बिहार के जंगलराज की यादें

लालू के राज के दौरान बिहार ज्यादा आना जाना नहीं हुआ पर एक यात्रा 1998 में बिहार
की हुई कानपुर से बोकारो तक। बोकारो तब
बिहार में ही था। एक शादी में शामिल होना
था। गए तो रेल गाड़ी से थे (कानपुर से गोमो
और फिर वहां से एक और ट्रेन), पर वापसी की
गाड़ी गोमो या किसी और पास के स्टेशन से
थी और बोकारो से वहां तक के लिए उस वक़्त
कोई ट्रेन नहीं थी। तो बस अड्डे गए कि बस से
चले चलते हैं। पर वहां पर बहुत भीड़ थी और कोई
बस वाला छोटी दूरी के लिए सीट देने को
तैयार नहीं था। सब प्राइवेट बसें चल रही थी।
बचपन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीता था और
वहां रोडवेज और प्राइवेट वालों का अलग अलग
बस अड्डा होता था। मैंने पास खड़े एक सज्जन
से पूछा की "ये रोडवेज़ का बस अड्डा है तो
यहाँ पर बिहार रोडवेज की बस क्यों नहीं लगी
है"। तो उन्होंने बताया कि "रोडवेज की बस
नहीं हैं"। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मुझे लगा
कि ये बोल रहे होंगे कि अभी कोई रोडवेज बस
नहीं है वहां के लिए जहाँ मुझे जाना है। फिर मैंने
पुरे बस अड्डे पे नज़र घुमाई पर वहां कोई भी
रोडवेज की बस नहीं दिखी। तो मैंने फिर उन
सज्जन से पूछा कि "रोडवेज की कोई भी बस
क्यों नहीं है यहाँ? क्या रोडवेज का अड्डा
कहीं और शिफ्ट हो गया है?" इस पर वो बोले
कि "अभी बताया तो था कि रोडवेज की बस
नहीं हैं"। मुझे फिर भी ठीक से समझ नहीं आया।
मैंने बोला कि "क्या मतलब, रोडवेज है तो बसें
भी होंगी ना?", वो बोले कि "यही तो
आपको बता रहा हूँ कि यहाँ रोडवेज है पर उसके
पास चलने लायक बसें नहीं हैं इसलिए रोडवेज की
कोई बस सर्विस नहीं है बोकारो से"। वो मेरा
बिहार के कुशाषन का पहला और एकमात्र स्वयं
का अनुभव था। बस यात्रा के दौरान ये भी
पता चला की केवल रोडवेज की बसें ही गायब
नहीं हैं, रोड भी गायब है। खैर हमको तो थोड़ा
ही दूर जाना था किसी तरह लटक के चले गए
प्राइवेट बस से हिचकोले और धक्के खाते हुए पर
उसके बाद सोचता रहा की कैसे काम चलता
होगा लोगों का बिहार में। फिर समझ में आया
की बिहार के लोगों का रेल गाड़ी से इतना
प्रेम क्यों हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी बहुत समय
बिताया था पर वहां भी, जैसी भी हों, UP
रोडवेज की बसें चलती तो थीं नियमित रूप से।
उत्तराखंड (तब UP में ही था) में UP रोडवेज की
बसें नहीं थी ज्यादा पर हर एक दो घंटे में
ऋषिकेश से हर जगह के लिए रोडवेज की बसें फिर
भी थीं और GMO/TGMO की अच्छी बसें
रोडवेज जैसे ही सर्विस चलाती थी। ऐसा
पहली बार देखा था कि रोडवेज तो है पर बस
सर्विस सर्विस नहीं हैं उनकी। उसी साल बाद में
कर्नाटक और तमिलनाडु पहली बार जाना
हुआ। तब पता चला की सरकारी बसें कैसे बहुत
अच्छे से मेन्टेन रहती हैं और सड़कें कैसे बिना
गड्ढों के भारत में भी हो सकती हैं।

संस्मरण- अतुल कुमार

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