Showing posts with label india. Show all posts
Showing posts with label india. Show all posts

राष्ट्रधर्म

0 comments

गीता के उपदेश की सार्थकता इसी में थी कि अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार हो जाए। वह पूरे मनोयोग से युद्ध करने के लिए न केवल तत्पर ही हुआ, अपितु महाभारत युद्ध के विजेता का गौरव भी प्राप्त कर सका। उस समय केवल एक अर्जुन था, परन्तु आज की परिस्थिति में प्रत्येक भारतवासी को अर्जुन बनना पड़ेगा, तभी भगवान श्रीकृष्ण की आराधना एवं गीता का अध्ययन-मनन सार्थक हो सकेगा।महाभारत काल में वैदिक ज्ञान-विज्ञान प्रायह्न लुप्त हो चुकाथा और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था लड़खड़ा गई थी। इसके स्थान पर आत्मा के सच्च्े स्वरूप के विषय में तथा सामाजिक कर्तव्य के विषय में उस युग के तत्ववादियों के विभिन्न मतों काएक जंजाल ही दिखाई देने लगा था । अनेक सम्प्रदाय, मत, पन्थ तथा चिन्तनधाराएं उस काल में जन्म ले चुकी थीं, परिणामतः समाज लड़खड़ा रहा था और मतिभ्रम उत्पन्न हो गया था। जैसा कि वर्तमान में वैदिक ज्ञान के अभाव में अनेक मत, पंथ, संप्रदायों ने समाज को छिन्न-भिन्न और मृतप्राय बना रखा है। 
तात्पर्य यह है कि वैचारिक क्षेत्र में वर्तमान का परिदृश्य महाभारत काल के परिदृश्य से काफी मिलता-जुलता है।इन सभी मत-वादों के कारण उस काल में समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित हो चुका था तथा अकर्मण्यता भी बढ़ती जा रही थी ।उस काल की विभिन्न विचारधराओं में कुछ धाराएं उन ज्ञानमार्गियों की थीं, जो कर्म को त्याज्य व बन्धन का कारण मानते थे। आज भी हमें इस स्थिति के दर्शन होते हैं। समाज टुकड़ों में विभाजित है और समाज,संस्कृति तथा देश हित के प्रति उदासीन अकर्मण्यों की जमात बड़ीसंख्या में दिखाई दे रही है।मान लीजिए, यदि अर्जुन युद्ध से पलायन कर जाता तो क्या स्थिति बनती ? स्पष्ट है दुर्बुद्धि दुर्योधन जैसे स्वार्थी, अनाचारी और अधर्मियों की जमात बढ़ जाती और भीष्म, द्रोणाचार्य जैसे व्यक्ति उनकी हां में हां मिलाते दिखाई देते। द्रौपदियों की लाज सरेआम नीलाम होती दिखाई देती। अन्याय और हठधर्मिता का सर्वत्र साम्राज्य हो जाता। सोचिए और अपने अन्तह्नकरण में विश्लेषण कीजिए कि अर्जुन का युद्ध करना कितना उचित था ?तत्कालीन विचारधाराओं के आधार पर अर्जुन तो उस युद्ध को कठोर कर्म और पाप कर्म मानने लगा था। वह उन विचारधाराओं से इस सीमा तकप्रभावित हो चुका था कि वह स्वधर्म, क्षात्रधर्म, 'परित्राणाय साधुनां' तथा 'धर्म संस्थापनार्थाय'युद्ध कर आततायियों-अन्यायियों को मारनेके अपने उत्तरदायित्व से मुंह मोड़ने लगा था।वासुदेव कृष्ण ने अर्जुन की गलत मान्यताओं को अस्वीकार करते हुएधर्म के अनुसार उसे युद्ध करने के लिए शिक्षित और दीक्षित किया। अर्जुन ने युद्ध किया और विजय प्राप्त की। अर्जुन का यह कर्म पाप कर्म या बंधन का कारण कदापि नहीं माना जा सकता। उसने तो 'युद्धाय कृत निश्चय' के आदेश का पालन किया था।वर्तमान के संदर्भ में यदि हम विचार करें तो पाते हैं समाज की सिर्फ छिन्न-भिन्न तस्वीर। एक-दूसरे से घृणा करने वाले, धर्म की डींगे मारने वाले स्वार्थी वर्ग, जिन्होंने अपने राष्ट्रीय एवं सामाजिकउत्तरदायित्वों को भुला रखा है।वे अपनी-अपनी पूजा-उपासना में लीन हैं । भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र आदि भी पूजा-उपासना करते थे। कर्ण सूर्य पूजा करता था । किन्तु सभी ने अपनी निष्ठाएं अधर्मी दुर्योधन के लिए अर्पित कर रखी थीं।वर्तमान में देश पर छा रहे संकट के काले बादल, निर्दोष व्यक्तियों की हत्या, सामाजिक बिखराव, राजनीतिक विवशताएं, वैयक्तिक स्वार्थ, नैतिक पतन, स्वाभिमानहीनता आदि को देखते हुए यह कहना उचित प्रतीत होता हैकि भारतीय समाज उस चौराहे पर पहुंच गया है, जहां मृत्यु उसे ढूंढ रही है। ऐसी स्थिति में आशाऔर विश्वास का यदि कोई प्रकाश स्तंभ है, तो वह है गीता।गीता के संदेश को समझकर अपने राष्ट्रहित संबंधी, देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य का निर्धारण करना आवश्यक है। हमारेसामने एकमात्र लक्ष्य हो देश की रक्षा, आतंकी जेहादी हत्यारों का सर्वनाश। देश किसी भी वर्ग-संप्रदाय से बड़ा होता है। हम आपसी मतभेद भुलाकर राष्ट्रधर्म को अपनाएं। उसके लिए जीवन का समर्पण करें।इसके लिए आवश्यक है नपुंसकता को त्यागकर अर्जुन का व्रत धारण करो, गीता के अध्ययन की यही सार्थकता है। आज गीता ही हमारा संबल है। उसके मर्म को समझकर अर्जुन बनो और 'युद्धाय कृत निश्चयः'।

और उम्मीद हैं की देश बदल देंगे!!

0 comments

इस देश में खुद कोई नहीं बदलना चाहता सब सिर्फ ये चाहते हैं की दुसरे बदले, जनता सोचती हैं कि नेता गलत हैं इसलिए नेता बदले और नेता सोचते हैं की जनता गलत हैं और सारी कुव्यवस्था जनता की वजह से फैली हैं|

उसी तरह इस देश के सारे पुरुष चाहते हैं की महिलाए बदले और भारतीय संस्कृति की मिसाल बने, मगर खुद बदल कर भारतीय संस्कृति की कोई मिसाल नहीं पेश करना चाहते हैं| सारे लोग सोचते हैं लडकिया जींस पेंट क्यों पहनती हैं पर खुद जींस पेंट पहने का उन्हें क़ानूनी हक़ हैं| खुद का कैरेक्टर कितना भी ढीला हो पर लड़की से उम्मीद करते हैं की वो सती सावित्री बन कर रहे|

खुद दुनिया भर की लडकियों से इश्क लड़ाएँगे और हर बार बोलेंगे की ये मेरा सच्चा वाला प्यार हैं पर अपनी बहन का एक भी सच्चा प्यार बर्दाश्त नहीं कर पाते| खुद नौकरीपेशा रहेंगे तो सोचते हैं की घर का हर काम औरत करे पर औरत नौकरीपेशा रहे तो भी यही उम्मीद करते हैं| दिन भर संस्कृति की वकालत करते देखे जायेंगे और साथ में लडकियों सोशल साइट्स जिस पर लडकिया महिलाए सभी हैं उस पर गन्दी गन्दी गालिया देते मिल जायेंगे| 

यह हैं चरित्र हमारे देश का नागरिको का, और उम्मीद हैं की देश बदल देंगे!!

कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता हैं

1 comments

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी "रंग दे बसंती" फिल्म का नायक एक संवाद बोलता हैं की "कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता हैं" और बनाता कौन हैं उस देश का नागरिक|

पर हम क्या कर रहे हैं सिर्फ सारा दोष दुसरो पर मढ़ रहे हैं और ये मानकर चल रहे हैं की हमारी कोई गलती नहीं हैं, हमें तकलीफ हैं की इस देश में लोग भ्रष्ट्र हैं, हमें तकलीफ हैं की हम विकसित नहीं हैं हमें तकलीफ हैं की सरकार हमें रोजगार उपलब्ध नहीं करवा पा रही हैं ऐसी बहुत सी तकलीफों का रोना हम हर जगह रोते हुए दीखते हैं| दूसरी तरफ सच ये हैं की हम सिर्फ रोते हैं करते कुछ नहीं और अगर कोई करना भी चाहे तो हम उसकी टाँगे खीचने का, उसका मजाक उड़ाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते, अपने इगो को शांत करने के लिए उससे फ़ालतू के सवाल पूछते हैं ताकि वह भटक जाए और फिर वही रोना शुरू कर देते हैं की हम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं|

पहली बात तो वोट देने हमें जाना नहीं होता और जब वोट देने चले जाते हैं तो ये देखते हैं की किसने हमें बेरोजगारी भत्ता, सस्ते राशन और मुफ्त सामान देने की भीख देने की पेशकश की हैं, और अगर यहाँ से भी छूटे तो ये देखने में लग जाते हैं की कौन सा उम्मीदवार मेरी जाति का हैं फिर हम वोट ऐसे ही लोगो को दे आते हैं विकास का मुद्दा गौड़ हो जाता हैं और फिर हम रोते हैं की देश का विकास नहीं हो रहा|

दर्जनों की तादाद में बच्चा पैदा करेंगे, और रोयेंगे की सरकार रोजगार नहीं दे रही खाने को नहीं दे रही, स्वास्थ्य सेवाए नहीं उपलब्ध करवा पा रही मगर अपनी तैयार की हुई फौज नहीं देखेंगे की कितनी भी सुविधाए उपलब्ध करवा दी जाए पर उस फौज के लिए कम ही पड़ेगी|

दो रुपये की पेप्सी और चिप्स के रूप में हवा खरीद कर खायेंगे पर वही देशी आयटम नहीं खायेंगे तो रोजगार कैसे बढेगा, जब विदेशी चीजे ही हम प्रयोग करेंगे तो अपने देश में बना हुआ माल कौन खरीदेगा सरकार को सुविधाए देने के लिए टैक्स कैसे मिलेगा| मगर नहीं सारी गलती तो सरकार की होती हैं हम तो जनता हैं हमारी कोई गलती नहीं, और हमारा देश अच्छा नहीं इसमें रहने लायक नहीं|