उदारीकरण छोडिये और देश हित में कठोर निर्णय लीजिये !!

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आज देश बहुत बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा हैं। चालु वित्त खाते का घाटा बेकाबू हो चूका है। चालु वित्त खाता देश की साख ही नहीं आर्थिक ताकत का बैरोमीटर कहा जाता है। इसको आप ऐसे समझ सकते हैं कि डॉलर चुकाकर विदेश से मंगवाए गए माल और विदेशी मुल्को को बेचकर कमाए गए डॉलर का अंतर ही- चालु वित्त खाते का घाटा कहा जाता हैं। जो अब इतना बेकाबू हो गया हैं कि देश की लाज यानि की देश का सोना गिरवी रख कर इसे पाटने की बात हो रही हैं जो हम सभी भारतीयों के लिये डूब मरने जैसी बात हैं।
अब यह हालत क्यों कर हुए जबकि देश को सँभालने वाले पीएम से लेकर वित्तमंत्री तक अर्थशास्त्री है फिर भी बनिया की मामूली गणित समझने में नाकाम रहे। खैर अब देश की हालत ऐसी क्यों हुई इस पर चर्चा करना निरर्थक है क्योकि इससे कोई लाभ नहीं होने वाला हैं।
पर हम सभी भारतीय इस संकट की घडी में देश और सरकार के साथ हैं। हम आपसे अपील करते हैं की इस घाटे को रोकने के लिए उदारीकरण पर आंशिक प्रतिबन्ध लगाया जाए, जीरो टेक्नोलाजी से बनी विदेशी चीजो पर पूर्णतया प्रतिबन्ध लगाया जाए, स्वास्थ्य सम्बन्धी हवाले देकर विदेशी खाने पीने की चीजो को बाजार में जाने से रोका जाए ऐसा विदेशी मुल्क भी हमारे देश के सामान के साथ करते हैं। देशी उद्योग धंधे को बढ़ावा दिया जाए उनके सामान सरकार खुद विदेशी बाजार में पहुंचाए। विदेशी सामान पर भारी आर्थिक कर लगा कर उनको महंगा किया जाए, उसके विपरीत देशी सामान पर कर घटा कर उन्हें सस्ता किया जाए। लग्जरी आयटम्स, निजी उपयोग के ऑटोमोबाइल्स पर भारी बिक्रीकर लगाया जाए ताकि जनता ताकि जनता उसे खरीदने में ह्तोउत्सहित महूसस करे।
सबसे जरुरी पेट्रोलियम का कोटा निर्धारित किया जाए, निजी उपयोग के वाहनों के पेट्रोल को मँहगा किया जाए उसके विपरीत सार्वजानिक उपयोग के पेट्रोलियम को सस्ता किया जाए।
इस तरह के तरीके और कठोर निर्णय से हम चालु खाते का घाटा नियंत्रित कर सकते है, प्रधानमंत्री जी देश की जनता के नाम सन्देश भी दे की देश की कोमा में पड़ी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सभी देशवासी स्वदेशी सामान का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करे मुझे उम्मीद है देश की जनता भले आप पर कितना भी अविश्वास कर रही हो पर अगर आप सच्चे दिल से देश की जनता की मदद मांगेगे तो भारत की देशभक्त जनता देश के लिए अपना खून तक बहा देगी और बहुत से मौके पर हम भारतीयों ने ऐसा करके दिखाया भी हैं।
अगर हम जैसे जिन्हें आप जैसे महान लोग दो कौड़ी का सड़क का आदमी समझते है कि सलाह बेहतर लगे तो देश के भले के लिए ये कठोर कदम उठाये, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है देश के हालत फिर सुधर जायेंगे।

एक और तुगलकी बिल "फ़ूड सिक्युरिटी बिल"

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क्या आपको लगता हैं की इस देश का कुछ होगा??

सारे नेता और दल सिर्फ जनता को भिखारी बनाने पर तुले हैं, दो रुपिया में चावल लो गेंहू लो लैपटॉप लो बेरोजगारी भत्ता लो और ना जाने क्या क्या ....

और मुर्ख जनता विरोध भी नहीं करती की ये भीख नहीं रोजगार दो...

पूरी  दुनिया के किसी भी  देश में कोई भी सरकार इस तरह बिना मेहनत के कोई भी सुविधा जनता को नहीं देती, पर भारत की जनता को निकम्मा और उनकी सोचने समझने की ताकत छिनने के लिए सिर्फ यही यह सुविधा दी जा रही हैं जिसका सबसे बड़ा असर भारत के मध्यवर्ग पर पड़ेगा| भारत का मध्यवर्ग ही भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं उसकी छोटी छोटी बचत दीर्घकालिक होती हैं जो अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करती हैं| जब सारा विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में था तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था सिर्फ मध्यवर्ग की बचत के भरोसे बची रही, परन्तु अब जब भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर पर हैं उस समय राजकोष पर बोझ बनेगी और यह पैसा सीधे टैक्स के माध्यम से मध्यवर्ग से वसूला जाएगा| जो मध्यवर्ग बढती महगाई की वजह से पहले से परेशान हैं वह और गरीब होगा यानी की देश में गरीबो की संख्या भी बढ़ेगी और मध्य वर्ग जो अपनी दीर्घकालिक बचत से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता था वह बढती महँगाई में संभव नहीं होगा|

यानी की रुपये के अवमूल्यन  और पेट्रोलियम का बढ़ता रेट और उस पर यह तुगलकी फ़ूड सिक्युरिटी बिल देश को आर्थिक मंदी के गर्त में धकेल देंगा|

एक पुत्री का पत्र अपने माता पिता के नाम..

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आदरणीय माँ एवं पिताजी,
सादर प्रणाम
 

हम लोग यहाँ पर कुशल पूर्वक हैं आशा है कि आप लोग भी सकुशल होगे| रक्षाबंधन के सुअवसर पर आप लोगों के लिए राखी भेज रही हूँ| कैसे हैं आप लोग? आप लोग अपने स्वास्थ्य का अब अतिरिक्त ध्यान देना आरम्भ कर दें साथ ही पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने में अपना जीवन अब अधिक नष्ट न करें| ईश्वरीय अनुकम्पा से आपके बच्चे योग्य व सक्षम हैं तथा संस्कारयुक्त भी हैं आपके प्रति अपना कर्तव्य निभाने से वो कभी पीछे नहीं हटेंगे ऐसा आपका ही पूर्ण विश्वास है| आप भाग्यशाली है कि आपको ईश्वरीय स्वरुप अपने नाती पोतों के साथ जीवन की सांध्य बेला में रहने का सुअवसर प्राप्त है| जीवन संध्या में भरे पूरे परिवार में गुजर बसर करना आज के युग में कम लोगों को ही नसीब है| कष्ट प्रत्येक जगह है अकेले रहने में भी और साथ में रहने में भी| जहां बर्तन होंगे खटकेगें भी, काबिलियत इसी में है की खटकने की कम से कम आवाज आये| समय बहुत बलवान होता है समय के साथ इंसान के जीवन में बहुत से सुधार स्वतः आ जाते हैं और जो नहीं बदलने का प्रयत्न करता है या समय का सिखाया सबक नहीं समझाने या याद करने का प्रयत्न करता है वो स्वयं जिम्मेदार होता है अपने लिए| बाकी स्वर्ग नरक सब इसी पृथ्वी पर है हमारे अच्छे बुरे कर्मों का भोग तो हमें यहीं भोगना ही है कोई किसी की नियति नहीं बदल सकता है बस ईश्वर से प्रार्थना ही की जा सकती है की सब स्वस्थ व प्रसन्न रहें|
 

मानव जीवन अनमोल है बार बार नहीं मिलता अभी तक तो कर्तव्यों के निर्बहन में ही सारा समय निकल गया जैसे अब हम लोगों का निकल रहा है अब शेष समय व्यर्थ न करें तथा कुछ वर्ष अपने लिए जियें, दुनिया के झमेलों से अपने को दूर रखें क्योंकि अपनी अपनी नाव तो किनारे तक सबको ले के जानी ही है आप कब तक हाथ लगा सकेंगें| स्वस्थ व प्रसन्न रहने का प्रयत्न करें तथा बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दें आपके अनुरूप कोई चल रहा है तो बहुत अच्छा नहीं चल पा रहा है तो कष्ट न लें मन में| क्योंकि हर व्यक्ति अपने को सही समझ के अपने अनुसार ही चलना चाहता है ये एक कटु सत्य है| तो जहां आपकी या आपके सुझाव की आवश्यकता हो वहीं तक सीमित कर लें अपने को बाकी अब आपका समय अपने और अपने समाज के लिए रखें|
 

बच्चों के प्रति कभी माता पिता अपने मन में दुर्भाव रख ही नहीं सकते चाहे बच्चा एक हो या चार, शरीर का हर टुकड़ा उतना ही महत्वपूर्ण तथा प्रिय है सबके लिए, पर ये बात समझने में अधिकतर बच्चों को उतना ही समय लग जाता है जितनी माता-पिता को पृथ्वी से आकाश तक की दूरी तय करने में लगता है| पर दुनिया के सभी माता पिता की यही नियति है, जिसे कोई भी बदल नहीं सकता तो मन में कष्ट लेने से किसी भी बात का कोई लाभ नहीं| बस ईश्वर से सबके लिए सद्बुद्धि मांगना ही श्रेष्ठ है|
 

अपेक्षा ही सभी समस्याओं की जड़ है किसी से कोई अपेक्षा रखी ही क्यों जाए? हर व्यक्ति के विचार अलग हैं संस्कार अलग हैं एक ही माता-पिता की चार संताने जो एक ही संस्कार युक्त वातावरण में पली हैं एक सी नहीं होती तो पुत्रवधुएँ तो फिर भी अलग अलग परिवेश तथा परस्थितियों से आई हुई होती हैं| प्रत्येक स्त्री का विवाह के पश्चात एक तरह से पुनर्जन्म होता है कुछ नए जन्म तथा परिस्थितियों को स्वीकार कर दाल में नमक की तरह मिल जाती हैं और कुछ नहीं ढाल पाती खुद को नए परिवेश में| दोष किसी का नहीं है बस कच्ची और पक्की मिट्टी का है| इसलिए क्यों किसी से कोई आशा रखी जाए चाहे वो अपना है या पराया? बस अपनी परिवार की थाती यदि हम सम्हाल पायेंगें तो आगे परिवार का नाम स्वर्णाक्षरों में चलता रहेगा नहीं सम्हाल पाए नाम तो तब भी चलेगा ही| जीवन है ही चलते रहने का नाम| अपनों के अपने तो सभी बनकर रह ही लेते हैं परायों को अपना बनाना ही हमारी भारतीय संस्कृति रही है इसी कारण विवाह बंधन में बंधने के बाद बेटी का घर बहू का बन जाता है सारे अधिकार बहू के हो जातें हैं बस अधिकार देने के साथ साथ कुछ कर्तव्यों के निर्वहन की भी अपेक्षा की जाती है जिनमें कुछ बेटियाँ खरी उतर जाती हैं तथा कुछ नहीं उतर पातीं| लेकिन दोनों ही परिस्थिति में रहती तो वो उसी परिवार का हिस्सा ही हैं जहां ब्याह कर आईं हैं| रिश्ते तो निभाने ही पड़ते हैं बस कहीं खुशी और प्यार सम्मान के साथ और कहीं मजबूरी में| पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण की होड़ में समायोजन की प्रवृत्ति अब धीरे धीरे विलुप्त होती जा रही है जिसका दुष्प्रभाव हम सभी के जीवन पर पड़ रहा है यही कारण है कि अब हम पहले की तरह खुल कर हंस बोल नहीं पाते हैं समय का फेर है ये सब जिसे हम बदल नहीं सकते अतः इस विषय में न सोचना ही बेहतर है|
 

बहुत सी ऐसी अधूरी या अनछुई इच्छाएं हर व्यक्ति के मन में होती हैं जीवन की आपाधापी तथा भागदौड़ में पीछे छूटती चली जातीं हैं अब उन्हें याद करके लिखने का प्रयत्न कीजिये तथा उनमें से कुछ पूरी करने का भी| भगवान की कृपा से आपके बच्चे भी इस योग्य हैं कि आपके सपने या अभिलाषा पूर्ण करने की दिशा में आपको अपना पूरा योगदान दे सकते हैं पर प्रथम कदम तो आपको ही उठाना होगा तथा संकल्पित होना होगा अपने लिए जीने हेतु|
 

बच्चे किसी के बुरे नहीं होते परिस्थितियाँ बुरी होती हैं बस कुछ लोग अपनी दृढ इच्छाशक्ति से परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं और कुछ नहीं कर पाते और यही इच्छा शक्ति की कमी समस्त समस्याओं की जड़ है| बाकी जिस दौड़ को आप पूरी कर चुकें हैं हम लोग उसमें अब भाग ले रहें हैं पूरी तो करनी ही होगी हमें भी और पता नहीं क्या क्या पीछे छूटता चला गया है अब तक और आगे भी छूटना बाकी है हमें स्वयं नहीं पता| बस ईश्वर से ये प्रार्थना ही कर सकते हैं हम लोग कि सफलता पूर्वक अपने उत्तरदायित्व पूर्ण कर सकें तथा ताकि हमारी दौड़ पूर्णता को प्राप्त हो सके| आप लोगों के शुभाशीष के बिना असंभव है हमारे लिए यह कार्य| बस आपका वरद हस्त हमारे ऊपर बना रहे और आपके जीवन से प्रेरणा लेते हुए हम आगे बढ़ सकें यही कामना है|
शेष शुभ है|
आपकी बेटी....


भावना शुक्ला

आखिर आज अमिताभ बच्चन की आलोचना क्यों?

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आज सारे लोग अमिताभ की बुराई कर रहे हैं क्यों भला?

जबरदस्ती झूठी विडियो बनाकर जनता को बेवकूफ किसने बनाया, और हाँ इस बार अमिताभ पूरी तरह सही हैं क्योकि उनके नाम का इस्तेमाल कोई राजनैतिक फायदे के लिए नहीं कर सकता और ऐसा करने का किसी को हक़ भी नहीं| झूठी अफवाहे फैलाकर अगर किसी के पक्ष में आप माहौल खड़ा करने का प्रयास कर रहे हो तो यकीन मानो की आप अपने नेता या संगठन का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हो क्योकि जब भोलीभाली जनता को आपके झूठ का पता चलेगा तो वो आपसे ही नहीं आपके संगठन से भी नफरत करने लगेगी| उसका भरोसा आप से उठ जाएगा और जब एक दिन आप सच्ची बात भी लोगो को बताओगे तो लोग आपको झूठा ही समझेंगे|

और यह झूठी खबरे फैलाने वालो के लिए भी एक सबक हैं की अब भी वक्त हैं इस तरह से झूठ के कंधो पर चढ़ कर सच्चाई की कोई भी जंग नहीं जीती जा सकती|

अफ़सोस तब होता हैं जब लोग ये नहीं समझ पाते की आलोचना किस बात की होनी चाहिए, खैर मैं आप सबको याद दिलाना चाहुँगी की आज से कुछ महीने पहले अमिताभ जी की फोटो बिहार पुलिस ने नक्सलियों के सुधार कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल की गयी थी और उसका भी अमिताभ जी ने विरोध किया, और यह बात गलत थी क्योकि यह सामाजिक कार्यक्रम था और देश हित में अमिताभ जी को इसका समर्थन करना चाहिए था|

मगर अमिताभ जी ठहरे शुद्ध व्यावसायिक उन्हें देशहित से क्या लेना देना, और मेरा मानना हैं की सरकार को भी इनसे शुद्ध व्यावसायिक लहजे में ही पेश आना चाहिए| जो व्यक्ति देशहित के कार्यो में भी अपना व्यवसायिक हित साधता हो उसे किसी भी प्रकार की सरकारी सेवा का लाभ नहीं मिलना चाहिए|

और विरोध करने वालो को अमिताभ जी को इस मुद्दे पर घेरना चाहिए ना कि अपने नेता के व्यक्तिगत हित के लिए|

असलियत से ज्यादा प्रजेंटेशन कैसा हैं यह ज्यादा मायने रखता हैं

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दो महिलाए की ऑफिस में बातचीत

पहली महिला- "कल तो शाम को बहुत मजा आया, तुम सुनाओ तुम्हारी कैसी कल की शाम रही?"

दूसरी महिला- "बहुत बुरी, मेरे हसबैंड घर आते ही जल्दी से डिनर करके सो गए कोई बातचीत तक नहीं हुई और तुम्हारे साथ क्या रहा?"

पहली महिला- "ओह यार क्या बताऊ मेरे पति शाम को घर आते ही मुझे रोमांटिक डिनर के लिए होटल ले गए .....

और वहाँ से हम एक साथ टहलते, आपस में बाते करते हुए करीब एक घंटे में घर पहुँचे उसके बाद उन्होंने पुरे घर में मोमबत्तिया जलाकर पुरे घर को परीलोक की कहानियो जैसा बना दिया, वाव सचमुच ग्रेट यार मजा आ गया"

उसी समय उनके पति आपस में क्या बात कर रहे होते हैं!!

पहला आदमी- " और सुनाओ कल की शाम कैसी रही?"

दूसरा आदमी- बहुत अच्छी यार घर पहुँचते ही टेबल पर डिनर तैयार मिला बस खाया और गहरी नीद में सो गया पूरी थकान दूर हो गयी....

तुम अपना सुनाओ"

पहला आदमी- "मत पूछ भाई कल की शाम का तो सोच कर ही डर लगता हैं घर जाते ही पता चला की घर में लाइट नहीं हैं, क्योकि बिजली का बिल जमा करना भूल गया था और डिनर भी नहीं बना था मज़बूरी में पत्नी को लेकर होटल जाना पड़ा खाना खाने के लिए, खाना इतना महँगा था की वापसी के लिए टैक्सी का भी पैसा नहीं बचा इसलिए घर पैदल आना पड़ा.....

घर पर लाइट नहीं थी पुरे घर में मोमबत्ती जलानी पड़ी, बहुत बुरा रहा यार"

 मोरल- असलियत क्या थी उससे कही ज्यादा प्रजेंटेशन कैसा हैं यह ज्यादा मायने रखता हैं|

आम आदमी और मँहगाई

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खाने में बिना मीन-मेख निकाले चुपचाप प्लेट साफ करके खाते हुए मेरे घर वाले देखते हैं तो बड़े आश्चर्यचकित होकर कहते हैं "तू तो पूरा बदल गयी हैं अब तो खाने में बिलकुल नखरे नहीं करती और ना ही कोई ड्रेस अब खरीदती हैं, कोई बात हैं क्या,सब ठीक तो हैं ना?"

अब मैं उनको क्या जवाब दूँ जब मार्केट सब्जी खरीदने जाती हूँ तो 15 से रूपये किलो आलू की भिन्डी, 100 रूपये के ऊपर का मस्टर्ड आयल/ रिफाइंड आयल और 45 का विष्णु भोग चावल १३० का आशीर्वाद आटा, और थोडा सा सामान खरीदने में 1000 रूपये की नोट खर्च करती हूँ तो मुझे बड़ी शिद्दत से अपने ऑफिस का ऑफिस बॉय याद आता हैं और सोचती हूँ कि कैसे वह 3000 रुपये में अपना घर चलाता होगा|

इस महँगाई में कैसे मुमकिन होता होगा की दो बच्चे और पति पत्नी का खर्च चलाना, कैसे वह बच्चो को पढ़ा पाता होगा सच में मन वितृष्णा से भर उठता हैं अब आप ही बताइए ऐसे में कैसे मैं खाने से शिकायत करू कैसे जूठन छोड़ दूँ प्लेट में|

और उतना ही गुस्सा सिस्टम और सरकार पर आता हैं जो 34 रुपये काफी मानते हैं एक दिन का खर्च, तो कुछ नेता 1 रुपये से लेकर 12 रुपये तक में भरपेट खाना मिलने का दावा करते हैं बहुत गुस्सा आता हैं जब एक ही समाज में इतना अंतर देखती हूँ तो, और यही एक वजह हैं कि हर भष्ट्र नेता से घृणा होती हैं मुझे उनका किरदार गंध मारता हुआ प्रतीत होता हैं और मन में गुस्से के साथ विद्रूपता उत्पन्न होती हैं, यही वजह हैं की राजनीति में मुझे रूचि हैं और मैं हर अच्छे और इमानदार नेता को इस देश की गद्दी पर देखना चाहती हूँ ताकि समाज की यह विद्रूपता ख़त्म हो|

धिक्कार है तुम्हारी कायरता पर!!

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सारे शांति दूत लग गए कहने कि जंग नहीं होनी चाहिए यह विकल्प नहीं हैं पर कोई शांति दूत यह नहीं बताना चाहता की फिर विकल्प क्या है??

आखिर कब खून से सनी हुई अपने भाइयो की लाशे हम अपने आँगन में उतरते हुए देखने को मजबूर होंगे?

कोई जवाब है इस बात का, शांतिदूतो!!

अब कहोगे की कोई तुम्हारे घर का नहीं सेना में, तुम जंग लड़ने नहीं जाओगी, बिलकुल सही कह रहे हो जिन जवानो को सीमा पर निर्दयता से "हत्या" कर दी गयी वो भी तुम्हारे कुछ नहीं लगते थे, इसलिए तुम्हे "हत्या" का अर्थ नहीं पता है। हर जवान वीरगति पाना चाहता है धोखे से हत्या होना नहीं।

और जहां तक युद्ध की बात है तो नहीं चाहते हैं हम युद्ध हम भी शांति से ही रहना चाहते है पर यह शांति सिर्फ एक हाथ में तलवार पकड़ कर ही कायम की जा सकती है। 

और जहां तक आम जनता की क़ुरबानी की बात है तो शब्दों पर गौर करना "पूरा देश युद्ध लड़ता है", जवान सीमा पर लड़ता है और अंदर हम रोज लड़ते है, युद्ध का असर देश का हर नागरिक भोगता है पर उस अपने कष्ट के लिए क्या हम इतने स्वार्थी हो जाए की रोज किसी जवान को मरते देखे!!

वाह रे शांतिदूतो(नपुन्सको) अपने बच्चो को भूख से बिलबिलाता नहीं देखसकते पर अपने गाँव में जवान के बच्चो को अनाथ होते हुए उसकी सुहागन को बेवा होते देख सकते हो!

धिक्कार है तुम्हारी कायरता पर!!

तिलक, वन्देमातरम ,टोपी और मुसलिम

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सच कहा रजा मुराद जी, टोपी पहनने से धर्म नहीं बदलता और बहुत से हिन्दू टोपी पहनते भी है। पर क्या कभी आप अपने लोगो को यह भी सलाह देंगे कि तिलक लगाने से, वन्देमातरम बोलने से,मंदिर का प्रसाद खाने से, या रामलीला में आरती की थाली भर पकड लेने से भी किसी का धर्म नहीं बदल जाता। और इस तरह की ओछी और छिछोरी हरकते किसी आम आदमी ने नहीं, माने हुए गणमान्य लोगो के द्वारा की गयी है, जनप्रतिनिधियो द्वारा की गयी है जिससे देश का बहुसंख्यक वर्ग बहुत व्यथित है। कभी उनकी भावनाओ का भी तो ख्याल करिए। ये वही लोग मुराद साहब जिन्होंने शको, हूणों और मंगोलों जो हमारे देश में आक्रमणकारी बन कर आये थे उनको भी अपने में, अपने संस्कारो में ऐसा प्रेम से मिलाया जैसे दूध में पानी मिल जाता हो। आज मुराद साहब आप मुझे इन भारतीयों में से एक भी शक, हूण या मंगोल खोज कर नहीं दिखा सकते। यह हमारे भाईचारे और विशाल ह्रदय का ही सबूत है, पुरे विश्व में हम जहाँ कहीं भी गए शांति और भाईचारे का सन्देश ही देने गए कही मारकाट कर लोगो की सभ्यता या संस्कृति नहीं बदली बल्कि उन लोगो को शांति और प्रेम का ऐसा सन्देश दिया की आज भी वो ज्ञान के प्रकाश के लिए भारत के आभारी है श्रीलंका, चीन, जापान म्यामार जैसे देश उदाहरण है। आप भी हमारे साथ प्रेम से पेश आइये, एक कदम शांति और भाईचारे का बढाइये हम आपको दौड़ कर गले लगा लेंगे। दीपावली में हमारे साथ मिलकर अंधरे को दूर करने के लिए दिया जलाइये, होली में अबीर गुलाल के साथ मन का मैल धोइये हम ईद में सेवइयो के मीठेपन से कड़वाहट दूर करेंगे। याद रखियेगा मुराद साहब भाईचारा कभी एकतरफा नहीं होता और जो एकतरफा हो तो समझ लीजियेगा की कोई गोद में बैठकर गला काटने की तैयारी में लगा हैं।

एक बार जरुर सोचिये की हम देश के लिए क्या कर रहे हैं?

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हम दिन भर सरकार और नेताओ को उसको कार्यो के लिए कोसते रहते हैं मगर उन सब बातो में एक महत्तवपूर्ण बात हम ये भूल जाते हैं की हम भी इस देश के नागरिक हैं और एक नागरिक के तौर पर हमारी भी कुछ जिम्मेदारिया देश के प्रति बनती हैं, यह बात याद रखने योग्य है की किसी राष्ट्र की असफलता में जितना दोष उसके नेताओ का होता हैं उतना ही दोष उसके नागरिको का भी होता हैं|

अपने दिल पर हाथ रखकर एक बार जरुर सोचिये की हम देश के लिए क्या कर रहे हैं?

किसी भी देश के विकास के लिए सबसे जरुरी बात ये होती हैं की देश का पैसा देश में रहे इससे रोजगार और देश की अर्थव्यवस्था दोनों मजबूत होती हैं मगर हम विदेशी सामानों के पीछे इस तरह से पागल हैं की पूछिये मत मानती हूँ की बहुत सी चीजे हमारे देश में नहीं मिलती हैं पर जीरो तकनिकी से बनी चीजे भी हम विदेशी ही खरीदते हैं आखिर हम क्यों ऐसा करते हैं? पापड़ आचार कोल्डड्रिंक कपडे जूते परफ्यूम जैसे सामान हम देशी भी तो खरीद सकते हैं|

जापान और चाइना दोनों देश आज से 70 साल पहले हमसे भी ज्यादा बर्बाद थे पर उन्होंने तय किया की हम विदेशी सामान नहीं खरीदेंगे जनता ने अपनी इच्छाशक्ति दिखाई और आज देखिये वो कितना आगे हैं क्या हम इतने गए गुजरे हैं की हम उनसे कुछ सीख भी नहीं सकते हैं|

मित्रो हम सरकार को सही टाइम पर कर देने में भी आनाकानी करते हैं, मगर सरकार के द्वारा चलाई जा रही हर सुविधा को बेजा इस्तेमाल जरुर करना चाहते हैं, ट्रेन में जायेंगे तो वहां से कुछ सरकारी सामान चुरा लेंगे नहीं चुरा पाए तो तोड़फोड़ देंगे कचरा कहीं भी फेक देंगे, खाने नहीं खा पायेंगे तो उसको फेक देंगे, क्या इसमें भी सरकार का ही दोष हैं क्या सरकार हमको अब जीने का सलीका भी सिखाएगी? अगर हम संसाधनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं तो यकीन मानिए हम किसी गरीब का हक़ मार रहे हैं|

और सबसे बड़ी उभरती हुई परेशानी बढती हुई जनसँख्या जिससे लगातार संसाधन कम पड़ते जा रहे हैं क्या इसके लिए भी हम सरकार को दोष दे एक एक आदमी के 10-10 बच्चे पूछने पर ऊपर वाले की देन हैं अरे इसमें ऊपर वाले का क्या लेना देना एक बच्चे कोपालने की औकात नहीं बना पाते हम और 10 बच्चे पैदा कर देते हैं उनको शिक्षा रोजगार और भोजन जब हम नहीं उपलब्ध करवा पाते तो दोषी सरकार को बना देते हैं अब बेचारी सरकार का इसमें क्या दोष?

मित्रो मैं यह नहीं कहती कि अपना पूरा जीवन आप देश के लिए समर्पित कर दो पर हम जितना अपने स्तर से देश के लिए कर सकते हैं उतना जरुर देश के लिए करे क्योकि देश बनता हैं वहाँ की जनता से और असफल भी जनता से ही होता हैं आइये हम सब मिलकर देश के लिए प्रण करे की हम अपने स्तर से हमेशा देश का सहयोग करेंगे |

राष्ट्रधर्म

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गीता के उपदेश की सार्थकता इसी में थी कि अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार हो जाए। वह पूरे मनोयोग से युद्ध करने के लिए न केवल तत्पर ही हुआ, अपितु महाभारत युद्ध के विजेता का गौरव भी प्राप्त कर सका। उस समय केवल एक अर्जुन था, परन्तु आज की परिस्थिति में प्रत्येक भारतवासी को अर्जुन बनना पड़ेगा, तभी भगवान श्रीकृष्ण की आराधना एवं गीता का अध्ययन-मनन सार्थक हो सकेगा।महाभारत काल में वैदिक ज्ञान-विज्ञान प्रायह्न लुप्त हो चुकाथा और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था लड़खड़ा गई थी। इसके स्थान पर आत्मा के सच्च्े स्वरूप के विषय में तथा सामाजिक कर्तव्य के विषय में उस युग के तत्ववादियों के विभिन्न मतों काएक जंजाल ही दिखाई देने लगा था । अनेक सम्प्रदाय, मत, पन्थ तथा चिन्तनधाराएं उस काल में जन्म ले चुकी थीं, परिणामतः समाज लड़खड़ा रहा था और मतिभ्रम उत्पन्न हो गया था। जैसा कि वर्तमान में वैदिक ज्ञान के अभाव में अनेक मत, पंथ, संप्रदायों ने समाज को छिन्न-भिन्न और मृतप्राय बना रखा है। 
तात्पर्य यह है कि वैचारिक क्षेत्र में वर्तमान का परिदृश्य महाभारत काल के परिदृश्य से काफी मिलता-जुलता है।इन सभी मत-वादों के कारण उस काल में समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित हो चुका था तथा अकर्मण्यता भी बढ़ती जा रही थी ।उस काल की विभिन्न विचारधराओं में कुछ धाराएं उन ज्ञानमार्गियों की थीं, जो कर्म को त्याज्य व बन्धन का कारण मानते थे। आज भी हमें इस स्थिति के दर्शन होते हैं। समाज टुकड़ों में विभाजित है और समाज,संस्कृति तथा देश हित के प्रति उदासीन अकर्मण्यों की जमात बड़ीसंख्या में दिखाई दे रही है।मान लीजिए, यदि अर्जुन युद्ध से पलायन कर जाता तो क्या स्थिति बनती ? स्पष्ट है दुर्बुद्धि दुर्योधन जैसे स्वार्थी, अनाचारी और अधर्मियों की जमात बढ़ जाती और भीष्म, द्रोणाचार्य जैसे व्यक्ति उनकी हां में हां मिलाते दिखाई देते। द्रौपदियों की लाज सरेआम नीलाम होती दिखाई देती। अन्याय और हठधर्मिता का सर्वत्र साम्राज्य हो जाता। सोचिए और अपने अन्तह्नकरण में विश्लेषण कीजिए कि अर्जुन का युद्ध करना कितना उचित था ?तत्कालीन विचारधाराओं के आधार पर अर्जुन तो उस युद्ध को कठोर कर्म और पाप कर्म मानने लगा था। वह उन विचारधाराओं से इस सीमा तकप्रभावित हो चुका था कि वह स्वधर्म, क्षात्रधर्म, 'परित्राणाय साधुनां' तथा 'धर्म संस्थापनार्थाय'युद्ध कर आततायियों-अन्यायियों को मारनेके अपने उत्तरदायित्व से मुंह मोड़ने लगा था।वासुदेव कृष्ण ने अर्जुन की गलत मान्यताओं को अस्वीकार करते हुएधर्म के अनुसार उसे युद्ध करने के लिए शिक्षित और दीक्षित किया। अर्जुन ने युद्ध किया और विजय प्राप्त की। अर्जुन का यह कर्म पाप कर्म या बंधन का कारण कदापि नहीं माना जा सकता। उसने तो 'युद्धाय कृत निश्चय' के आदेश का पालन किया था।वर्तमान के संदर्भ में यदि हम विचार करें तो पाते हैं समाज की सिर्फ छिन्न-भिन्न तस्वीर। एक-दूसरे से घृणा करने वाले, धर्म की डींगे मारने वाले स्वार्थी वर्ग, जिन्होंने अपने राष्ट्रीय एवं सामाजिकउत्तरदायित्वों को भुला रखा है।वे अपनी-अपनी पूजा-उपासना में लीन हैं । भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र आदि भी पूजा-उपासना करते थे। कर्ण सूर्य पूजा करता था । किन्तु सभी ने अपनी निष्ठाएं अधर्मी दुर्योधन के लिए अर्पित कर रखी थीं।वर्तमान में देश पर छा रहे संकट के काले बादल, निर्दोष व्यक्तियों की हत्या, सामाजिक बिखराव, राजनीतिक विवशताएं, वैयक्तिक स्वार्थ, नैतिक पतन, स्वाभिमानहीनता आदि को देखते हुए यह कहना उचित प्रतीत होता हैकि भारतीय समाज उस चौराहे पर पहुंच गया है, जहां मृत्यु उसे ढूंढ रही है। ऐसी स्थिति में आशाऔर विश्वास का यदि कोई प्रकाश स्तंभ है, तो वह है गीता।गीता के संदेश को समझकर अपने राष्ट्रहित संबंधी, देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य का निर्धारण करना आवश्यक है। हमारेसामने एकमात्र लक्ष्य हो देश की रक्षा, आतंकी जेहादी हत्यारों का सर्वनाश। देश किसी भी वर्ग-संप्रदाय से बड़ा होता है। हम आपसी मतभेद भुलाकर राष्ट्रधर्म को अपनाएं। उसके लिए जीवन का समर्पण करें।इसके लिए आवश्यक है नपुंसकता को त्यागकर अर्जुन का व्रत धारण करो, गीता के अध्ययन की यही सार्थकता है। आज गीता ही हमारा संबल है। उसके मर्म को समझकर अर्जुन बनो और 'युद्धाय कृत निश्चयः'।

और उम्मीद हैं की देश बदल देंगे!!

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इस देश में खुद कोई नहीं बदलना चाहता सब सिर्फ ये चाहते हैं की दुसरे बदले, जनता सोचती हैं कि नेता गलत हैं इसलिए नेता बदले और नेता सोचते हैं की जनता गलत हैं और सारी कुव्यवस्था जनता की वजह से फैली हैं|

उसी तरह इस देश के सारे पुरुष चाहते हैं की महिलाए बदले और भारतीय संस्कृति की मिसाल बने, मगर खुद बदल कर भारतीय संस्कृति की कोई मिसाल नहीं पेश करना चाहते हैं| सारे लोग सोचते हैं लडकिया जींस पेंट क्यों पहनती हैं पर खुद जींस पेंट पहने का उन्हें क़ानूनी हक़ हैं| खुद का कैरेक्टर कितना भी ढीला हो पर लड़की से उम्मीद करते हैं की वो सती सावित्री बन कर रहे|

खुद दुनिया भर की लडकियों से इश्क लड़ाएँगे और हर बार बोलेंगे की ये मेरा सच्चा वाला प्यार हैं पर अपनी बहन का एक भी सच्चा प्यार बर्दाश्त नहीं कर पाते| खुद नौकरीपेशा रहेंगे तो सोचते हैं की घर का हर काम औरत करे पर औरत नौकरीपेशा रहे तो भी यही उम्मीद करते हैं| दिन भर संस्कृति की वकालत करते देखे जायेंगे और साथ में लडकियों सोशल साइट्स जिस पर लडकिया महिलाए सभी हैं उस पर गन्दी गन्दी गालिया देते मिल जायेंगे| 

यह हैं चरित्र हमारे देश का नागरिको का, और उम्मीद हैं की देश बदल देंगे!!

कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता हैं

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कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी "रंग दे बसंती" फिल्म का नायक एक संवाद बोलता हैं की "कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता हैं" और बनाता कौन हैं उस देश का नागरिक|

पर हम क्या कर रहे हैं सिर्फ सारा दोष दुसरो पर मढ़ रहे हैं और ये मानकर चल रहे हैं की हमारी कोई गलती नहीं हैं, हमें तकलीफ हैं की इस देश में लोग भ्रष्ट्र हैं, हमें तकलीफ हैं की हम विकसित नहीं हैं हमें तकलीफ हैं की सरकार हमें रोजगार उपलब्ध नहीं करवा पा रही हैं ऐसी बहुत सी तकलीफों का रोना हम हर जगह रोते हुए दीखते हैं| दूसरी तरफ सच ये हैं की हम सिर्फ रोते हैं करते कुछ नहीं और अगर कोई करना भी चाहे तो हम उसकी टाँगे खीचने का, उसका मजाक उड़ाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते, अपने इगो को शांत करने के लिए उससे फ़ालतू के सवाल पूछते हैं ताकि वह भटक जाए और फिर वही रोना शुरू कर देते हैं की हम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं|

पहली बात तो वोट देने हमें जाना नहीं होता और जब वोट देने चले जाते हैं तो ये देखते हैं की किसने हमें बेरोजगारी भत्ता, सस्ते राशन और मुफ्त सामान देने की भीख देने की पेशकश की हैं, और अगर यहाँ से भी छूटे तो ये देखने में लग जाते हैं की कौन सा उम्मीदवार मेरी जाति का हैं फिर हम वोट ऐसे ही लोगो को दे आते हैं विकास का मुद्दा गौड़ हो जाता हैं और फिर हम रोते हैं की देश का विकास नहीं हो रहा|

दर्जनों की तादाद में बच्चा पैदा करेंगे, और रोयेंगे की सरकार रोजगार नहीं दे रही खाने को नहीं दे रही, स्वास्थ्य सेवाए नहीं उपलब्ध करवा पा रही मगर अपनी तैयार की हुई फौज नहीं देखेंगे की कितनी भी सुविधाए उपलब्ध करवा दी जाए पर उस फौज के लिए कम ही पड़ेगी|

दो रुपये की पेप्सी और चिप्स के रूप में हवा खरीद कर खायेंगे पर वही देशी आयटम नहीं खायेंगे तो रोजगार कैसे बढेगा, जब विदेशी चीजे ही हम प्रयोग करेंगे तो अपने देश में बना हुआ माल कौन खरीदेगा सरकार को सुविधाए देने के लिए टैक्स कैसे मिलेगा| मगर नहीं सारी गलती तो सरकार की होती हैं हम तो जनता हैं हमारी कोई गलती नहीं, और हमारा देश अच्छा नहीं इसमें रहने लायक नहीं|