आखिर हम लतखोर क्यों हैं, क्यों जरुरत हैं इस देश की मोदी को ?

0 comments

समझ में नहीं आता कि आखिर क्यों हमारे देश के नागरिको के साथ ही विदेशो में अपमानजनक व्यवहार होता हैं??

आखिर क्यों हमारे देश का सामान और दवाये(तत्कालीन मामला हिमालयन दवा कम्पनी) स्वास्थ्य मानको पर खरा ना उतर पाने की वजह से विदेश के रिजेक्ट कर दी जाती हैं?

आखिर क्यों हमारे देश में दुनिया भर का "रिजेक्टेड कूड़ा" बेचा जाता हैं ..??

आखिर क्यों हमारे देश के नागरिक विदेशो में "नस्लीय हिंसा" के शिकार होते हैं??

हैं कोई जवाब ..

हमारे देश की सरकार अपना आत्मविश्वास खो चुकी हैं, अपनी गरिमा का ख्याल नहीं हैं, आत्मविश्वास या आत्मसम्मान किसे कहते हैं यह भूल चुकी हैं..!!

आखिर हम कब तक यूँ लतियाए और अपमानित होते रहेंगे ..??

शर्म तक हम बेच कर खा गए हैं, चिढ होने लगी हैं अब खुद से ...

बस मुझे इसीलिए मोदी चाहिए की वो आये दिल्ली की गद्दी पर और यह बेशर्मी, लतखोरी दूर करके लोगो को यह बताये आत्मसम्मान क्या चीज होती हैं, देश की इज्जत किसे कहते हैं ...

और इन विदेशियो को इनकी असली औकात बताये की अगर हमने अपने बाजार तुम्हारे लिए बंद कर लिए तो तुम्हारी सारी चकाचौध अंधियारे में डूब जायेगी और हाथ में कटोरा आ जाएगा, तुम्हारे यहाँ की जनता बेरोजगार हो जायेगी सारी खुशहाली भुखमरी में बदल जायेगी ...

अब दिल्ली की गद्दी को ऐसे ही शेर की जरुरत हैं जिसकी दहाड़ सिर्फ इस्लामाबाद या बीजिंग तक ही नहीं लन्दन और वार्शिगटन तक सुनाई दे ...

तब जाकर मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र का यह शेर सार्थक होगा "गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की... तख़्त-ए-लन्दन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की"

शहीद वीर मोहनचंद शर्मा जी की पुण्यतिथि पर विशेष

0 comments

शहीद वीर मोहनचंद शर्मा जी को भाव भीनी श्रद्धांजलि
आज १९ सितम्बर है, आज ही के दिन दिल्ली में सीरियल विस्फोट करके निर्दोषों का खून बहाने वाले आतंकियों से संघर्ष करते हुए दिल्ली के बटला हाउस में इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा जी ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था .
दिल्ली पुलिस के रणबांकुरे इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा जितने जांबाज थे उतने ही जिंदादिल भी। उनकी जांबाजी के कारण उन्हें सात बार वीरता पुरस्कार और राष्ट्रपति पदक भी मिला। वह मरणोपरांत अशोक चक्र से भी सम्मानित हुए। 23 सितंबर, 1965 को अल्मोड़ा में जन्मे शर्मा 26 जून, 1989 को दिल्ली पुलिस में बतौर सब इंस्पेक्टर भर्ती हुए थे।
1995 में वह बारी से पहले तरक्की पाकर इंस्पेक्टर बने। वह 35 आतंकियों को मार गिराने और 80 से अधिक की गिरफ्तारी के अभियानों में शामिल रहे। उनकी टीम ने 40 से अधिक कुख्यात अपराधियों को भी ढेर किया और सौ से
इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा
इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा
ज्यादा को गिरफ्त में लिया। 19 सितंबर 2008 को बटला मुठभेड़ के दौरान शहीद इंस्पेक्टर मोहनचंद ने जिन बड़े मामलों को सुलझाया उनमें 2000 में लालकिला गोली कांड, 2001 में संसद पर हमला और 2005 में दिल्ली में हुए सीरियल बम धमाके भी शामिल हैं। 2006 में मोहनचंद की टीम ने निजामुद्दीन इलाके में लश्कर के दो आतंकियों को गिरफ्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन आतंकियों की निशानदेही पर लश्कर का ऑपरेशनल चीफ मोहम्मद इकबाल उर्फ अबू हमजा को मुठभेड़ में मार गिराया गया था।
सीजीओ कांप्लेक्स के पास आधा घंटे से भी ज्यादा समय तक चली उस मुठभेड़ में मोहनचंद ने आतंकियों का डटकर मुकाबला किया था। चूंकि शर्मा आतंकियों के खिलाफ खासा सक्रिय रहते थे इसलिए वह आइबी के सीधे संपर्क में रहते थे। उनकी बहादुरी का स्मरण करते हुए दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त वाईएस डडवाल ने कहा, ‘इंस्पेक्टर शर्मा आतंक के खिलाफ लड़ाई में पूरे देश की शान थे। उन्होंने हमेशा आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। बटला हाउस में इंडियन मुजाहिदीन आतंकियों से लोहा लेते समय शहीद हुए मोहनचंद के रूप में देश ने एक जाबांज अफसर खोया। इसकी क्षतिपूर्ति होना संभव नहीं है।’

 नम आँखों से उन्हें शत शत नमन !!!

मोहनचंद  शर्मा अमर रहें

साभार - न्यूज़ वेबसाइट

सेकुलर सरकार का नकाब खीच चूका हैं

0 comments

रविशंकर प्रसाद जी पूछ रहे हैं कि "गुजरात पर बोलने वाले ऑपरेशन दंगा पर खामोश क्यों हैं.."

हम भी यही पूछ रहे हैं कि आखिर ये कैसी चुप्पी हैं??

मुझे तो आज से कुछ साल पहले अनिल कपूर की आई फिल्म "नायक" की याद आ रही हैं बड़ी शिद्दत से अमरेश पूरी का जो दंगो के समय मुख्यमंत्री थे फिल्म में उनका बोला हुआ एक एक संवाद याद आ रहा हैं ...

क्या आपको भी याद आ रहा हैं .. और याद आ रहा हैं तो फिर कब तक सोने का नाटक करते रहेंगे, याद रखिये मित्रो दंगो में सिर्फ इंसान मरता हैं... मरती हैं तो सिर्फ इंसानियत, कब तक इनकी कुर्सी के लिए हम अपना घर जलाते रहेंगे ... नकाब खीच चूका हैं रंगमंच का पर्दा उठ चूका हूँ असलियत देखिये, पहचानिए की कौन गुनहगार हैं मासूमो का ....क्यों सुनी हो गयी माँ की कोख ...

अब जाग जाइए बहुत हो गया अब.... देश की तक़दीर आपके हाथ में हैं सही व्यक्ति का चुनाव करिए .. जो देश में विकास की लहर लाये, बेरोजगार के हाथ में रोजगार हो नाकि बेरोजगारी भत्ते की भीख ...

सेकुलर सरकार का कारनामा

0 comments

ऑपरेशन दंगा: मुजफ्फरनगर में दंगे पर समाजवादी नेताओं ने कहा था, जो हो रहा है होने दो. समाजवादी नेताओ का दंगे में हाथ, आज तक पर स्टिंग ऑपरेशन में बड़ा खुलासा ...

स्टिंग ऑपरेशन पर तिलमिलाई यूपी सरकार, दो अफसरों के तबादले ..

यह हैं सेकुलर सरकार की असलियत अब करवाओ SIT जांच, अब नहीं छाती पिटी जायेगी, कहाँ गए वो चिरकुट जो दंगो के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे...
आज तक के रिपोर्टर ने पूछा- "मेन रोल मेरे ख्याल से आज़म xxxxx का है, कि उन्होंने pressurise किया."

पुलिस अफसर का जवाब पढ़िए ...

आर एस भगौर, सैकेंड अफसर- "बिल्कुल ठीक है...बिल्किल ठीक है....."

अब भी कुछ कहना बाकी रह गया की इन दंगो के पीछे कौन जिम्मेदार था ...

"27 अगस्त से शुरू हुए दंगे 8 सितंबर तक मुजफ्फरनगर को दहलाते रहे, लेकिन प्रशासन से लेकर सरकार तक, दंगाइयों पर काबू पाने में नाकाम रही. जाहिर तौर पर दंगों की आड़ में नेता अपना अपना फायदा देख रहे थे. मीरापुर थाने के एसएचओ अनिरुद्ध कुमार गौतम के हल्के में भी दंगाइयों ने सड़कों पर मासूमों के मौत के घाट उतारा. और हैरतअंगेज़ बात ये है कि दंगाइयों पर कार्रवाई करने से पुलिस कतराती रही. गौतम मानते हैं कि डीएम एसपी को एक साथ हटाने की वजह से जिला प्रशासन नेतृत्वविहीन हो गया था. गौतम का कहना है कि समाजवादी पार्टी के कुछ नेता डीएम एसपी को कई दिनों से एसपी को हटाने का दबाव बना रहे थे, और उन्हें आखिरकार मौका मिल गया."

यह हैं सेकुलर सरकार का कारनामा ..!!

सब्जी बेचनेवाली ने बनवाया अस्पताल

0 comments

इलाज के अभाव में पति की मौत हुई, तब सुभाषिनी मिस्री के पास पूंजी के नाम पर सिर्फ़ 90 पैसे थे. लेकिन सब्जी बेचनेवाली इस महिला ने 23 बरस में पाई-पाई जोड़ कर बनवा डाला मानवता का अस्पताल.
कोलकाता यह एक आम महिला के बुलंद हौसलों की कहानी है. उसने तय किया था कि जिस अभिशाप ने उसका सुहाग उजाड़ा, वह उसे किसी और का नुकसान करने नहीं देगी. इस संकल्प को 40 बरस हो रहे हैं. कोलकाता के हंस पुकुड़ में सब्जी बेचने वाली सुभाषिनी मिस्री गरीबों के लिए सौ बिस्तरों वाला निशुल्क अस्पताल चलाती हैं.अस्पताल का नाम ह्यूमैनिटी हॉस्पिटल- अनपढ़ सुभाषिनी ने अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाया, जो अब अस्पताल का व्यवस्थापक है.
कब से शुरू हुआ जुनून
समाजहित में लिए गये संकल्प की कहानी शुरू होती है वर्ष 1971 से. जब सुभाषिनी के पति, 35 साल के कृषि मजदूर साधन मिस्री की मौत इलाज के अभाव में हो गयी. पत्नी सुभाषिनी के पास इतने पैसे ही नहीं थे कि उनका इलाज करवाया जा सके. तब सुभाषिनी ने मुफ्त अस्पताल बनवाने का संकल्प लिया था, ताकि किसी को गरीबी के कारण जान न गंवानी पड़े. वे याद करती हैं कि उस समय उनकी उम्र थी 23 साल. पति छोड़ गये थे चार बच्चे. सबसे बड़ा नौ और सबसे छोटा बेटा तीन साल का. उन दिनों वे कोई काम नहीं करती थीं. जमापूंजी के नाम पर थे सिर्फ़ 90 पैसे. भातेर पानी (माड़-चावल का पानी) के लिए पड़ोसियों के सामने हाथ पसारना पड़ता था. कई बार उन्होंने घास उबाल कर नमक के साथ बच्चों को खिलायी. ऐसे बुरे दिनों में जब वे अस्पताल बनवाने का सपना बतातीं, तो लोग उन पर हंसते थे.

झाड़ू-पोंछा भी लगाया
परिवार पालने के लिए सुभाषिनी ने दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा करना शुरू किया. फ़िर जब थोड़े पैसे इकट्ठा हए, तो सब्जी की दुकान डाल ली. काम कुछ भी किया, लेकिन थोड़े-थोड़े पैसे अपने अस्पताल के लिए भी जमा करती रहीं. पाई-पाई जुड़ती रही और सपना पलता रहा. इस साधना को चलते करीब 21 बरस हो गये. 1992 में उन्होंने अस्पताल के नाम पर एक बीघा जमीन खरीद ली. 1994 में एक अस्थायी अस्पताल शुरू हो गया. दो हजार वर्गफ़ुट जमीन पर यह मुफ्त अस्पताल एक झोपड़ी में प्रारंभ हआ. अब मदद के लिए लोगों के हाथ भी बढ़ने लगे. आज अस्पताल के पास अपनी 15 हजार वर्गफ़ुट जमीन, दुमंजिला इमारत, मरीजों के लिए 100 बिस्तर और ऑपरेशन थिएटर है. इसकी चर्चा पूरे बंगाल में है. अस्पताल में प्रतिदिन 50-100 मरीज मुफ्त इलाज के लिए पहंचते हैं.