मोदी जी की विदेश नीति, और हमारी जरूरत !!

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अगर देखा जाये तो हम चारो तरफ से दुश्मन देशो से घिरे हुए हैं, और इन सभी से हमारे कटुतापूर्ण सम्बन्ध हैं। हम अब तक अपने पड़ोसियों से पाँच युद्ध लड़ चुके हैं और इन पाँचो युद्धों में से चार जीते और एक हारे हैं। अभी कदरन चीन को छोड़कर अपने हर पड़ोसी मुल्क से हम मजबूत सैन्य स्थिति में हैं और चीन से युद्ध की स्थिति में हम तो बर्बाद होंगे ही पर चीन युद्ध जीतकर भी खण्डहर बन जाएगा। यह स्थिति चीन भलीभांति समझता हैं और वह हमसे सीधा युद्ध ना करके हमारे ऊपर मानसिक दबाव बनाते हुए छदम युद्ध लड़ना चाहता हैं। इसके लिए वो बंगलादेश, पाकिस्तान श्रीलंका, म्यांमार आदि भारत के पड़ोसी देशों में अपने नवसैनिक अड्डे बना रहा हैं जिसमे से श्रीलंका का अड्डा फिलहाल मोदी सरकार की कूटनीति की वजह से महेंद्र राजपक्षे ने बन्द करा दिया हैं। स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नाम की चीन की एक ऐसी चाल जिसके जरिये भारत पर चीन कब्ज़ा करना चाहता है । यह एक ऐसी चाल है जिसके जरिये चीन भारत की सीमाओं पर बसे देशो से अच्छे सम्बन्ध बना कर उनके यहाँ बन्दरगाह ले रहा है । चीन कहता है इसका प्रयोग वो व्यापार के लिए करेगा पर इतिहास गवाह है चीन अपने व्यापार को मिलेट्री-सहायता देने में गुरेज नहीं करता है। जैसा कि हर देश को करना चाहिए । 15वीं
सदी के शुरुआत में जब चीन के मिंग-राजवंश ने अपना समुद्री-काफिला व्यापार करने के लिए दुनियाभर में भेजा था तो उसके साथ पूरे 72 युद्धपोत भेजे थे, ताकि उन्हे समुद्री-डकैतों और विरोधी देशों की नौसेनाओं से मुकाबला किया जा सके ।

'स्ट्रिंग ऑफ़ पलर्स' के तहत चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हम्बनटोटा, बर्मा में कोको द्विप, दक्षिण चीन सागर में हेनान द्वीप आदि पर कब्ज़ा करता चला जा रहा है । चीन की इस चाल का खुलासा अमेरिका ने 2005 में ही कर दिया था क्यूकि दक्षिण चीन सागर से बन रहे है इस जाल का अंत अमेरिका को घेरने तक का है लेकिन भारत सरकार सोती रही । भारत ने इस पर ध्यान 2011 में दिया और तब तक हम घिर चुके थे । इस मामले में बड़ी बेवकूफी हमारी पूर्व सरकारों की रही है जिन्होंने कभी पड़ोसियों को अपना नही बनाया और आज आप मोदी के बारे में इसीलिए सुन रहे हैं कि भारत का कोई प्रधानमन्त्री इतने साल बाद नेपाल गए, इतने साल बाद जापान गए, इतने साल बाद मोरोशिस गए । मित्रो हमारे पड़ोसी देशो को पूर्व सरकारों ने कोई  अहमियत नही दी जिसका फायदा चीन ने उठाया और हालात आपके सामने हैं चीन इसी तरह  युध्द का समीकरण पाकिस्तान बंगलादेश को अपनी तरफ मिलाकर बनाएगा। इसके लिये वो दोनों देशो में भारी मात्रा में निवेश और अनुदान दे रहा हैं, साथ ही साथ सस्ती कीमतों पर अत्याधुनिक हथियार भी उपलब्ध करवा रहा हैं। आप समझिये की भारत की तीनो सीमाओ पर एक साथ आक्रमण हो और भारत में भी विद्रोह के स्वर उठने लगे तो क्या दयनीय स्थिति होगी भारत की। नेपाल, भूटान, श्रीलंका आदि देशो से हम सांस्कृतिक विरासत साझा करते हैं यह हमसे युद्ध नही लड़ेंगे परन्तु पूर्ववर्ती सरकारों के नकारत्मक व्यवहार की वजह से हमारा साथ भी नहीं देंगे।


मोदी जी पहले राजनेता हैं जिन्होंने इस स्थिति को भलीभांति समझा, उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह में सभी राष्टाध्यक्षो को बुलाया और सभी देशों का दौरा कर उनके साथ अपने पुराने रिश्तों की बात कर, उन्हें आर्थिक मदद दे अपने पाले में करने की कोशिस की। भूटान, नेपाल को आर्थिक सहायता प्रदान कर उनके विकास में भागीदारी की वचनबद्धता दोहराई, और इन देशो की जनता के साथ हुक्मरानो तक के दिलो में अपनी जगह बना ली। इसके बाद वो चीन को सामरिक मोर्चे पर घेरने की कोशिस कर रहे हैं। जापान, वियतनाम और मंगोलिया ये सभी देश चीन की विस्तारवादी नीति से परेशान हैं, जिसमे से वियतनाम मंगोलिया बेहद गरीब हैं जिसकी वजह से अक्षम हैं और जापान की सेना के पास मैन पावर नही हैं। मोदी जी इन्हें आपस में जोड़कर साझा शक्ति बनाने का प्रयास कर रहे हैं जिससे चीन के ऊपर दबाव बनाया जा सके।

यह हमारी जरूरत हैं अगर हमने ऐसा नहीं किया तो तिब्बत जैसा हाल हमारा होगा और ISIS के खूंखार लड़ाके हमारे यहाँ भी सीरिया और ईराक जैसी खून की होली खेलते नजर आएंगे। इसलिए मोदी जी की विदेश यात्राओ पर सन्देह मत कीजिये वो वह काम कर रहे हैं जिसको पहले की सरकारो ने नहीं किया।

(पोस्ट में कुछ तथ्यात्मक जानकारी विशाल माहेश्वरी द्वारा उपलब्ध करायी गयी हैं)

चिकित्सा सेवाओ में मची लूट !!

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आपने गौर किया, की आजकल हॉस्पिटल में जितने भी बच्चे पैदा होते हैं सभी सिजेरियन होते हैं, ना के बराबर नार्मल डिलेवरी होती हैं। अभी जेस्ट एक मूवी "गब्बर" देखी, उसका एक सीन देखकर मैं सोचने लगी की पिछले पाँच साल में मेरे परचित कितनी महिलाओ को नॉर्मल डिलेवरी हुई और कितने बच्चे सिजेरियन से पैदा हुए? आश्चर्य होगा जानकार की मेरी जानकारी में पिछले पाँच साल में एक भी नार्मल डिलेवरी नहीं हुई सिर्फ उन केसेज को छोड़कर जिनमे घरवाले किसी प्राइवेट नर्सिंग होम का खर्च नहीं उठा सकते हैं। क्या मतलब निकालूँ इसका, की डॉक्टर्स ने इसको धंधा बना लिया हैं या वाकई में आज नार्मल डिलेवरी हो ही नहीं सकती?

दरअसल हम कभी गम्भीरता से सोचते ही नहीं, और मेडिकल प्रोफेशन एक प्रकार की मोनोपॉली चलाता हैं और इन सभी के बीच गजब की एकता होती हैं। पहले से डर के मारे सूखे मरीज को थोड़ा और डराओ, उनके मेडिकल लैग्वेज में कम्प्लिकेशन समझाओ और बाकी का काम मरीज के रिश्तेदार कर डालते हैं की "अरे सभी का तो आजकल ऐसे ही हो रहा हैं, कुछ पैसे के चक्कर में रिस्क क्यों लेना?" और हो गयी डॉक्टरों की चाँदी प्रेगनेंट होने के बाद से लेकर डिलेवरी तक कभी ये टेस्ट करना तो कभी वो टेस्ट करना और फिर सिजेरियन मतलब की जैसे खाने में नमक स्वादानुसार होता हैं वैसे ही एक बच्चा पैदा होने में आपकी औकतानुसार धन लगवा देता हैं। अगर आपके पास पैसा नहीं हैं तो वही बच्चा बिना किसी परेशानी के दुनिया में आ जाता हैं चिकित्सा सेवाओं में यह लूट सिर्फ यही तक सिमित नहीं हैं, मामूली सर्दी जुखाम हो जाए बुखार हो जाए और आप गलती से डॉक्टर के पास चले जाए तो बेमतलब के फ़ालतू टेस्ट के जरिये आपको डराकर आपसे हजारों रूपये के टेस्ट करा लिए जाते हैं। आप और हम सभी ने यह अनुभव किया हैं पर हमने ध्यान नही दिया, आवाज नही उठायी आइये मिलकर आवाज उठाते हैं क्योकि यह भी करप्शन हैं और डॉक्टर कोई भगवान नहीं बल्कि
व्यापारी हैं।