्कि क्रोध आता है कि इस "जंगलराज" को
लगातार 15 साल तक लाने के लिए पूरे बिहारवासी अधिक जिम्मेदार थे.... जाति- पांति में बंटकर सुख-चैन सब छिन गया। मैंने हमेशा जंगलराज के खिलाफ जाकर वोट किया है और मेरा वोट हमेशा जंगलराज के खिलाफ ही रहेगा ! क्योंकि जब वोट गिराने के समय मुझे अपने चाचा का रोता हुआ चेहरा याद आता है तो मैं क्रोधित हो उठता हूँ... कि मैंने आज यदि गलत का साथ दिया तो क्या ठीक है कि आने वाले दिनों में मेरे बेटों का अपहरण हो जाये ? और मैं भी उसी दर्द से गुजरूं जैसा कि आज से 15 साल पहले चाचाजी को अपने बेटे के लिए तड़पते देखा था.... नहीं, मेरा वोट जंगलराज के खिलाफ जायेगा ।

और यह घटना शब्दशः सच है। किसी को अगर कहानी लगे तो स्वंय इस गाँव में आकर तसदीक कर लें ।

- कुंदन कामराज

कभी तो हमारा दर्द समझिये!!

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मैं आपसे बात करना चाहती हूँ, अपना दर्द साझा करना चाहती हूँ, मैं सबसे पहले अपने बारे में आपको बताना चाहती हूँ की मैं बेहद भावुक हूँ, इंसान तो बहुत दूर की बात हैं कोई छोटी सी चींटी मर जाए तो खाना गले के नीचे नहीं उतरता। अख़लाक़ की हत्या मुझे भी अंदर तक झिंझोड़ देती हैं, उसके परिवार की चिंता होती हैं, महंगाई के दौर में सबसे ज्यादा चिंता आर्थिक पक्ष को लेकर होती हैं। मानती हूँ की जो हुआ बेहद गलत हुआ ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। यह सिस्टम से लेकर हमारी सामाजिक चेतना तक का फेलियर हैं।
लेकिन मैं आपके सामने एक दूसरा पहलु भी रखना चाहती हूँ की जो मेरे जैसे लोगो को ना चाहते हुए भी कट्टरता की तरफ धकेल रहे हैं जो हमारे स्वभाव में ही नहीं हैं। आपके रवैये से हम बेहद दुखी और असुरक्षित महसूस करते हैं और हमे मजबूरन ऐसी घटनाओ पर चुप्पी साधनी पड़ती हैं और आपको बता दूँ की यह चुप्पी हमारी पहली स्टेज हैं। दूसरी स्टेज पक्ष में बोलना और तीसरी स्टेज खुद वैसा ही हो जाना होता हैं। आपसे मार्मिक अपील करती हूँ की हमे इस कट्टरवाद के रास्ते पर चलने से बचा लीजिये यह आपका एहसान हम पर, इंसानियत और सेक्युलरिज्म पर होगा। आपके रवैये से कभी-कभी इतना कड़वापन मन में भर जाता हैं की मैं परेशान और बेचैन हो उठती हूँ।
दुःख इस बात का होता हैं की जब ऐसी घटनाओ के शिकार हिन्दू होते हैं तब आप सेकुलर लोग चुप्पी साध लेते हैं यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा हैं। मुझे याद हैं नागपुर में मोईन खान की हत्या, दादरी के अख़लाक़ की हत्या तो मैं पुरे जीवन ही नहीं भूल पाऊँगी, लेकिन मुझे सिर्फ दो दिन पहले पता चला की एक हिन्दू को सिर्फ इसलिए मार दिया गया की उसने एक धार्मिक स्थल के पास हार्न बजाया, एक लड़के को सिर्फ इसलिए मार दिया गया की वो किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम करता था। केरल से भी लगातार खबरे आती हैं नृशंस हत्याओ की तब आप लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते? क्यों नहीं ऐसी खबरे मिडिया की कवरेज पाती हैं? बस ऐसी ही बाते मन में असुरक्षा पैदा करती हैं और आप जैसो की इंसानियत कटघरे में खड़ी करती हैं क्यों आप लोग ऐसी हत्याओ में मरने वाले का धर्म देखकर अपने आँसू बहाते हैं। क्यों नहीं आप लोग ऐसे लोगो को तब लताड़ते हैं? अरे मेरे यहाँ तो नास्तिक लोगो को भी स्वीकार किया जाता हैं, पर आप काफिर की हत्या के लिए उकसाते हैं। हम कैसे खुद को सुरक्षित महसूस करे ऐसे माहौल में?
हिन्दुओ की आस्था गाय से जुडी हैं तो प्लीज छोड़ दीजिये ना, मांस खाने के लिए बहुत से पशु पक्षी हैं खाइये कौन रोक रहा हैं, अपने हिन्दू भाइयो के लिए छोड़ दीजिये।
हम तो आपके लिए अपने गणपति के पंडाल खाली कर देते हैं कि आप अपने खुदा की इबादत कर सको, पर आप पर उन्ही गणपति की ख़ुशी में उड़ाया गुलाल पड़ जाए तो आपका धर्म भृष्ट हो जाता हैं आप मारने काटने पर उतर आते हो।
चलिए मान लेती हूँ ये लोग असामाजिक तत्व हैं पर आप तो समझदार हैं क्यों नहीं ऐसे लोगो का अपनी पूरी ताकत के साथ विरोध करते, मैं कभी कभी इस कदर परेशान हो जाती हूँ की मेरा एक मुस्लिम भाई हैं घण्टो से उससे इनबॉक्स में लड़ती हूँ जलील करतीहूँ उसके स्टेटस पर उसी का मजाक उड़ाती हूँ अच्छा नहीं लगता। कभी कभी तो इतनी शर्मसार हो जाती हूँ की सोचती हूँ की कर कोई रहा हैं और ज्यादती मैं इसके साथ कर रही हूँ। पर क्या करू मैं परेशान हो उठती हूँ असुरक्षित महसूस करने लगती हूँ।
प्लीज अब बर्दाश्त नहीं होता भगवान के लिए यह माहौल बदल दीजिये, हत्याओ में धर्म मत देखिये हर हत्या का विरोध करिये, हर हत्यारे को बगैर धर्म देखे उसके अंजाम तक पहुँचाइये, और चलिए शुरुआत हम मरहूम अख़लाक़ के हत्यारे से ही करते हैं पर यह सिलसिला बना रहना चाहिए और अगर किसी हिन्दू की हत्या हो तो उसके हत्यारे का भी अंजाम वही हो जो अख़लाक़ के हत्यारो का होगा। वरना आप मुझे खो देंगे एक इंसान जो आपके पाले में बड़ी मजबूती के साथ खड़ी थी और मेरे जैसे ना जाने कितने और भी। विनती करती हूँ प्लीज हमारे जैसे लोगो को को इस आग से बचा लीजिये!!

इंडियन स्टैण्डर्ड टाइम का मतलब

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मैं पहले भी लिख चुका हूं कि अपनी पत्नी के साथ मैं दांतों के डॉक्टर के पास गया था और डॉक्टर ने उसे देखने से मना कर दिया था। उन दिनों हम अमेरिका में थे और एक शाम अचानक पत्नी के दांतों में दर्द शुरू हुआ। हमने डॉक्टर को फोन किया, डॉक्टर ने फोन पर इमरजंसी वाली दवाएं बताईं और अगले महीने मिलने का समय दिया।
जिस दिन हमें डॉक्टर से मिलने जाना था, उस दिन सुबह से ही खूब बर्फ गिर रही थी। किसी तरह बर्फ में गाड़ी चलाते हुए हम डॉक्टर तक पहुंचे, तो डॉक्टर ने मेरी पत्नी को देखने से मना कर दिया और कहा कि आप दस मिनट देर से आए हैं, अब दूसरे मरीज़ को बेजवह इंतज़ार करना पड़ेगा।
मैंने बहुत अनुरोध किया, उससे कहा कि आप देख ही रहे हैं कि बाहर कितनी बर्फ गिर रही है, ऐसे में इतनी देर तो स्वाभाविक है। मेरी बात पर डॉक्टर हैरान हो गया। बर्फ गिर रही है, इसलिए देर हो गई? उसने बहुत सधे हुए लहज़े में कहा कि बर्फ तो उसके लिए भी गिर रही थी, पर वो तो समय पर आया।
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जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था, तब स्कूल के किसी फंक्शन में शहर के महापौर बतौर चीफ गेस्ट आने वाले थे। हम सारे बच्चे धूप में बैठ कर उनका इंतज़ार कर रहे थे। महापौर महोदय सुबह आठ बजे आने वाले थे, हम बारह बजे तक धूप में बैठे रहे। चार घंटे बाद महापौर जी आए, पर उनके चेहरे पर रत्ती भर अफसोस नहीं था कि हम भूखे-प्यासे गर्मी में उनका इंतज़ार करते रहे। उन्होंने एक बार भी अपने देर से आने के लिए हम बच्चों से माफी नहीं मांगी थी।
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मैं पत्रकारिता में आया। तब राजेश खन्ना दिल्ली से चुनाव लड़ रहे थे। एक बार मुझे उनके साथ उनके प्रचार में रिपोर्टिंग के लिए जाने का मौका मिला। वो अपने समय से कोई तीन घंटे देर से वहां पहुंचे। तब तक राजेश खन्ना का थोड़ा जलवा बचा था, शायद यही कि तब तक फिल्मी कलाकार दर्शकों को साक्षात बहुत कम दिख पाते थे। भीड़ को रोके रहने के लिए कोई कविता पाठ कर रहा था, कोई छुटभैया नेता भाषण दे रहा था और बार-बार अनाउंस हो रहा था कि बस अब आपके चहेते राजेश खन्ना आने ही वाले हैं। मैंने राजेश खन्ना से पूछा भी था कि आपको इस बात का अफसोस नहीं कि इतनी देर से लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं? उन्होंने कहा था कि यहां इंडियन स्टैंडर्ड टाइम चलता है। इतनी देर की तो पब्लिक को आदत ही होती है।
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इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर अगर लिखने बैठा तो लिखता चला जाऊंगा, कहानी खत्म नहीं होगी। आप भी जानते हैं कि भारत में समय की कीमत लोगों की निगाह में क्या है? जब तक कम्यूटर पर दफ्तर जाने का समय दर्ज होना शुरू नहीं हुआ, मैंने किसी सरकारी अफसर को समय पर दफ्तर जाते नहीं देखा। कई बड़े लोगों की हेकड़ी ही इस बात में होती है कि वो देर से वहां पहुंचें। मैं अपने पत्रकारिता के इतने लंबे करीयर में एक पूरी लिस्ट बना सकता हूं कि कौन कहां टाइम से पहुंचता है, कौन देर से? किसे अपने देर से आने पर शर्मिंदगी महसूस होती है, किसे अकड़ महसूस होती है कि इतनी देर बाद भी लोग उसके इंतज़ार में बैठे रहे।
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मैं किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ा। देश के ज्यादातर नेताओं, अभिनेताओं से मेरा परिचय है। कांग्रेस, बीजेपी, वामपंथी दलों सबके लिए मैंने रिपोर्टिंग की है। इसलिए आज जो मैं लिखने जा रहा हूं, उसमें किसी तरह की राजनीति तलाशने की प्लीज़ कोशिश मत कीजिएगा। मेरे लिखे को एक पत्रकार, एक चैनल हेड की हैसियत से लिखा मत समझिएगा। आज मेरे लिखे को एक बेहद सामान्य आदमी की सहज टिप्पणी भर मानिएगा।
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कल मैं अपने दफ्तर की ओर से आयोजित स्वच्छ भारत कार्यक्रम में शामिल हुआ। वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आना था। तय समय के मुताबिक उन्हें शाम साढ़े आठ बजे उस कार्यक्रम में शामिल होना था। मुझे मालूम था कि प्रधानमंत्री सुबह से बिहार दौरे पर गए हैं। कई जगहों पर उनका भाषण था। अब कोई दिन भर भाषण दे, गर्मी और उमस में हज़ारों लाखों लोगों से मिले और फिर सीधे हमारे कार्यक्रम में आना हो, तो उसे कुछ देर तो हो ही जाएगी। मेरे मन में था कि आधा घंटा देर से अगर वो आए, तो कोई ख़ास बात नहीं।
मेरा यकीन कीजिए, घड़ी में आठ बज कर बीस मिनट हुए होंगे, हमें एसपीजी ने अलर्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री आ रहे हैं। और ठीक साढ़े आठ बजे प्रधानमंत्री हमारे सामने थे। आते ही उन्होंने कहा कि सारा दिन भाषण देकर उनका गला बैठ गया है, उन्होंने एक घूंट पानी पिया और कार्यक्रम में शिरकत करने बैठ गए।
मैं उनके सामने बैठा अपनी सोच में डूबा था।
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आप मुझसे समहत हों, असहमत हों। पर इतना तय है कि इससे पहले मैंने किसी नेता को समय की इस तरह इज्ज़त करते नहीं देखा था। मैं तमाम नेताओं के साथ दौरे पर गया हूं। मैं किसी का नाम नहीं लिख रहा, पर मैंने किसी को समय की इस तरह परवाह करते नहीं देखा। अभिनेताओं में अगर एक अमिताभ बच्चन को छोड़ दूं, तो ज्यादातर नेता और अभिनेता लोगों इंतज़ार कराने में ही अपनी शान समझते हैं।
मैं अपने अनुरोध को दुहरा रहा हूं कि आप मेरी आज की पोस्ट में राजनीति को मत तलाशिएगा। मैंने एक आदमी की तारीफ की है, क्योंकि मैंने उसे समय की इज्ज़त करते हुए अपनी आंखों से देखा है।
***
मां सच कहती थी। जो समय की परवाह करते हैं, समय उन्हीं की परवाह करता है।
‪#‎Rishtey‬


Crtsy-Sanjay Sinha

देश बदलने के लिए पहले हमे बदलना होगा

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आपको लगता हैं कभी इस देश में कुछ बदलेगा!!

नेता कहते हैं सारा दोष जनता का हैं जीडीपी, रुपया उनकी वजह से गिर रहा हैं और जनता सारा दोष नेताओ पर थोपती हैं| मतलब साफ हैं की कुछ भी हो हम दोषी नहीं हैं अपना दोष इस देश में बस दुसरो पर थोपने की लोगो को आदत हो गयी हैं| यहाँ तक हमें ईमानदार अधिकारी तक पसंद नहीं आते हमें रिश्वतखोर अफसर पसंद आते हैं क्योकि हम वहाँ कुछ ले देकर अपना काम जो करा लेते हैं|

यह तक नहीं मालूम लोगो को देशभक्ति कैसे दिखाई जाती हैं अधिकतर लोग तो सिर्फ सीमा पर दुश्मन देश से लड़ने को ही देशभक्ति मानते हैं, थोडा और आगे बढ़ गए तो फेसबुक और ट्वीटर पर भारत जिंदाबाद के नारे लगा लिए और खा पीकर सो गए की हम हो गए बड़े वाले देशभक्त  मतलब साफ़ हैं हमें पता ही नहीं की देशभक्ति कैसे की जाती हैं| लिवाइस की जींस और कोक पेप्सी लेज के चिप्स खाते हुए हम देश की गिरती हुई अर्थव्यवस्था पर चर्चा करते हैं और अगर कोई स्वदेशी सामान प्रयोग करने की सलाह दे तो उसका मनोबल यह कहकर तोड़ने की कोशिस करते हैं की पहले फेसबुक की प्रोफाइल बंद कर लैपटॉप फोड़ दे मोबाइल तोड़ दे यह तो हमारी सोच हैं, नहाने के लिए लक्स चाहिए खाने के लिए विदेशी पापड़ जो 10 रूपये का आलू खरीदकर 500 रुपये में बेचा जाता हैं और चिंता करेंगे जीडीपी की कौन सा दोहरा चरित्र हैं यह अपने देश के नागरिको का कि हम जीरो तकनिकी से बनी चीजे भी विदेशी खरीदना चाहते हैं|


आखिर हम कब बदलेंगे, कब हम जापान के नागरिको की तरह प्रण लेंगे की जो चीज हमारे देश में बनती हैं वह चीज हम कभी विदेशी नहीं खरींदेगे, द्वतीय विश्वयुद्ध में तबाह जापान को किसी नेता नहीं बनाया, बनाया तो उस देश के नागरिको ने बनाया आज जापानी हम हिन्दुस्तानियों को विकास के हर क्षेत्र में पीछे कोसो पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं, पर हम तो नहीं सुधरेंगे क्योकि हम बेशर्म लोग जो ठहरे, बेशर्मी हमारी राष्ट्रीय पहचान और चरित्र जो बन गयी हैं, हमने सिर्फ आरोप लगाना सिखा हैं करना तो कुछ सिखा ही नहीं ना, कोल्डड्रिंक में अगर जहर हैं तो भाई आपको क्या दिक्कत पी तो हम रहे हैं ना||  

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मेरी नजर में

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फेसबुक पर जितने भी सो काल्ड सेकुलर जो असल में तुष्टिकरण के नीति के पोषक हैं वो सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिन भर गालिया देते हैं कुछ महानुभाव तो ये भी कहते पाए गए हैं कि "हम यहाँ संघियों को सेकुलर बनाते हैं" और कुछ को संघ साम्प्रदायिक संगठन लगता हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने घर आये लोगो को कभी पानी नहीं पिलाया होगा वो नागपुर रेलवे स्टेशन के बाहर ये उम्मीद करते हैं की कोई संघी उनको स्टेशन पर मिठाई और पानी लेकर खड़ा मिलेगा, खैर ऐसा ही बहुत सा दुष्प्रचार मैं संघ के बारे में फेसबुक पर सुनती पढ़ती थी| संघ को जानने का मेरे पास कोई साधन नहीं था सिवाय इंटरनेट के और इंटरनेट की जानकारी पर मुझे ज्यादा विश्वास नहीं था, और मेरी उत्कंठा लगातार बढती जा रही थी की आखिर आरएसएस हैं क्या? आखिर में मैंने अपने शहर के संघ कार्यालय का पता किया और एक दिन अपनी एक सहेली को लेकर संघ कार्यालय पहुच गयी वहाँ मौजूद प्रचारक जो समाज सेवा के लिए घर परिवार सभी छोड़कर पूर्णकालिक संगठन के कार्यो को कर रहे हैं उनसे मुलाकात हुई परिचय के बाद बहुत देर तक उनसे संघ के इतिहास और चलाये जा रहे कार्यो के बारे में जानकारी ली, मैं पूरा टाइम उनकी आलोचना करती रही और वो पुरे धैर्य के साथ मेरी बात सुनते और उसका जवाब देते रहे मेरे कटु सवालों के सारे जवाब उन्होंने हँस कर और संतोषप्रद दिए और उन्होंने मुझे संघ की मुख्य पत्र पांचजन्य और बहुत सारी किताबे भी दी हैं पढने को, और मुझे गहन आश्चर्य हुआ यह जानकार कि संघ १२० से भी अधिक आनुसंगिक संगठनों के जरिये पूरे देश में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम कर रहे हैं। नक्सली इलाको में इनके कार्यकर्ता आदिवासी बच्चो के लिए होस्टल चला रहे हैं उनको मुफ्त शिक्षा कपडे सभी दे रहे हैं शहरी क्षेत्रो में सरस्वती शिशु मंदिरों के जरिये भारतीय संस्कृति के साथ वैज्ञानिक तरीके से लाखो बच्चो को राष्ट्रभक्त बना रहे हैं और देश को एक सभ्य और सुसंस्कृत पीढ़ी तैयार कर रहे हैं अब ये आपको तय करना हैं की आप अपने बच्चो को कान्वेंट में पढ़ाकर नशेडी और व्यभिचारी बनायेंगे जो आपको बुढापे में ओल्ड एज होम पहुचायेगा या इन मंदिरों में पढ़ा कर संस्कारवान बनायेगे| खैर बात हो रही थी संघ के कार्यो पर संघ बिना किसी सरकारी फंड के बहुत सारी समाज सेवा के कार्यो को अंजाम दे रहा हैं| जब कही प्राकृतिक आपदा आती हैं तो सरकारी सहायता के पहले संघ की सहायता पहुचती हैं भूकंप में ये हर घर से अनाज नमक मशाले दाल सब्जी एकत्र करके प्रभावित क्षेत्रो में भेजते हैं और किसी की सहायता के पहले उसके धर्म और जाति नहीं पूछते जबकि असम में जब विपदा आई तो कुछ मुस्लिम सांसदों ने ये सहायता शिविरों के बाहर बोर्ड लगाया की सहायता सिर्फ मुस्लिमो के लिए हैं और इसाई धर्म वाले इस सहायता की आड़ में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन करवाते हैं मगर संघ बिना किसी स्वार्थ के ये सहायता प्रदान करता हैं| चीन युद्ध में इनके कार्यो से प्रसन्न होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इनको आरडी परेड में शामिल किया जो अभी तक किसी भी गैर सरकारी सेवा संगठन को नहीं मिला हैं| अगर बात साम्प्रदायिकता की जाए तो मैंने इनका अखबार और किताबे पढ़ी एक भी साम्प्रदायिक बात मुझे नजर नहीं आई उल्टा ये उग्र राष्ट्रवाद की बात करते हैं और प्राणियों में धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते हैं इनके संगठन से हर धर्म के लोग जुड़े हुए हैं ये वसुधैव कुटुम्बकम “ सर्वे भवन्ति सुखिन जैसे सूत्र से सबको जोड़ने का प्रयास करते हैं अपने किसी भी स्वयंसेवक के उपनाम से ना पुकार कर नाम के आगे जी लगा कर पुकारते हैं  और ये सब  तो उन्ही को गलत लगेगा जो देशद्रोही होंगे| "नमस्ते सदा वत्सले मात्र भूमि" इतने पवित्र भाव से धरती को माँ कह कर नमस्कार करने वाले इनको देशद्रोही और वन्देमातरम का विरोध करने वाले देशभक्त लगते हैं| खुद इन्होने कभी भी कोई सेवा का काम नहीं किया होगा मगर ये आरएसएस को कोसते नजर आयेंगे वहाँ हिन्दू तकलीफ में हैं आरएसएस क्या कर रही हैं और ध्यान दीजियेगा मित्रो एक तरफ ये आरएसएस का दुष्प्रचार करके उसकी जड़े भी कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और खुद कुछ करने की अपेक्षा आरएसएस से उम्मीद लगाए बैठे हैं अरे उस संगठन की जितनी क्षमता हैं वह उतना कार्य कर रही हैं और अगर आप चाहते हैं की वह और ज्यादा काम करे तो उससे जुड़े अपना सहयोग दे वह और भी कार्य करेगी, मगर नहीं ये करेंगे तो यहाँ आलोचना कौन करेगा?  दुनिया में शायद ही कोई इस तरह से निस्वार्थ काम करने वाला संगठन होगा। आप सभी से निवेदन हैं की आप लोग भी मेरी तरह सिर्फ एक बार संघ कार्यालय पर जाए उनके कार्यो को बारे में जाने और उनसे पूछे फिर फैसला ले की क्या गलत हैं और क्या सही, और ऐसा मुझे विश्वास हैं की आप उनके बारे में एक बार जान लेंगे तो आप भी उनके मुरीद हो जायेंगे|