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एक पुत्री का पत्र अपने माता पिता के नाम..

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आदरणीय माँ एवं पिताजी,
सादर प्रणाम
 

हम लोग यहाँ पर कुशल पूर्वक हैं आशा है कि आप लोग भी सकुशल होगे| रक्षाबंधन के सुअवसर पर आप लोगों के लिए राखी भेज रही हूँ| कैसे हैं आप लोग? आप लोग अपने स्वास्थ्य का अब अतिरिक्त ध्यान देना आरम्भ कर दें साथ ही पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने में अपना जीवन अब अधिक नष्ट न करें| ईश्वरीय अनुकम्पा से आपके बच्चे योग्य व सक्षम हैं तथा संस्कारयुक्त भी हैं आपके प्रति अपना कर्तव्य निभाने से वो कभी पीछे नहीं हटेंगे ऐसा आपका ही पूर्ण विश्वास है| आप भाग्यशाली है कि आपको ईश्वरीय स्वरुप अपने नाती पोतों के साथ जीवन की सांध्य बेला में रहने का सुअवसर प्राप्त है| जीवन संध्या में भरे पूरे परिवार में गुजर बसर करना आज के युग में कम लोगों को ही नसीब है| कष्ट प्रत्येक जगह है अकेले रहने में भी और साथ में रहने में भी| जहां बर्तन होंगे खटकेगें भी, काबिलियत इसी में है की खटकने की कम से कम आवाज आये| समय बहुत बलवान होता है समय के साथ इंसान के जीवन में बहुत से सुधार स्वतः आ जाते हैं और जो नहीं बदलने का प्रयत्न करता है या समय का सिखाया सबक नहीं समझाने या याद करने का प्रयत्न करता है वो स्वयं जिम्मेदार होता है अपने लिए| बाकी स्वर्ग नरक सब इसी पृथ्वी पर है हमारे अच्छे बुरे कर्मों का भोग तो हमें यहीं भोगना ही है कोई किसी की नियति नहीं बदल सकता है बस ईश्वर से प्रार्थना ही की जा सकती है की सब स्वस्थ व प्रसन्न रहें|
 

मानव जीवन अनमोल है बार बार नहीं मिलता अभी तक तो कर्तव्यों के निर्बहन में ही सारा समय निकल गया जैसे अब हम लोगों का निकल रहा है अब शेष समय व्यर्थ न करें तथा कुछ वर्ष अपने लिए जियें, दुनिया के झमेलों से अपने को दूर रखें क्योंकि अपनी अपनी नाव तो किनारे तक सबको ले के जानी ही है आप कब तक हाथ लगा सकेंगें| स्वस्थ व प्रसन्न रहने का प्रयत्न करें तथा बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दें आपके अनुरूप कोई चल रहा है तो बहुत अच्छा नहीं चल पा रहा है तो कष्ट न लें मन में| क्योंकि हर व्यक्ति अपने को सही समझ के अपने अनुसार ही चलना चाहता है ये एक कटु सत्य है| तो जहां आपकी या आपके सुझाव की आवश्यकता हो वहीं तक सीमित कर लें अपने को बाकी अब आपका समय अपने और अपने समाज के लिए रखें|
 

बच्चों के प्रति कभी माता पिता अपने मन में दुर्भाव रख ही नहीं सकते चाहे बच्चा एक हो या चार, शरीर का हर टुकड़ा उतना ही महत्वपूर्ण तथा प्रिय है सबके लिए, पर ये बात समझने में अधिकतर बच्चों को उतना ही समय लग जाता है जितनी माता-पिता को पृथ्वी से आकाश तक की दूरी तय करने में लगता है| पर दुनिया के सभी माता पिता की यही नियति है, जिसे कोई भी बदल नहीं सकता तो मन में कष्ट लेने से किसी भी बात का कोई लाभ नहीं| बस ईश्वर से सबके लिए सद्बुद्धि मांगना ही श्रेष्ठ है|
 

अपेक्षा ही सभी समस्याओं की जड़ है किसी से कोई अपेक्षा रखी ही क्यों जाए? हर व्यक्ति के विचार अलग हैं संस्कार अलग हैं एक ही माता-पिता की चार संताने जो एक ही संस्कार युक्त वातावरण में पली हैं एक सी नहीं होती तो पुत्रवधुएँ तो फिर भी अलग अलग परिवेश तथा परस्थितियों से आई हुई होती हैं| प्रत्येक स्त्री का विवाह के पश्चात एक तरह से पुनर्जन्म होता है कुछ नए जन्म तथा परिस्थितियों को स्वीकार कर दाल में नमक की तरह मिल जाती हैं और कुछ नहीं ढाल पाती खुद को नए परिवेश में| दोष किसी का नहीं है बस कच्ची और पक्की मिट्टी का है| इसलिए क्यों किसी से कोई आशा रखी जाए चाहे वो अपना है या पराया? बस अपनी परिवार की थाती यदि हम सम्हाल पायेंगें तो आगे परिवार का नाम स्वर्णाक्षरों में चलता रहेगा नहीं सम्हाल पाए नाम तो तब भी चलेगा ही| जीवन है ही चलते रहने का नाम| अपनों के अपने तो सभी बनकर रह ही लेते हैं परायों को अपना बनाना ही हमारी भारतीय संस्कृति रही है इसी कारण विवाह बंधन में बंधने के बाद बेटी का घर बहू का बन जाता है सारे अधिकार बहू के हो जातें हैं बस अधिकार देने के साथ साथ कुछ कर्तव्यों के निर्वहन की भी अपेक्षा की जाती है जिनमें कुछ बेटियाँ खरी उतर जाती हैं तथा कुछ नहीं उतर पातीं| लेकिन दोनों ही परिस्थिति में रहती तो वो उसी परिवार का हिस्सा ही हैं जहां ब्याह कर आईं हैं| रिश्ते तो निभाने ही पड़ते हैं बस कहीं खुशी और प्यार सम्मान के साथ और कहीं मजबूरी में| पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण की होड़ में समायोजन की प्रवृत्ति अब धीरे धीरे विलुप्त होती जा रही है जिसका दुष्प्रभाव हम सभी के जीवन पर पड़ रहा है यही कारण है कि अब हम पहले की तरह खुल कर हंस बोल नहीं पाते हैं समय का फेर है ये सब जिसे हम बदल नहीं सकते अतः इस विषय में न सोचना ही बेहतर है|
 

बहुत सी ऐसी अधूरी या अनछुई इच्छाएं हर व्यक्ति के मन में होती हैं जीवन की आपाधापी तथा भागदौड़ में पीछे छूटती चली जातीं हैं अब उन्हें याद करके लिखने का प्रयत्न कीजिये तथा उनमें से कुछ पूरी करने का भी| भगवान की कृपा से आपके बच्चे भी इस योग्य हैं कि आपके सपने या अभिलाषा पूर्ण करने की दिशा में आपको अपना पूरा योगदान दे सकते हैं पर प्रथम कदम तो आपको ही उठाना होगा तथा संकल्पित होना होगा अपने लिए जीने हेतु|
 

बच्चे किसी के बुरे नहीं होते परिस्थितियाँ बुरी होती हैं बस कुछ लोग अपनी दृढ इच्छाशक्ति से परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं और कुछ नहीं कर पाते और यही इच्छा शक्ति की कमी समस्त समस्याओं की जड़ है| बाकी जिस दौड़ को आप पूरी कर चुकें हैं हम लोग उसमें अब भाग ले रहें हैं पूरी तो करनी ही होगी हमें भी और पता नहीं क्या क्या पीछे छूटता चला गया है अब तक और आगे भी छूटना बाकी है हमें स्वयं नहीं पता| बस ईश्वर से ये प्रार्थना ही कर सकते हैं हम लोग कि सफलता पूर्वक अपने उत्तरदायित्व पूर्ण कर सकें तथा ताकि हमारी दौड़ पूर्णता को प्राप्त हो सके| आप लोगों के शुभाशीष के बिना असंभव है हमारे लिए यह कार्य| बस आपका वरद हस्त हमारे ऊपर बना रहे और आपके जीवन से प्रेरणा लेते हुए हम आगे बढ़ सकें यही कामना है|
शेष शुभ है|
आपकी बेटी....


भावना शुक्ला