हैरानी की बात हैं ना, इसके पहले दीपिका पादुकोण का वुमेन इम्पावरमेंट "फाइंडिंग फेनी' के टाइम जागा था और आज पीकु के रिलीज के टाइम फिर अन्दर से अंगडाई ले रहा हैं| खैर मैं कहना यह चाहती थी, कि समय के साथ दिन प्रतिदिन मेरी आस्था जस्टिस काटजू सर के प्रति बढ़ती जा रही हैं, कितना सही उन्होंने कहा था की इस देश की 90% जनता मुर्ख हैं गलत नहीं कहा था उन्होंने, यकीन करियेगा हैं |
अब देखिये ना दीपिका पादुकोण कितने शानदार तरीके से अभिनय करके अपने पक्ष में पब्लिसिटी जुटा रही हैं, और हम मुर्ख अपने अपने तरीके से अपने अपने खेमे में लामबंद होकर आपस में लड़ कर उसकी पब्लिसिटी कर रहे हैं|
जबकि हमारे पास और बहुत सारे गम्भीर मुद्दे हैं जिनपर हम सार्थक चर्चा कर सकते हैं और वैसे भी जब बात #MyChoice , "माई लाइफ, माई रुल" पर हैं तो यहाँ आकर सारे तर्क वितर्क खत्म हो जाते हैं| ऐसा सिर्फ दीपिका के साथ नहीं बल्कि हम सभी के साथ हैं| ऐसी परिस्थिति में आपका ऐतराज तभी काबिलेगौर होगा जब किसी की माई चॉइस या रुल आपकी स्वतंत्रता में बाधक हो, और जब ऐसा होता आपको नजर आये तो फिर वो कोई भी क्यों ना हो विरोध की आवाज खड़ी करना आपका हक़ हैं, लेकिन दीपिका की my choice से मुझे नहीं लगता किसी की स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न होती हैं जब तक की वो ऐसे कर्म वो खुलेआम सड़क पर ना करे|
एक तरफ जहाँ लोग दीपिका की नितांत निजी मर्जी की भौडेपन से समर्थन कर रहे हैं तो उसके विरोध में उठने वारे स्वर जो खुद को "संस्कृति रक्षक" समझते हैं, ऐसे घटिया और अभद्र शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं की जिसे भारतीय संस्कृति पढ़कर किसी कुंए में कूदकर आत्महत्या कर लेगी| अरे भाई जब भारतीय संस्कृति के इतने बड़े योद्धा हो तो शब्दों तो कम से कम शब्दों का तो उचित चयन करो ताकि लोग तुम्हारे विरोध को गंभीरता से ले| दूसरी तरफ इतनी "खुली मानसिकता" का समर्थन करने वाले के सामने दो चार द्रिअर्थी जोक या शब्द कह दो तो वो भी संस्कारित हो जाते हैं, भई क्या मजाक बना रखा हैं आपने एक तरफ तो आप "मेरी मर्जी" की वकालत कर रहे हैं दूसरी तरफ दुसरे की मर्जी का सम्मान नहीं कर रहे हैं|
खैर पूरी पोस्ट का लब्बोलुआब मेरी तरफ से ये हैं की दोनों पक्ष के लोग निरे मूर्खे हैं और काटजू सर की 90% जनता को डिफाइन करते हैं|
आखिर में दीपिका पादुकोण से यह कहना चाहुँगी की किसने रोका हैं आपको जिसके साथ जैसे मर्जी करे वैसे रहिये, और आपको तो कोई रोक भी नहीं सकता और आपको ही क्यों किसी को भी कोई नहीं रोक सकता, फिर फ़ालतू का बवाल क्यों? यह आपकी निजी राय हैं पर आप यह हमे क्यों बता रही हैं? अपने तक रखिये ना, और जो मर्जी आये वो करिए बस हमारी स्वतंत्रता की सीमा से परे, अपनी स्वतंत्रता के हद में हमे कोई ऐतराज नहीं, उल्टा हम ताली पीटकर आपके मजे ही लेंगे!!
अब देखिये ना दीपिका पादुकोण कितने शानदार तरीके से अभिनय करके अपने पक्ष में पब्लिसिटी जुटा रही हैं, और हम मुर्ख अपने अपने तरीके से अपने अपने खेमे में लामबंद होकर आपस में लड़ कर उसकी पब्लिसिटी कर रहे हैं|
जबकि हमारे पास और बहुत सारे गम्भीर मुद्दे हैं जिनपर हम सार्थक चर्चा कर सकते हैं और वैसे भी जब बात #MyChoice , "माई लाइफ, माई रुल" पर हैं तो यहाँ आकर सारे तर्क वितर्क खत्म हो जाते हैं| ऐसा सिर्फ दीपिका के साथ नहीं बल्कि हम सभी के साथ हैं| ऐसी परिस्थिति में आपका ऐतराज तभी काबिलेगौर होगा जब किसी की माई चॉइस या रुल आपकी स्वतंत्रता में बाधक हो, और जब ऐसा होता आपको नजर आये तो फिर वो कोई भी क्यों ना हो विरोध की आवाज खड़ी करना आपका हक़ हैं, लेकिन दीपिका की my choice से मुझे नहीं लगता किसी की स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न होती हैं जब तक की वो ऐसे कर्म वो खुलेआम सड़क पर ना करे|
एक तरफ जहाँ लोग दीपिका की नितांत निजी मर्जी की भौडेपन से समर्थन कर रहे हैं तो उसके विरोध में उठने वारे स्वर जो खुद को "संस्कृति रक्षक" समझते हैं, ऐसे घटिया और अभद्र शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं की जिसे भारतीय संस्कृति पढ़कर किसी कुंए में कूदकर आत्महत्या कर लेगी| अरे भाई जब भारतीय संस्कृति के इतने बड़े योद्धा हो तो शब्दों तो कम से कम शब्दों का तो उचित चयन करो ताकि लोग तुम्हारे विरोध को गंभीरता से ले| दूसरी तरफ इतनी "खुली मानसिकता" का समर्थन करने वाले के सामने दो चार द्रिअर्थी जोक या शब्द कह दो तो वो भी संस्कारित हो जाते हैं, भई क्या मजाक बना रखा हैं आपने एक तरफ तो आप "मेरी मर्जी" की वकालत कर रहे हैं दूसरी तरफ दुसरे की मर्जी का सम्मान नहीं कर रहे हैं|
खैर पूरी पोस्ट का लब्बोलुआब मेरी तरफ से ये हैं की दोनों पक्ष के लोग निरे मूर्खे हैं और काटजू सर की 90% जनता को डिफाइन करते हैं|
आखिर में दीपिका पादुकोण से यह कहना चाहुँगी की किसने रोका हैं आपको जिसके साथ जैसे मर्जी करे वैसे रहिये, और आपको तो कोई रोक भी नहीं सकता और आपको ही क्यों किसी को भी कोई नहीं रोक सकता, फिर फ़ालतू का बवाल क्यों? यह आपकी निजी राय हैं पर आप यह हमे क्यों बता रही हैं? अपने तक रखिये ना, और जो मर्जी आये वो करिए बस हमारी स्वतंत्रता की सीमा से परे, अपनी स्वतंत्रता के हद में हमे कोई ऐतराज नहीं, उल्टा हम ताली पीटकर आपके मजे ही लेंगे!!
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