नरेंद मोदी की बिहार जीत के मायने

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बिहार कौन जीत रहा हैं पता नहीं पर बिहार और यूपी अगर बीजेपी जीतती हैं तो यकीन रखियेगा सम्पूर्ण देश का भाग्योदय का सूर्य बिहार और यूपी से निकलेगा।

राज्यसभा में बहुत से बिल अटके पड़े हैं जिनसे हम विकास की नयी ऊंचाई छु सकते हैं पर बीजेपी के पास बहुमत नहीं हैं। एक बार राज्यसभा में बहुमत मिला तो पूरी दुनिया को हम अपने कदमो में झुका लेंगे। हमारी प्रतिभाये विदेश पलायित नहीं होगी वो हमारे लिए काम करेंगी ऐसा माहौल देश में तैयार होगा। चीन से ज्यादा प्रतिभा हमारे यहाँ मौजूद हैं बस हमे मौका नहीं मिल रहा हैं एक बार चीन जैसा ओद्योगिक माहौल यहाँ बन जाए तो हम भी चीनी सामानों की तरह भारतीय सामान से पूरा विश्व पाट सकते हैं। अब विश्व की अर्थव्यस्था ऐसी हैं कि हम बिना निर्यात के आगे बढ़ ही नही सकते, आयात कम हो निर्यात ज्यादा यही अच्छी इकोनॉमी हैं। गरीब तबके का भला भी इसी में मुमकीन हैं। आप लोगो में से जो किसान परिवार से हैं वो इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि बिना बाहरी आय के कृषि में कोई लाभ नहीं हैं यहाँ तक की खेती से परिवार का पेट तक नही भरा जा सकता, बाहरी कमाई खेती और परिवार दोनों को मदद करती हैं। बाहरी कमाई से वक्त पर खेती के लिए संसाधन जुटाए जा सकते हैं पर हमारे देश में रोजगार की बेहद कमी हैं और यह कमी हम इंड्रस्ट्री लगाकर पूरी कर सकते हैं। लगभग सारे विकसित देश इसी व्यवस्था से विकसित हुए हैं, जो अमीर हैं उन पर देश की गरीबी का कोई फर्क नहीं पड़ता उल्टा राजकोषीय घाटे से अकसर उन्हें फायदा ही पहुँचता हैं। चालु वित्त खाता ही देश में गरीबी और महंगाई का जिम्मेदार होता हैं, चालु वित्त खाते में जितना घाटा होगा उतना ही देश में आर्थिक आराजकता फैलेगी जो कई पाप साथ लेकर आती हैं।

मैं आपको आसान शब्दों में समझाती हूँ, आप पुरे विश्व को परिवार मान लीजिये, यह आप सभी को मालूम होगा परिवार चलाने के लिए हमे बाहर से पैसा कमाकर लाना होगा तभी बाबू जी की दवा, अम्मा की साड़ी, मुन्ने की फ़ीस की व्यवस्था हो पाएगी। बाहर से पैसा नहीं आएगा और हम अपनी बचत से सिर्फ बाहर का सामान खरीदते रहे तो एक दिन हमारी बचत खत्म और साथ में हम भी खत्म हो जायेगे। इसी तरह देश की अर्थव्यवस्था चलती हैं विदेशी सामान हम बहुत ज्यादा आयात कर रहे हैं और बदले में हमारा निर्यात बेहद कम हैं, अगर निर्यात बढ़ेगा तो पैसा आएगा, पैसा आएगा तो घर में टीवी आएगी फ्रिज आएगा कार आएगी देश में सड़के बनेगी हर घर बिजली पहुंचेगी, बेहतरीन अस्पताल, उच्च शिक्षा संसथान आदि खुलेंगे हमारी क्रय शक्ति बढ़ेगी तो जाहिर हैं हम विकसित होंगे और हमारे साथ देश भी।

पुरानी सरकारें गरीबी हटाओ का नारा जरूर देती रही पर उन्होंने इसको जड़ से मिटाने की अपेक्षा एलोपैथ का सहारा ले मर्ज को दबाया, सब्सिडी के नाम पर भीख बाँट जनता को नकारा किया। दो रूपये किलो चावल गेंहू दे जनता को मुफ्तखोरी की आदत लगाई। ताकि लोग नकारा बने कामचोर बने और गरीबी की समस्या ज्यो की त्यों बनी रहे और साथ में उनका वोट बैंक भी, पर मोदी सरकार मजबूत आर्थिक सुधार के पक्ष में जिसे वो राज्यसभा में बहुमत होने और विपक्षी पार्टियो की गन्दी राजनीती के चलते लागू नहीं कर पा रही हैं।

आरक्षण का मुद्दा इस देश में इतना प्रासंगिक सिर्फ इसीलिए हैं की देश में रोजगार नहीं हैं, लोग सरकारी नौकरी के जरिये अपना भविष्य सुधारना चाहते हैं एक बार अच्छी प्राइवेट नौकरियों की देश में बाढ़ आ जाए तो आरक्षण को अप्रसांगिक बनते देर न लगेगी, पर वोटबैंक की राजनीती करने वाली पार्टिया यह चाहती ही नहीं क्योकि उन्हें मालूम हैं उनकी कुर्सी इसी आरक्षण के पाये पर टिकी हैं। मोदी जी इसीलिए ज्यादा से ज्यादा रोजगार पैदा करना चाहते हैं ताकि आरक्षण अप्रसांगिक हो जाए।

खैर देखते हैं कि भारत का भाग्य उदय होगा, या फिर विधाता का हमेशा की तरह हमारे साथ अन्याय!!

जंगलराज की दर्दनाक दास्तान

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बात उन दिनों कि हैं जब बिहार में जंगलराज कि तूती बोलती थी । कोई भी गोप जी का नाम लेकर आता और बाजार से कुछ भी मंगनी में उबात उन दिनों कि हैं जब बिहार में जंगलराज कि तूती बोलती थी । कोई भी गोप जी का नाम लेकर आता और बाजार से कुछ भी मंगनी में उठा के ले जाता था , नहीं देने पर धंधा बंद या कुछ महीनों के लिए हाथ पैर तुडवाकर अस्पताल में भर्ती , कितनो का अता पता भी नहीं चला।

मेरी नई नई जवानी उफान मार रही थी, पिता जी गुजरने के बाद दुकान एवं घर कि जिम्मेवारी मेरे ही ऊपर आ गयी थी । हमारा दुकान पटना में नामी जगह पर था सामने ही जंगलराज के चमचों का पूरा मोहल्ला पडता था , मोड पर किसी के निकलते ही पूरे सडक के दुकानदार सिहड जाते थे । हमारा छोटा सा होटल था ,जिसमें रिक्शे ठेले वाले ,मजदूर खाना खाया करते थे । उसी से हमारा गुजर बसर एवं पढाई लिखाई भी होती थी । दुकान में हम सभी भाई ही मिलकर सारा काम करते थे, खाना बनाने से लेकर बर्तन ढोने तक । उस दिन मैं अकेला ही दुकान पर था , भाई ट्यूशन पढने गया था । अगले दिन मेरी कोलकाला में रेलवे कि परीक्षा थी , सो थोडा टेंशन मे थे ट्रेन भी पकडना था ,राखी का समय था एक दोस्त के लिए राखी लेना था उसके घर से जो उस समय कोलकाता में पढ रहा था ।इसी उधेडबुन में ग्राहकों को खाना भी खिला रहे थे तभी गोप जी (जो उस समय लालूजी के एक साले के खास आदमी हुआ करते थे) के कुछ आदमी खाना
खाने के लिए आए (फ्री में ही खाते थे )जो दिन में ही फुल पीए हुए थे , मैनें खाना निकालकर दिया वो खा रहे थे तभी बगल में खा रहे मजदूर से किसी बात को लेकर बहस हुई वो सब उस बेचारे को भद्दी भद्दी गालियाँ देने लगे , मैं समझाने गया तो मुझे भी भद्दी भद्दी गालियाँ देने लगे तथा खाना सब उलट दिया , मेरा तलवा का लहर कपार पर चढ गया (यह नई नई जवानी और कुछ जात का भी असर था) मैनें सब्जी चलाने वाला बडका छोलनी उठाया और दे दना दे दना दन मार मार के मोहल्ले के मोड तक खदेड दिया । वापस आकर भात पसाने लगा , तब तक सैकडो आदमी गोप जी के पीछे पीछे आ गये लाठी ,डंडा गोली बंदूक सब लिए हुए , गोप जी का आदेश हुआ मारो साले के हमर आदमी पर हाथ उठाता था । मैं भात ही पसा रहा था कि ईटा पत्थर उन्होनें बरसाना शुरू कर दिया , एक ईंट कपार पर और एक ईंट दाँतो पर लगी , कपार फट गया, होंठ फट गए आगे का एक दाँत टूट गया । तभी किसी ने थाना में फोन कर दिया , थाना कि जिप्सी तुरंत आ गयी लेकिन गोप जी को देखते ही चलते बनी । मैं दर्द सेकराह रहा था लेकिन कोई मदद को नहीं आया।

 अंत में मैनैं ही हथियार डालना उचित समझा और जाके गोप जी के पैर पकड लिए , मैं खून से लथपथ था ये देखकर गोपजी का दिल पसीजा और उन्होनें अपने सभी गुर्गों को भागने का आदेश दिया । मैं दो तीन घंटे यूँ ही दुकान के आगे सडक पर बैठा रहा पर कोई मदद को नहीं आया। कुछ घंटो बाद एक दूर के रिश्तेदार आए जिन्होंने मरहम पट्टी करवाई । चौंतीस टाँके पडे थे । होंठ के अंदर चार । चार पाँच महीने बिस्तर पर पडा रहा । न ठीक से खा पाता था न बोल पाता था । अगल बगल के लोग आश्चर्य कर रहे थे कि इतनी मार खाने के बाद भी ये बच कैसै गया ? कुछ लोग एफ आई आर करने को बोल रहे थे ,लेकिन बुद्धिजीवीयो ? ने सलाह दी कि और लफडा हो जाएगा धंदा बंद हो जाएगा , गवाही कोई नहीं देगा । पी एम सी एच में ईलाज कराने गए तो डॉक्टरों ने पुलिस केस बताकर ईलाज करने से मना कर दिया । थाना गए तो पुलिस ने गोप जी का नाम सुनते ही रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया ,बोले मैनैज कर लो । रोज धमकी मिलती रही केस नहीं करने को । बाबूजी के कुछ शुभचिंतको ने गोपजी को समझाया जाने दीजीए बिन बाप का बच्चा है कमाता-खाता,पढता-लिखता है कुछ नहीं करेगा । तब जाकर जान छूटी ।

अंदर से डर खत्म हो गया लोग बोलते रहे दाँत टूट गया है आगे का है अच्छा नहीं लग रहा लगवा लो मैनैं नहीं लगवाया । कुछ यादें जेहन में हमेशा रहनी चाहिए । मेरा वो रेलवे का परीक्षा नहीं छूटता तो शायद मैं अभी रेलवे में नौकरी कर रहा होता । खैर छोडिए जेहि विधी राखे राम, ताहि विधि रहिये।

जंगलराज की यादें

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#जंगलराज_की_यादें

तिथि- 01/01/2000 ईस्वी !
समय- शाम के ठीक साढ़े 5 बजे ।
घटनास्थल- ग्राम- मन्जौरा,
जिला मधेपुरा ।

मित्रों, आज मैं अपने परिवार द्वारा भोगी हुई आपबीती बताने जा रहा हूँ.. और यह उस समय कि घटना है जब बिहार की जनता शाम के 5 बजे अपने घरों में छुप हो जाती थी.. तब हम एक 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छोटे बालक ही थे ।

अब बालक थे.... तो माँ कहती "बौआ, साँझ के इधर उधर न निकलिहैं, फैजान(बदमाश) तोरा के पकड़ लेतौ" हम भी माँ पिताजी की बातें मानते थे.. सवाल नहीं किया करते थे जैसे कि उस समय कोई व्यक्ति अपहरण होने पर लालू यादव से सवाल नहीं उठाया करता था...

सर्दियों के दिन थे... फर्स्ट जनवरी थी... शाम का धुंधलका छा गया था... हमारे चाचाजी शाम को कहीं घूमने निकल गए । उनके लिए यह सामान्य सी बात थी.. हमारे चचेरे भाई "रंगम भैया" बांका हॉस्टल से 10 दिनों की छुट्टी लेकर के आए हुए थे.. उस समय वह 8वीं कक्षा में पढ़ते थे...... हमारी चाचीजी रसोईघर में रंगम भैया के लिये सेवई-पूरी बना रही थी... इतने में आँगन में 10 आदमियों के कूदने की आवाज सुनाई दी ! धप-धप करके सब बॉउंड्री फांदकर पूरे घर को आगे-और पीछे से घेर लिया..... अब सामने 10-15 नकाबपोश डकैत खड़े थे.. चाची तो जैसे बेहोश सी हो गई रंगम भैया की कनपटी पर पिस्तौल सटाकर चाची को घसीटते हुए उनके कमरे में गए । दादी और साथ में रहने वाले एक मामाजी को घर में हाथ पैर बांध कर डकैतों ने उनके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, ताकि वे चिल्ला न पाएं ।

अब चाची के पास घर के जितने भी हीरे और सोने के जेवर-जेवरात थे.. सभी डकैतों ने बन्दूक की नोक पर लूट लिए । डकैतों ने एक लाइसेंसी ब्रिटिश रायफल और 10 लाख नगद भी लूट लिया । और फिर डकैतों ने रंगम भैया को साथ में ले जाते हुए कहा कि "अगर सात दिन के अंदर- अंदर तुमलोग 25 लाख रुपया देते हो तो बच्चा वापस किया जायेगा, नहीं तो गर्दन काटकर तुम्हारे दरवाजे पर फेंक जाएँगे" चाची तो यह सुनकर बेहोश हो गई..

डैकत लूट का सारा माल लेकर चलते बने । फिर जब चाचाजी लौटे तो उन्होंने पूरा घर-बाहर सब अस्तव्यस्त देखा ! तब तक गाँव में जिसने भी यह दर्दनाक खबर सुनी तो पूरा गाँव उमड़ पड़ा... गाँव के सबसे बड़े जमींदार ! वो भी एक ही बेटा ??अगर वह भी सुरक्षित न रहे तो एक पिता के लिए इससे भी बड़ा कोई दर्द होता है क्या ??????? चाचाजी को हार्ट अटैक आ गया.. लोगों ने किसी तरह संभाला !

अब बिहार की police ने अपना चिरपरिचित रंग दिखाते हुए अपराधियों को संरक्षण ही दिया... रंगम भैया की कहीं कोई खबर नहीं थी....! मेरे चाचा और चाची ने अन्न-जल सब कुछ छोड़ दिया था.... दिन भर रोते रहते थे.. चाचाजी जैसे पागल बन गए थे.. कह रहे थे- बेटा न मिला तो जीकर क्या करेंगे? इससे अच्छा तो मरना भला ! सारे गाँव में एक मातम पसरा हुआ था...... सब को हँसाने वाले चाचा जैसे काठ बन गए थे.. उन अपहरणकर्ताओं को पकड़ने के बजाय पुलिस और प्रशासन टाल-मटोल करती रही.... आईजी तक बात गई, लेकिन सब फेल !

फिर किसी शुभचिंतक ने सलाह दी कि पुलिस के चक्कर में रहिएगा तो बेटा भी गवां लीजिएगा..."ध्रुव बाबू" आप उनको पइसा दे दीजिये । बेटा दुबारा लौट कर नहीं आएगा । वही हुआ..... अपहरण कर्ताओं को फिरौती मिली और तब जाकर रंगम भैया वापस आये ।

अपराधियों के चंगुल से छूटने के बाद भी हमारे परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर खौफ का साया मंडराता ही रहा । रंगम भैया तो 5 साल तक हॉस्टल में ही रहे... इस घटना के 4 साल बाद ही वो अपने गाँव आ पाए । चाचाजी को इस घटना के बाद बहुत सदमा लगा । एक अच्छे खासे स्वस्थ आदमी को दिल का रोग हो गया । और उसके बाद रोग बढ़ते ही रहे... एक दहशत की तलवार हमेशा हमारे परिवार पर मंडराती रहती थी.... और इन सब वजहों के कारन चाचाजी को 3 साल बाद दोनों किडनी ने काम करना बंद कर दिया । और वो चल बसे.... !


मैंने अपना चाचा खोया है, मेरे रंगम भैया ने अपना पिता, और चाची ने अपने मांग का सिंदूर खो दिया ! और आज आप पूछो तो कहते हैं.. क्या है जंगलराज ? मैं बताऊँगा क्या होता है जंगलराज....

जंगलराज ने मेरे परिवार का सुख-चैन सब लूट लिया... और उस घटना को याद करते हुए कितना रोता है ये दिल ? मेरे चाचाजी को लील गया , जंगलराज ! यह जंगलराज न जाने कितने माँ के बेटों को लील गया, कितने सुहागिनों की माँग सूनी कर गया यह जंगलराज ! मैंने अपना बचपन कितने खौफ में गुजारा है, याद करते हुए अब मुझे डर नहीं लगता बल्कि क्रोध आता है कि इस "जंगलराज" को
लगातार 15 साल तक लाने के लिए पूरे बिहारवासी अधिक जिम्मेदार थे.... जाति- पांति में बंटकर सुख-चैन सब छिन गया। मैंने हमेशा जंगलराज के खिलाफ जाकर वोट किया है और मेरा वोट हमेशा जंगलराज के खिलाफ ही रहेगा ! क्योंकि जब वोट गिराने के समय मुझे अपने चाचा का रोता हुआ चेहरा याद आता है तो मैं क्रोधित हो उठता हूँ... कि मैंने आज यदि गलत का साथ दिया तो क्या ठीक है कि आने वाले दिनों में मेरे बेटों का अपहरण हो जाये ? और मैं भी उसी दर्द से गुजरूं जैसा कि आज से 15 साल पहले चाचाजी को अपने बेटे के लिए तड़पते देखा था.... नहीं, मेरा वोट जंगलराज के खिलाफ जायेगा ।

और यह घटना शब्दशः सच है। किसी को अगर कहानी लगे तो स्वंय इस गाँव में आकर तसदीक कर लें ।

- कुंदन कामराज

कभी तो हमारा दर्द समझिये!!

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मैं आपसे बात करना चाहती हूँ, अपना दर्द साझा करना चाहती हूँ, मैं सबसे पहले अपने बारे में आपको बताना चाहती हूँ की मैं बेहद भावुक हूँ, इंसान तो बहुत दूर की बात हैं कोई छोटी सी चींटी मर जाए तो खाना गले के नीचे नहीं उतरता। अख़लाक़ की हत्या मुझे भी अंदर तक झिंझोड़ देती हैं, उसके परिवार की चिंता होती हैं, महंगाई के दौर में सबसे ज्यादा चिंता आर्थिक पक्ष को लेकर होती हैं। मानती हूँ की जो हुआ बेहद गलत हुआ ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। यह सिस्टम से लेकर हमारी सामाजिक चेतना तक का फेलियर हैं।
लेकिन मैं आपके सामने एक दूसरा पहलु भी रखना चाहती हूँ की जो मेरे जैसे लोगो को ना चाहते हुए भी कट्टरता की तरफ धकेल रहे हैं जो हमारे स्वभाव में ही नहीं हैं। आपके रवैये से हम बेहद दुखी और असुरक्षित महसूस करते हैं और हमे मजबूरन ऐसी घटनाओ पर चुप्पी साधनी पड़ती हैं और आपको बता दूँ की यह चुप्पी हमारी पहली स्टेज हैं। दूसरी स्टेज पक्ष में बोलना और तीसरी स्टेज खुद वैसा ही हो जाना होता हैं। आपसे मार्मिक अपील करती हूँ की हमे इस कट्टरवाद के रास्ते पर चलने से बचा लीजिये यह आपका एहसान हम पर, इंसानियत और सेक्युलरिज्म पर होगा। आपके रवैये से कभी-कभी इतना कड़वापन मन में भर जाता हैं की मैं परेशान और बेचैन हो उठती हूँ।
दुःख इस बात का होता हैं की जब ऐसी घटनाओ के शिकार हिन्दू होते हैं तब आप सेकुलर लोग चुप्पी साध लेते हैं यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा हैं। मुझे याद हैं नागपुर में मोईन खान की हत्या, दादरी के अख़लाक़ की हत्या तो मैं पुरे जीवन ही नहीं भूल पाऊँगी, लेकिन मुझे सिर्फ दो दिन पहले पता चला की एक हिन्दू को सिर्फ इसलिए मार दिया गया की उसने एक धार्मिक स्थल के पास हार्न बजाया, एक लड़के को सिर्फ इसलिए मार दिया गया की वो किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम करता था। केरल से भी लगातार खबरे आती हैं नृशंस हत्याओ की तब आप लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते? क्यों नहीं ऐसी खबरे मिडिया की कवरेज पाती हैं? बस ऐसी ही बाते मन में असुरक्षा पैदा करती हैं और आप जैसो की इंसानियत कटघरे में खड़ी करती हैं क्यों आप लोग ऐसी हत्याओ में मरने वाले का धर्म देखकर अपने आँसू बहाते हैं। क्यों नहीं आप लोग ऐसे लोगो को तब लताड़ते हैं? अरे मेरे यहाँ तो नास्तिक लोगो को भी स्वीकार किया जाता हैं, पर आप काफिर की हत्या के लिए उकसाते हैं। हम कैसे खुद को सुरक्षित महसूस करे ऐसे माहौल में?
हिन्दुओ की आस्था गाय से जुडी हैं तो प्लीज छोड़ दीजिये ना, मांस खाने के लिए बहुत से पशु पक्षी हैं खाइये कौन रोक रहा हैं, अपने हिन्दू भाइयो के लिए छोड़ दीजिये।
हम तो आपके लिए अपने गणपति के पंडाल खाली कर देते हैं कि आप अपने खुदा की इबादत कर सको, पर आप पर उन्ही गणपति की ख़ुशी में उड़ाया गुलाल पड़ जाए तो आपका धर्म भृष्ट हो जाता हैं आप मारने काटने पर उतर आते हो।
चलिए मान लेती हूँ ये लोग असामाजिक तत्व हैं पर आप तो समझदार हैं क्यों नहीं ऐसे लोगो का अपनी पूरी ताकत के साथ विरोध करते, मैं कभी कभी इस कदर परेशान हो जाती हूँ की मेरा एक मुस्लिम भाई हैं घण्टो से उससे इनबॉक्स में लड़ती हूँ जलील करतीहूँ उसके स्टेटस पर उसी का मजाक उड़ाती हूँ अच्छा नहीं लगता। कभी कभी तो इतनी शर्मसार हो जाती हूँ की सोचती हूँ की कर कोई रहा हैं और ज्यादती मैं इसके साथ कर रही हूँ। पर क्या करू मैं परेशान हो उठती हूँ असुरक्षित महसूस करने लगती हूँ।
प्लीज अब बर्दाश्त नहीं होता भगवान के लिए यह माहौल बदल दीजिये, हत्याओ में धर्म मत देखिये हर हत्या का विरोध करिये, हर हत्यारे को बगैर धर्म देखे उसके अंजाम तक पहुँचाइये, और चलिए शुरुआत हम मरहूम अख़लाक़ के हत्यारे से ही करते हैं पर यह सिलसिला बना रहना चाहिए और अगर किसी हिन्दू की हत्या हो तो उसके हत्यारे का भी अंजाम वही हो जो अख़लाक़ के हत्यारो का होगा। वरना आप मुझे खो देंगे एक इंसान जो आपके पाले में बड़ी मजबूती के साथ खड़ी थी और मेरे जैसे ना जाने कितने और भी। विनती करती हूँ प्लीज हमारे जैसे लोगो को को इस आग से बचा लीजिये!!

इंडियन स्टैण्डर्ड टाइम का मतलब

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मैं पहले भी लिख चुका हूं कि अपनी पत्नी के साथ मैं दांतों के डॉक्टर के पास गया था और डॉक्टर ने उसे देखने से मना कर दिया था। उन दिनों हम अमेरिका में थे और एक शाम अचानक पत्नी के दांतों में दर्द शुरू हुआ। हमने डॉक्टर को फोन किया, डॉक्टर ने फोन पर इमरजंसी वाली दवाएं बताईं और अगले महीने मिलने का समय दिया।
जिस दिन हमें डॉक्टर से मिलने जाना था, उस दिन सुबह से ही खूब बर्फ गिर रही थी। किसी तरह बर्फ में गाड़ी चलाते हुए हम डॉक्टर तक पहुंचे, तो डॉक्टर ने मेरी पत्नी को देखने से मना कर दिया और कहा कि आप दस मिनट देर से आए हैं, अब दूसरे मरीज़ को बेजवह इंतज़ार करना पड़ेगा।
मैंने बहुत अनुरोध किया, उससे कहा कि आप देख ही रहे हैं कि बाहर कितनी बर्फ गिर रही है, ऐसे में इतनी देर तो स्वाभाविक है। मेरी बात पर डॉक्टर हैरान हो गया। बर्फ गिर रही है, इसलिए देर हो गई? उसने बहुत सधे हुए लहज़े में कहा कि बर्फ तो उसके लिए भी गिर रही थी, पर वो तो समय पर आया।
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जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था, तब स्कूल के किसी फंक्शन में शहर के महापौर बतौर चीफ गेस्ट आने वाले थे। हम सारे बच्चे धूप में बैठ कर उनका इंतज़ार कर रहे थे। महापौर महोदय सुबह आठ बजे आने वाले थे, हम बारह बजे तक धूप में बैठे रहे। चार घंटे बाद महापौर जी आए, पर उनके चेहरे पर रत्ती भर अफसोस नहीं था कि हम भूखे-प्यासे गर्मी में उनका इंतज़ार करते रहे। उन्होंने एक बार भी अपने देर से आने के लिए हम बच्चों से माफी नहीं मांगी थी।
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मैं पत्रकारिता में आया। तब राजेश खन्ना दिल्ली से चुनाव लड़ रहे थे। एक बार मुझे उनके साथ उनके प्रचार में रिपोर्टिंग के लिए जाने का मौका मिला। वो अपने समय से कोई तीन घंटे देर से वहां पहुंचे। तब तक राजेश खन्ना का थोड़ा जलवा बचा था, शायद यही कि तब तक फिल्मी कलाकार दर्शकों को साक्षात बहुत कम दिख पाते थे। भीड़ को रोके रहने के लिए कोई कविता पाठ कर रहा था, कोई छुटभैया नेता भाषण दे रहा था और बार-बार अनाउंस हो रहा था कि बस अब आपके चहेते राजेश खन्ना आने ही वाले हैं। मैंने राजेश खन्ना से पूछा भी था कि आपको इस बात का अफसोस नहीं कि इतनी देर से लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं? उन्होंने कहा था कि यहां इंडियन स्टैंडर्ड टाइम चलता है। इतनी देर की तो पब्लिक को आदत ही होती है।
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इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर अगर लिखने बैठा तो लिखता चला जाऊंगा, कहानी खत्म नहीं होगी। आप भी जानते हैं कि भारत में समय की कीमत लोगों की निगाह में क्या है? जब तक कम्यूटर पर दफ्तर जाने का समय दर्ज होना शुरू नहीं हुआ, मैंने किसी सरकारी अफसर को समय पर दफ्तर जाते नहीं देखा। कई बड़े लोगों की हेकड़ी ही इस बात में होती है कि वो देर से वहां पहुंचें। मैं अपने पत्रकारिता के इतने लंबे करीयर में एक पूरी लिस्ट बना सकता हूं कि कौन कहां टाइम से पहुंचता है, कौन देर से? किसे अपने देर से आने पर शर्मिंदगी महसूस होती है, किसे अकड़ महसूस होती है कि इतनी देर बाद भी लोग उसके इंतज़ार में बैठे रहे।
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मैं किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ा। देश के ज्यादातर नेताओं, अभिनेताओं से मेरा परिचय है। कांग्रेस, बीजेपी, वामपंथी दलों सबके लिए मैंने रिपोर्टिंग की है। इसलिए आज जो मैं लिखने जा रहा हूं, उसमें किसी तरह की राजनीति तलाशने की प्लीज़ कोशिश मत कीजिएगा। मेरे लिखे को एक पत्रकार, एक चैनल हेड की हैसियत से लिखा मत समझिएगा। आज मेरे लिखे को एक बेहद सामान्य आदमी की सहज टिप्पणी भर मानिएगा।
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कल मैं अपने दफ्तर की ओर से आयोजित स्वच्छ भारत कार्यक्रम में शामिल हुआ। वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आना था। तय समय के मुताबिक उन्हें शाम साढ़े आठ बजे उस कार्यक्रम में शामिल होना था। मुझे मालूम था कि प्रधानमंत्री सुबह से बिहार दौरे पर गए हैं। कई जगहों पर उनका भाषण था। अब कोई दिन भर भाषण दे, गर्मी और उमस में हज़ारों लाखों लोगों से मिले और फिर सीधे हमारे कार्यक्रम में आना हो, तो उसे कुछ देर तो हो ही जाएगी। मेरे मन में था कि आधा घंटा देर से अगर वो आए, तो कोई ख़ास बात नहीं।
मेरा यकीन कीजिए, घड़ी में आठ बज कर बीस मिनट हुए होंगे, हमें एसपीजी ने अलर्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री आ रहे हैं। और ठीक साढ़े आठ बजे प्रधानमंत्री हमारे सामने थे। आते ही उन्होंने कहा कि सारा दिन भाषण देकर उनका गला बैठ गया है, उन्होंने एक घूंट पानी पिया और कार्यक्रम में शिरकत करने बैठ गए।
मैं उनके सामने बैठा अपनी सोच में डूबा था।
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आप मुझसे समहत हों, असहमत हों। पर इतना तय है कि इससे पहले मैंने किसी नेता को समय की इस तरह इज्ज़त करते नहीं देखा था। मैं तमाम नेताओं के साथ दौरे पर गया हूं। मैं किसी का नाम नहीं लिख रहा, पर मैंने किसी को समय की इस तरह परवाह करते नहीं देखा। अभिनेताओं में अगर एक अमिताभ बच्चन को छोड़ दूं, तो ज्यादातर नेता और अभिनेता लोगों इंतज़ार कराने में ही अपनी शान समझते हैं।
मैं अपने अनुरोध को दुहरा रहा हूं कि आप मेरी आज की पोस्ट में राजनीति को मत तलाशिएगा। मैंने एक आदमी की तारीफ की है, क्योंकि मैंने उसे समय की इज्ज़त करते हुए अपनी आंखों से देखा है।
***
मां सच कहती थी। जो समय की परवाह करते हैं, समय उन्हीं की परवाह करता है।
‪#‎Rishtey‬


Crtsy-Sanjay Sinha

देश बदलने के लिए पहले हमे बदलना होगा

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आपको लगता हैं कभी इस देश में कुछ बदलेगा!!

नेता कहते हैं सारा दोष जनता का हैं जीडीपी, रुपया उनकी वजह से गिर रहा हैं और जनता सारा दोष नेताओ पर थोपती हैं| मतलब साफ हैं की कुछ भी हो हम दोषी नहीं हैं अपना दोष इस देश में बस दुसरो पर थोपने की लोगो को आदत हो गयी हैं| यहाँ तक हमें ईमानदार अधिकारी तक पसंद नहीं आते हमें रिश्वतखोर अफसर पसंद आते हैं क्योकि हम वहाँ कुछ ले देकर अपना काम जो करा लेते हैं|

यह तक नहीं मालूम लोगो को देशभक्ति कैसे दिखाई जाती हैं अधिकतर लोग तो सिर्फ सीमा पर दुश्मन देश से लड़ने को ही देशभक्ति मानते हैं, थोडा और आगे बढ़ गए तो फेसबुक और ट्वीटर पर भारत जिंदाबाद के नारे लगा लिए और खा पीकर सो गए की हम हो गए बड़े वाले देशभक्त  मतलब साफ़ हैं हमें पता ही नहीं की देशभक्ति कैसे की जाती हैं| लिवाइस की जींस और कोक पेप्सी लेज के चिप्स खाते हुए हम देश की गिरती हुई अर्थव्यवस्था पर चर्चा करते हैं और अगर कोई स्वदेशी सामान प्रयोग करने की सलाह दे तो उसका मनोबल यह कहकर तोड़ने की कोशिस करते हैं की पहले फेसबुक की प्रोफाइल बंद कर लैपटॉप फोड़ दे मोबाइल तोड़ दे यह तो हमारी सोच हैं, नहाने के लिए लक्स चाहिए खाने के लिए विदेशी पापड़ जो 10 रूपये का आलू खरीदकर 500 रुपये में बेचा जाता हैं और चिंता करेंगे जीडीपी की कौन सा दोहरा चरित्र हैं यह अपने देश के नागरिको का कि हम जीरो तकनिकी से बनी चीजे भी विदेशी खरीदना चाहते हैं|


आखिर हम कब बदलेंगे, कब हम जापान के नागरिको की तरह प्रण लेंगे की जो चीज हमारे देश में बनती हैं वह चीज हम कभी विदेशी नहीं खरींदेगे, द्वतीय विश्वयुद्ध में तबाह जापान को किसी नेता नहीं बनाया, बनाया तो उस देश के नागरिको ने बनाया आज जापानी हम हिन्दुस्तानियों को विकास के हर क्षेत्र में पीछे कोसो पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं, पर हम तो नहीं सुधरेंगे क्योकि हम बेशर्म लोग जो ठहरे, बेशर्मी हमारी राष्ट्रीय पहचान और चरित्र जो बन गयी हैं, हमने सिर्फ आरोप लगाना सिखा हैं करना तो कुछ सिखा ही नहीं ना, कोल्डड्रिंक में अगर जहर हैं तो भाई आपको क्या दिक्कत पी तो हम रहे हैं ना||  

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मेरी नजर में

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फेसबुक पर जितने भी सो काल्ड सेकुलर जो असल में तुष्टिकरण के नीति के पोषक हैं वो सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिन भर गालिया देते हैं कुछ महानुभाव तो ये भी कहते पाए गए हैं कि "हम यहाँ संघियों को सेकुलर बनाते हैं" और कुछ को संघ साम्प्रदायिक संगठन लगता हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने घर आये लोगो को कभी पानी नहीं पिलाया होगा वो नागपुर रेलवे स्टेशन के बाहर ये उम्मीद करते हैं की कोई संघी उनको स्टेशन पर मिठाई और पानी लेकर खड़ा मिलेगा, खैर ऐसा ही बहुत सा दुष्प्रचार मैं संघ के बारे में फेसबुक पर सुनती पढ़ती थी| संघ को जानने का मेरे पास कोई साधन नहीं था सिवाय इंटरनेट के और इंटरनेट की जानकारी पर मुझे ज्यादा विश्वास नहीं था, और मेरी उत्कंठा लगातार बढती जा रही थी की आखिर आरएसएस हैं क्या? आखिर में मैंने अपने शहर के संघ कार्यालय का पता किया और एक दिन अपनी एक सहेली को लेकर संघ कार्यालय पहुच गयी वहाँ मौजूद प्रचारक जो समाज सेवा के लिए घर परिवार सभी छोड़कर पूर्णकालिक संगठन के कार्यो को कर रहे हैं उनसे मुलाकात हुई परिचय के बाद बहुत देर तक उनसे संघ के इतिहास और चलाये जा रहे कार्यो के बारे में जानकारी ली, मैं पूरा टाइम उनकी आलोचना करती रही और वो पुरे धैर्य के साथ मेरी बात सुनते और उसका जवाब देते रहे मेरे कटु सवालों के सारे जवाब उन्होंने हँस कर और संतोषप्रद दिए और उन्होंने मुझे संघ की मुख्य पत्र पांचजन्य और बहुत सारी किताबे भी दी हैं पढने को, और मुझे गहन आश्चर्य हुआ यह जानकार कि संघ १२० से भी अधिक आनुसंगिक संगठनों के जरिये पूरे देश में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम कर रहे हैं। नक्सली इलाको में इनके कार्यकर्ता आदिवासी बच्चो के लिए होस्टल चला रहे हैं उनको मुफ्त शिक्षा कपडे सभी दे रहे हैं शहरी क्षेत्रो में सरस्वती शिशु मंदिरों के जरिये भारतीय संस्कृति के साथ वैज्ञानिक तरीके से लाखो बच्चो को राष्ट्रभक्त बना रहे हैं और देश को एक सभ्य और सुसंस्कृत पीढ़ी तैयार कर रहे हैं अब ये आपको तय करना हैं की आप अपने बच्चो को कान्वेंट में पढ़ाकर नशेडी और व्यभिचारी बनायेंगे जो आपको बुढापे में ओल्ड एज होम पहुचायेगा या इन मंदिरों में पढ़ा कर संस्कारवान बनायेगे| खैर बात हो रही थी संघ के कार्यो पर संघ बिना किसी सरकारी फंड के बहुत सारी समाज सेवा के कार्यो को अंजाम दे रहा हैं| जब कही प्राकृतिक आपदा आती हैं तो सरकारी सहायता के पहले संघ की सहायता पहुचती हैं भूकंप में ये हर घर से अनाज नमक मशाले दाल सब्जी एकत्र करके प्रभावित क्षेत्रो में भेजते हैं और किसी की सहायता के पहले उसके धर्म और जाति नहीं पूछते जबकि असम में जब विपदा आई तो कुछ मुस्लिम सांसदों ने ये सहायता शिविरों के बाहर बोर्ड लगाया की सहायता सिर्फ मुस्लिमो के लिए हैं और इसाई धर्म वाले इस सहायता की आड़ में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन करवाते हैं मगर संघ बिना किसी स्वार्थ के ये सहायता प्रदान करता हैं| चीन युद्ध में इनके कार्यो से प्रसन्न होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इनको आरडी परेड में शामिल किया जो अभी तक किसी भी गैर सरकारी सेवा संगठन को नहीं मिला हैं| अगर बात साम्प्रदायिकता की जाए तो मैंने इनका अखबार और किताबे पढ़ी एक भी साम्प्रदायिक बात मुझे नजर नहीं आई उल्टा ये उग्र राष्ट्रवाद की बात करते हैं और प्राणियों में धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते हैं इनके संगठन से हर धर्म के लोग जुड़े हुए हैं ये वसुधैव कुटुम्बकम “ सर्वे भवन्ति सुखिन जैसे सूत्र से सबको जोड़ने का प्रयास करते हैं अपने किसी भी स्वयंसेवक के उपनाम से ना पुकार कर नाम के आगे जी लगा कर पुकारते हैं  और ये सब  तो उन्ही को गलत लगेगा जो देशद्रोही होंगे| "नमस्ते सदा वत्सले मात्र भूमि" इतने पवित्र भाव से धरती को माँ कह कर नमस्कार करने वाले इनको देशद्रोही और वन्देमातरम का विरोध करने वाले देशभक्त लगते हैं| खुद इन्होने कभी भी कोई सेवा का काम नहीं किया होगा मगर ये आरएसएस को कोसते नजर आयेंगे वहाँ हिन्दू तकलीफ में हैं आरएसएस क्या कर रही हैं और ध्यान दीजियेगा मित्रो एक तरफ ये आरएसएस का दुष्प्रचार करके उसकी जड़े भी कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और खुद कुछ करने की अपेक्षा आरएसएस से उम्मीद लगाए बैठे हैं अरे उस संगठन की जितनी क्षमता हैं वह उतना कार्य कर रही हैं और अगर आप चाहते हैं की वह और ज्यादा काम करे तो उससे जुड़े अपना सहयोग दे वह और भी कार्य करेगी, मगर नहीं ये करेंगे तो यहाँ आलोचना कौन करेगा?  दुनिया में शायद ही कोई इस तरह से निस्वार्थ काम करने वाला संगठन होगा। आप सभी से निवेदन हैं की आप लोग भी मेरी तरह सिर्फ एक बार संघ कार्यालय पर जाए उनके कार्यो को बारे में जाने और उनसे पूछे फिर फैसला ले की क्या गलत हैं और क्या सही, और ऐसा मुझे विश्वास हैं की आप उनके बारे में एक बार जान लेंगे तो आप भी उनके मुरीद हो जायेंगे|

बिहार के जंगलराज की कहानी -2

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Sonu kumar Mishra
#जंगलराजकीयादें

सिन्हा जी पटना के एक बहुत ही मसहूर डॉक्टर
थे ।।एक प्रसिद्ध सर्जन भी थे जो अमेरिका से
पढ़ाई और काम करके वापस अपने मात्रभूमि में
काम और सेवा के मकसद से पटना लौटे थे ।।पटना
में उनकी खूब डाक्टरी चलती थी ।। दूर दूर से
मरीज आते थे सिन्हा जी को दिखाने ।।साथ
साथ वे लालू प्रसाद के करीबी यानी फेमिली
डॉक्टर भी थे ।। उस दौर में डॉक्टरों का
अपहरण और फिरौती अपने चरम पर था ।। पर
सिन्हा जी को लगता था की मेरे ऊपर
मुख्यमन्त्री का हाथ है मेरा कोई कुछ नही
बिगाड़ सकता ।।

तभी एक दिन उनके घर भी फोन बजा और
आवाज आई आपको सेलेक्ट किया गया है
अपहरण के लिए ।।ऐसा करिये 5 लाख दे दीजिये
वरना आपके अपहरण पर जो खर्चा आएगा वो
अलग से और देना होगा ।। डॉक्टर साहब बोले तू
मुझे जानता नही है मैं कौन हु ये कहते हुए फोन
काट दिया ।। अगले दिन लालू के पास पहुचे और
पूरी घटना बताई ।। लालू ने कहा चिंता मत
कीजिये हम देख लेंगे ।। अगले दिन डॉक्टर साहब
के पास फिर फोन आया की मिल आये
मुख्यमन्त्री जी से और बता दिया न ।। अब नए
हिस्सेदार बन गए है ।। अब 10 लाख कर दिया है
।। 3 दिन में लेने आएंगे ।।

डॉक्टर साहब मुख्यमन्त्री निवास पहुचे और
पूरी घटना बताई और फिरौती की नई रकम के
बारे में बोला।। बगल में साधू यादव भी थे ।। जो
डॉक्टर को देखकर मुस्करा रहे थे ।। लालू जी ने
डॉक्टर से कहा " का सिन्हा जी एतना कमाते
हो हमारे बचवा लोग को पाँच दस लाख दे दोगे
तो कवन कम पड़ जाएगा "।। फिर साधू की तरफ
बोले डॉक्टर साहब अपने है दू लाख कम करवा दे ,
अब तो ठीक है डॉक्टर ।।

सिन्हा जी वापस घर आये फिर पता चला की
वापस हमेसा के लिए सपरिवार अमेरिका सिफ्ट
हो गए ।।

दुबारा शायद ही कभी बिहार वापस आएंगे ।।
बिहार ने अच्छा डॉक्टर हमेसा के लिए खो
दिया ।।

बिहार के जंगलराज की यादें

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लालू के राज के दौरान बिहार ज्यादा आना जाना नहीं हुआ पर एक यात्रा 1998 में बिहार
की हुई कानपुर से बोकारो तक। बोकारो तब
बिहार में ही था। एक शादी में शामिल होना
था। गए तो रेल गाड़ी से थे (कानपुर से गोमो
और फिर वहां से एक और ट्रेन), पर वापसी की
गाड़ी गोमो या किसी और पास के स्टेशन से
थी और बोकारो से वहां तक के लिए उस वक़्त
कोई ट्रेन नहीं थी। तो बस अड्डे गए कि बस से
चले चलते हैं। पर वहां पर बहुत भीड़ थी और कोई
बस वाला छोटी दूरी के लिए सीट देने को
तैयार नहीं था। सब प्राइवेट बसें चल रही थी।
बचपन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीता था और
वहां रोडवेज और प्राइवेट वालों का अलग अलग
बस अड्डा होता था। मैंने पास खड़े एक सज्जन
से पूछा की "ये रोडवेज़ का बस अड्डा है तो
यहाँ पर बिहार रोडवेज की बस क्यों नहीं लगी
है"। तो उन्होंने बताया कि "रोडवेज की बस
नहीं हैं"। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मुझे लगा
कि ये बोल रहे होंगे कि अभी कोई रोडवेज बस
नहीं है वहां के लिए जहाँ मुझे जाना है। फिर मैंने
पुरे बस अड्डे पे नज़र घुमाई पर वहां कोई भी
रोडवेज की बस नहीं दिखी। तो मैंने फिर उन
सज्जन से पूछा कि "रोडवेज की कोई भी बस
क्यों नहीं है यहाँ? क्या रोडवेज का अड्डा
कहीं और शिफ्ट हो गया है?" इस पर वो बोले
कि "अभी बताया तो था कि रोडवेज की बस
नहीं हैं"। मुझे फिर भी ठीक से समझ नहीं आया।
मैंने बोला कि "क्या मतलब, रोडवेज है तो बसें
भी होंगी ना?", वो बोले कि "यही तो
आपको बता रहा हूँ कि यहाँ रोडवेज है पर उसके
पास चलने लायक बसें नहीं हैं इसलिए रोडवेज की
कोई बस सर्विस नहीं है बोकारो से"। वो मेरा
बिहार के कुशाषन का पहला और एकमात्र स्वयं
का अनुभव था। बस यात्रा के दौरान ये भी
पता चला की केवल रोडवेज की बसें ही गायब
नहीं हैं, रोड भी गायब है। खैर हमको तो थोड़ा
ही दूर जाना था किसी तरह लटक के चले गए
प्राइवेट बस से हिचकोले और धक्के खाते हुए पर
उसके बाद सोचता रहा की कैसे काम चलता
होगा लोगों का बिहार में। फिर समझ में आया
की बिहार के लोगों का रेल गाड़ी से इतना
प्रेम क्यों हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी बहुत समय
बिताया था पर वहां भी, जैसी भी हों, UP
रोडवेज की बसें चलती तो थीं नियमित रूप से।
उत्तराखंड (तब UP में ही था) में UP रोडवेज की
बसें नहीं थी ज्यादा पर हर एक दो घंटे में
ऋषिकेश से हर जगह के लिए रोडवेज की बसें फिर
भी थीं और GMO/TGMO की अच्छी बसें
रोडवेज जैसे ही सर्विस चलाती थी। ऐसा
पहली बार देखा था कि रोडवेज तो है पर बस
सर्विस सर्विस नहीं हैं उनकी। उसी साल बाद में
कर्नाटक और तमिलनाडु पहली बार जाना
हुआ। तब पता चला की सरकारी बसें कैसे बहुत
अच्छे से मेन्टेन रहती हैं और सड़कें कैसे बिना
गड्ढों के भारत में भी हो सकती हैं।

संस्मरण- अतुल कुमार

याकूब मेनन, फाँसी और सेकुलर बुद्धिजीवियो पर उपज रोष !!

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सुनो हिन्दुस्तानियों, अब इसे सुनना बेहद लाज़िमी है तुम्हारे लिए, अगर वाक़ई एक नाली में पलते कीड़े नहीं हो तुम. लेकिन सिर्फ मीठा- मीठा, सभ्य-सभ्य, नैतिक-नैतिक और शालीन-शालीन ही सुनना चाहते हो अगर तो फ़ौरन बंद कर दो इस खिड़की को, जाओ और विरह/मिलन की कविताएं सुनो कहीं, या अध्यात्म/सूफ़ियत की नाज़ुक-नाज़ुक पंक्तियों से ख़ुद को शुद्ध करो, मेरे लिए अब उसका वक़्त पीछे छूट चुका है.


जो मैं कहने जा रहा हूँ वह सुनने में कड़वा, नफ़रत से लबरेज और कहीं-कहीं असभ्य भी लगेगा तुम्हारे 'संस्कारी' कानों को, लेकिन सभ्यता को जूते की नोंक पर रखना उन लम्हों के लिए ज़रूरी हो जाता है, जब इंसान के तौर पर जीने और मरने के मायने भी कोई पूरी तरह बर्बर, असभ्य, वहशी और दरिंदगी से भरे हैवान तय करने लगें. अब भी अगर इसे सुन सकने का हौसला और जज़्बा है तुम्हारे पास तो आगे सुनो.


तुम लाख 'हाय सिकुलर-हाय वामपंथी-हाय कांग्रेसी-हाय जेहादी' रोते-पीटते रहो, तुम्हारे मां बाप/बेटे /बेटी /भाई/बहन यूं ही मरते-कटते बम विस्फोट में चिथड़ा-चिथड़ा होते रहेंगे, और उसके बाद उनकी लाशों के टुकड़े बटोरते तुम अपनी आंखों में ख़ून और सीने में आग भरे ऐसे ही तड़पते रहोगे 25-25 सालों तक - किसलिए?


सिर्फ इसलिए कि उसके बाद अदालत दर  अदालत गुज़रता वह मुक़द्दमा पूरी पीढ़ी के बाद एक दिन सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचेगा - वह 'सर्वोच्च न्यायालय' जिसे इस मुल्क़ की सबसे बड़ी अदालत होने की ताक़त और रुतबा हासिल है. और उस मुक़द्दमे से जुड़े एक-एक सबूत और गवाही को एक नहीं पचास-पचास बार खंगालने के बाद, लंबी-लंबी बहसों के सालों तक खिंचे दौरों के बाद, पूरे मामले की हर पेचीदग़ी को बेहद बारीक़ी से परखने के बाद जब सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुंचेगा कि उसके आरोपियों में से गिरफ्तार एक दोषी की वहशियत इतनी नीच है कि न्याय होने के लिए उसे सज़ा-ए-मौत दिया जाने के सिवा कोई चारा नहीं, तब तुम्हारे सिर के ऊपर बैठे कुछ शदीद वहशियत से भरे ज़हरज़ेहन बौद्धिक हरामज़ादे सामने आएंगे.


ये वो लोग हैं जो ख़ुद अपनी गर्दन में 'जनवादी वामपंथी / क्रांतिकारी' के शातिर और फ़रेबी तमग़े और उपाधियाँ लटकाते हैं, और अपनी पूरी वैचारिक कमीनगी, बेग़ैरती ओर बौद्धिक हरमज़दगी का बिल्कुल नंगा, अश्लील, कुत्तई और धृष्टता से भरा दुस्साहसिक प्रदर्शन करते हुए यह सरे आम, खुले बाज़ार उसी सर्वोच्च न्यायालय के मुंह पर सीधे-सीधे थूकेंगे और उस हैवान के बचाव में हर क़िस्म का ज़हरीला आख्यान पूरी ताक़त और हिम्मत के साथ तुम्हारे मुंह पर फेंक कर मारेंगे - मानो कह रहे हों कि तुम और तुम्हारे प्रियजन तो ऐसे ही चिथड़ा-
चिथड़ा होकर मरेंगे और हम उनकी लाशों को अपने 'लाल' बूटों के नीचे ऐसे ही कुचलेंगे - कर लो जो तुमसे बन पड़े.


तो सुनो हिन्दुस्तानियों, तुम्हारी अदालतें, तुम्हारी सेना, तुम्हारे '56 इंच के सीने', यह सब मिल कर उन जेहादियों का तो सफ़ाया कर सकते हैं, बम विस्फोट करते उन 'सीधे-साधे, पढ़े लिखे, मासूम नौजवानों' को तो फांसी के तख़्ते तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन इन ज़हरीले कीड़ों - इन 'बौद्धिक हरामज़ादे नरपिशाचों' का कुछ नहीं बिगाड़ सकते. जानते हो क्यों?

क्योंकि यह 'सिविल सोसायटी' का बेहद महीन और ज़हरीला नक़ाब ओढ़े रखते हैं अपने ऊपर
- इनमें से कुछ ख़ुद को पत्रकार कहते हैं, कुछ लेखक का चोला ओढ़ते हैं, कुछ संगीतकार कहलाते हैं, तो कुछ अभिनेता, कुछ संगीतकार, कुछ इतिहासकार, कुछ खिलाड़ी और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता होने का दम भरते हैं.

हाँ, कुछ वकील भी हैं, और शर्म से कहना पड़ता है, कुछ पूर्व न्यायाधीश भी हैं इन हरामज़ादों में. तो इनमें से ज़ाहिर तौर पर कोई भी 'आतंकवादी' नहीं है, इसलिए कोई भी अदालत इनका बाल भी बांका नहीं कर सकती.


लेकिन इस बात की तस्दीक़ अच्छी तरह से, अपने दिमाग़ों में ठोंक-ठोंक कर भर लो कि यही बौद्धिक हरामज़ादे जो कहते-दिखाते हैं, उसे पूरा मुल्क़ सुनता और देखता है. हर कोई नहीं बैठा होता फेसबुक और ट्विटर पर तुम्हारी कही बातें सुनने, इसलिए इन सूअर के बच्चों का कहा- दिखाया सच मानने वालों की तादाद महज़ कुछ हज़ारों या लाखों में नहीं, करोड़ों में है. और इन करोड़ों में वो वाक़ई मासूम मुस्लिम बच्चे भी होते हैं, जो यह मान बैठते हैं कि इस मुल्क़ में मुस्लिम होने का मतलब ही पीड़ित होना है, और इन हैवानियत के गूं में पले कीड़ों की बात सच मानकर वो इन्हीं का अगला औज़ार और हथियार बनने को तैयार हो जाते हैं. और फिर इन्हें अपने लिए एक और नया शिकार मिलता है, और ये ज़हरीला सिलसिला यूं ही चलता जाता है. तो सुनो, इस हरमज़दगी से भरे ज़हरीले सिलसिले को तोड़ना, कमर से तोड़ना, पूरी तरह तोड़ना और बेरहम आतिश से इसकी चिंदी- चिंदी जला कर राख़ करना अब बेहद, बेहद ज़रूरी है. न सिर्फ ज़रूरी है बल्कि पूरे तौर पर लाज़िमी भी है अब इस वहशियत से सनी बौद्धिक हरमज़दगी के जाल का टुकड़ा-टुकड़ा काट कर पूरी तरह से जला देना, लेकिन जैसा कि मैंने कहा - तुम्हारी अदालतें, तुम्हारी चुनी हुई '56 इंच की सरकारें', तुम्हारी सेना, तुम्हारी पुलिस - कोई नहीं कर सकेगा यह काम, क्यों?

इसलिए कि यह 'सिविल सोसायटी' के नक़ाब के
पीछे छुपे हैवान हैं. तो सवाल है कि इस वहशियत से सनी बौद्धिक हरमज़दगी के जाल को ख़त्म करेगा कौन?? और इसका जवाब है - तुम ख़ुद!! हाँ, तुम ख़ुद ही काटोगे अपने फ़रसे से अब इस कमीनगी के जाल को. तुम्हें ही अपने हाथ में शमशीर उठा कर अब इन ज़हरज़ेहन दरिंदों के गंदे ख़ून से नहलाना पड़ेगा एक बार, अपने ही हाथ से इनके टुकड़े सड़क पर काट कर इनकी गर्दनों को लटकाना पड़ेगा !!


अपने ही हाथ से इन्हें सड़क पर ज़िंदा जलाना पड़ेगा तुम्हें - एक को नहीं, दो को नहीं, इन सैंकड़ों, हज़ारों में से 'हर एक को' - हर सड़क पर !! और ऐसा सिर्फ इसलिए ज़रूरी है कि अगर फिर कभी ज़हरीली सोच में अंधे किसी जेहादी की हिम्मत हो हिन्दुस्तान पर हमला करने की, तो कम से कम उसे इतना इल्म ज़रूर हो कि अगर वो बच गया, तो उसकी जान बचाने के लिए इस मुल्क़ के सर्वोच्च न्यायालय पर थूकने की हिमाक़त करने वाला कोई बौद्धिक हरामज़ादा उसे हिन्दुस्तान की ज़मीन पर
ज़िंदा नहीं मिलेगा -- और यक़ीन मानो, इन बौद्धिक हरामज़ादों को टुकड़ों मे काट कर इतना संदेश देना ही फ़िलहाल काफ़ी है, और यही है जो तुम्हारे बस में भी है!! कैसे होगा, कब होगा, कहाँ होगा पता नहीं, लेकिन ऐसा होना शुरू होगा ज़रूर अब यहाँ इस मुल्क़ की गली-गली के नुक्कड़-नुक्कड़ पर, इतना पूरा-पूरा यक़ीन है मुझे !! आख़िर बम विस्फोटों में शहीद हुए एक-एक इंसान की रूह अगर सच में कहीं होगी, तो उसका साथ तो मिलेगा ही इस मुहिम को हर सूरत में !!

अरविन्द अरोरा जी की फेसबुक वाल से साभार!!

मोदी जी की विदेश नीति, और हमारी जरूरत !!

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अगर देखा जाये तो हम चारो तरफ से दुश्मन देशो से घिरे हुए हैं, और इन सभी से हमारे कटुतापूर्ण सम्बन्ध हैं। हम अब तक अपने पड़ोसियों से पाँच युद्ध लड़ चुके हैं और इन पाँचो युद्धों में से चार जीते और एक हारे हैं। अभी कदरन चीन को छोड़कर अपने हर पड़ोसी मुल्क से हम मजबूत सैन्य स्थिति में हैं और चीन से युद्ध की स्थिति में हम तो बर्बाद होंगे ही पर चीन युद्ध जीतकर भी खण्डहर बन जाएगा। यह स्थिति चीन भलीभांति समझता हैं और वह हमसे सीधा युद्ध ना करके हमारे ऊपर मानसिक दबाव बनाते हुए छदम युद्ध लड़ना चाहता हैं। इसके लिए वो बंगलादेश, पाकिस्तान श्रीलंका, म्यांमार आदि भारत के पड़ोसी देशों में अपने नवसैनिक अड्डे बना रहा हैं जिसमे से श्रीलंका का अड्डा फिलहाल मोदी सरकार की कूटनीति की वजह से महेंद्र राजपक्षे ने बन्द करा दिया हैं। स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नाम की चीन की एक ऐसी चाल जिसके जरिये भारत पर चीन कब्ज़ा करना चाहता है । यह एक ऐसी चाल है जिसके जरिये चीन भारत की सीमाओं पर बसे देशो से अच्छे सम्बन्ध बना कर उनके यहाँ बन्दरगाह ले रहा है । चीन कहता है इसका प्रयोग वो व्यापार के लिए करेगा पर इतिहास गवाह है चीन अपने व्यापार को मिलेट्री-सहायता देने में गुरेज नहीं करता है। जैसा कि हर देश को करना चाहिए । 15वीं
सदी के शुरुआत में जब चीन के मिंग-राजवंश ने अपना समुद्री-काफिला व्यापार करने के लिए दुनियाभर में भेजा था तो उसके साथ पूरे 72 युद्धपोत भेजे थे, ताकि उन्हे समुद्री-डकैतों और विरोधी देशों की नौसेनाओं से मुकाबला किया जा सके ।

'स्ट्रिंग ऑफ़ पलर्स' के तहत चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हम्बनटोटा, बर्मा में कोको द्विप, दक्षिण चीन सागर में हेनान द्वीप आदि पर कब्ज़ा करता चला जा रहा है । चीन की इस चाल का खुलासा अमेरिका ने 2005 में ही कर दिया था क्यूकि दक्षिण चीन सागर से बन रहे है इस जाल का अंत अमेरिका को घेरने तक का है लेकिन भारत सरकार सोती रही । भारत ने इस पर ध्यान 2011 में दिया और तब तक हम घिर चुके थे । इस मामले में बड़ी बेवकूफी हमारी पूर्व सरकारों की रही है जिन्होंने कभी पड़ोसियों को अपना नही बनाया और आज आप मोदी के बारे में इसीलिए सुन रहे हैं कि भारत का कोई प्रधानमन्त्री इतने साल बाद नेपाल गए, इतने साल बाद जापान गए, इतने साल बाद मोरोशिस गए । मित्रो हमारे पड़ोसी देशो को पूर्व सरकारों ने कोई  अहमियत नही दी जिसका फायदा चीन ने उठाया और हालात आपके सामने हैं चीन इसी तरह  युध्द का समीकरण पाकिस्तान बंगलादेश को अपनी तरफ मिलाकर बनाएगा। इसके लिये वो दोनों देशो में भारी मात्रा में निवेश और अनुदान दे रहा हैं, साथ ही साथ सस्ती कीमतों पर अत्याधुनिक हथियार भी उपलब्ध करवा रहा हैं। आप समझिये की भारत की तीनो सीमाओ पर एक साथ आक्रमण हो और भारत में भी विद्रोह के स्वर उठने लगे तो क्या दयनीय स्थिति होगी भारत की। नेपाल, भूटान, श्रीलंका आदि देशो से हम सांस्कृतिक विरासत साझा करते हैं यह हमसे युद्ध नही लड़ेंगे परन्तु पूर्ववर्ती सरकारों के नकारत्मक व्यवहार की वजह से हमारा साथ भी नहीं देंगे।


मोदी जी पहले राजनेता हैं जिन्होंने इस स्थिति को भलीभांति समझा, उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह में सभी राष्टाध्यक्षो को बुलाया और सभी देशों का दौरा कर उनके साथ अपने पुराने रिश्तों की बात कर, उन्हें आर्थिक मदद दे अपने पाले में करने की कोशिस की। भूटान, नेपाल को आर्थिक सहायता प्रदान कर उनके विकास में भागीदारी की वचनबद्धता दोहराई, और इन देशो की जनता के साथ हुक्मरानो तक के दिलो में अपनी जगह बना ली। इसके बाद वो चीन को सामरिक मोर्चे पर घेरने की कोशिस कर रहे हैं। जापान, वियतनाम और मंगोलिया ये सभी देश चीन की विस्तारवादी नीति से परेशान हैं, जिसमे से वियतनाम मंगोलिया बेहद गरीब हैं जिसकी वजह से अक्षम हैं और जापान की सेना के पास मैन पावर नही हैं। मोदी जी इन्हें आपस में जोड़कर साझा शक्ति बनाने का प्रयास कर रहे हैं जिससे चीन के ऊपर दबाव बनाया जा सके।

यह हमारी जरूरत हैं अगर हमने ऐसा नहीं किया तो तिब्बत जैसा हाल हमारा होगा और ISIS के खूंखार लड़ाके हमारे यहाँ भी सीरिया और ईराक जैसी खून की होली खेलते नजर आएंगे। इसलिए मोदी जी की विदेश यात्राओ पर सन्देह मत कीजिये वो वह काम कर रहे हैं जिसको पहले की सरकारो ने नहीं किया।

(पोस्ट में कुछ तथ्यात्मक जानकारी विशाल माहेश्वरी द्वारा उपलब्ध करायी गयी हैं)

चिकित्सा सेवाओ में मची लूट !!

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आपने गौर किया, की आजकल हॉस्पिटल में जितने भी बच्चे पैदा होते हैं सभी सिजेरियन होते हैं, ना के बराबर नार्मल डिलेवरी होती हैं। अभी जेस्ट एक मूवी "गब्बर" देखी, उसका एक सीन देखकर मैं सोचने लगी की पिछले पाँच साल में मेरे परचित कितनी महिलाओ को नॉर्मल डिलेवरी हुई और कितने बच्चे सिजेरियन से पैदा हुए? आश्चर्य होगा जानकार की मेरी जानकारी में पिछले पाँच साल में एक भी नार्मल डिलेवरी नहीं हुई सिर्फ उन केसेज को छोड़कर जिनमे घरवाले किसी प्राइवेट नर्सिंग होम का खर्च नहीं उठा सकते हैं। क्या मतलब निकालूँ इसका, की डॉक्टर्स ने इसको धंधा बना लिया हैं या वाकई में आज नार्मल डिलेवरी हो ही नहीं सकती?

दरअसल हम कभी गम्भीरता से सोचते ही नहीं, और मेडिकल प्रोफेशन एक प्रकार की मोनोपॉली चलाता हैं और इन सभी के बीच गजब की एकता होती हैं। पहले से डर के मारे सूखे मरीज को थोड़ा और डराओ, उनके मेडिकल लैग्वेज में कम्प्लिकेशन समझाओ और बाकी का काम मरीज के रिश्तेदार कर डालते हैं की "अरे सभी का तो आजकल ऐसे ही हो रहा हैं, कुछ पैसे के चक्कर में रिस्क क्यों लेना?" और हो गयी डॉक्टरों की चाँदी प्रेगनेंट होने के बाद से लेकर डिलेवरी तक कभी ये टेस्ट करना तो कभी वो टेस्ट करना और फिर सिजेरियन मतलब की जैसे खाने में नमक स्वादानुसार होता हैं वैसे ही एक बच्चा पैदा होने में आपकी औकतानुसार धन लगवा देता हैं। अगर आपके पास पैसा नहीं हैं तो वही बच्चा बिना किसी परेशानी के दुनिया में आ जाता हैं चिकित्सा सेवाओं में यह लूट सिर्फ यही तक सिमित नहीं हैं, मामूली सर्दी जुखाम हो जाए बुखार हो जाए और आप गलती से डॉक्टर के पास चले जाए तो बेमतलब के फ़ालतू टेस्ट के जरिये आपको डराकर आपसे हजारों रूपये के टेस्ट करा लिए जाते हैं। आप और हम सभी ने यह अनुभव किया हैं पर हमने ध्यान नही दिया, आवाज नही उठायी आइये मिलकर आवाज उठाते हैं क्योकि यह भी करप्शन हैं और डॉक्टर कोई भगवान नहीं बल्कि
व्यापारी हैं।

आरएसएस और दुष्प्रचार

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फेसबुक पर जितने भी सो काल्ड सेकुलर जो असल में तुष्टिकरण के नीति के पोषक हैं वो सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिन भर गालिया देते हैं कुछ महानुभाव तो ये भी कहते पाए गए हैं कि “हम यहाँ संघियों को सेकुलर बनाते हैं” और कुछ को संघ साम्प्रदायिक संगठन लगता हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने घर आये लोगो को कभी पानी नहीं पिलाया होगा वो नागपुर रेलवे स्टेशन के बाहर ये उम्मीद
करते हैं की कोई संघी उनको स्टेशन पर मिठाई और पानी लेकर खड़ा मिलेगा, खैर ऐसा ही बहुत सा दुष्प्रचार मैं संघ के बारे में फेसबुक और सोशल मिडिया पर सुनती पढ़ती थी|


संघ को जानने का मेरे पास कोई साधन नहीं था सिवाय इंटरनेट के और इंटरनेट की जानकारी पर मुझे ज्यादा विश्वास नहीं था, और मेरी उत्कंठा लगातार बढती जा रही थी की आखिर आरएसएस हैं क्या? आखिर में मैंने अपने शहर इलाहाबाद के संघ कार्यालय का पता किया और एक दिन अपनी एक सहेली को लेकर संघ कार्यालय पहुँच  गयी वहाँ मौजूद प्रचारक जो समाज सेवा के लिए घर परिवार सभी छोड़कर पूर्णकालिक संगठन के कार्यो को कर रहे हैं उनसे मुलाकात हुई परिचय के बाद बहुत देर तक उनसे संघ के इतिहास और चलाये जा रहे कार्यो के बारे में जानकारी ली, मैं पूरा टाइम उनकी आलोचना करती रही और वो पुरे धैर्य के साथ मेरी बात सुनते और उसका जवाब देते रहे मेरे कटु सवालों के सारे जवाब उन्होंने हँस कर और संतोषप्रद दिए और उन्होंने मुझे संघ की मुख्य पत्र पांचजन्य और बहुत सारी किताबे भी दी हैं पढने को, और मुझे गहन
आश्चर्य हुआ यह जानकार कि संघ १२० से भी अधिक आनुसंगिक संगठनों के जरिये पूरे देश में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

नक्सली इलाको में इनके कार्यकर्ता आदिवासी बच्चो के लिए होस्टल चला रहे हैं उनको मुफ्त शिक्षा कपडे सभी दे रहे हैं शहरी क्षेत्रो में सरस्वती शिशु मंदिरों के जरिये भारतीय संस्कृति के साथ वैज्ञानिक तरीके से लाखो बच्चो को राष्ट्रभक्त बना रहे हैं और देश को एक सभ्य और सुसंस्कृत पीढ़ी तैयार कर रहे हैं अब ये आपको तय करना हैं की आप अपने बच्चो को कान्वेंट में पढ़ाकर नशेडी और व्यभिचारी बनायेंगे जो आपको बुढापे में ओल्ड एज होम पहुचायेगा या इन मंदिरों में पढ़ा कर संस्कारवान बनायेगे| खैर बात हो रही थी संघ के कार्यो पर संघ बिना किसी सरकारी फंड के बहुत सारी समाज सेवा के कार्यो को अंजाम दे रहा हैं| जब कही प्राकृतिक आपदा आती हैं तो सरकारी सहायता के पहले संघ की सहायता पहुँचती हैं इसका नवीनतम उदाहारण इलाहाबाद में रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ में देखने को मिला, बाढ़ और भूकंप में ये हर घर से अनाज नमक मशाले दाल सब्जी एकत्र करके प्रभावित क्षेत्रो में भेजते हैं और किसी की सहायता के पहले उसके धर्म और जाति नहीं पूछते जबकि असम में जब विपदा आई तो कुछ मुस्लिम सांसदों ने ये सहायता शिविरों के बाहर बोर्ड
लगाया की सहायता सिर्फ मुस्लिमो के लिए हैं और इसाई धर्म वाले इस सहायता की आड़ में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन करवाते हैं मगर संघ बिना किसी स्वार्थ के ये सहायता प्रदान करता हैं|उत्तराखण्ड में आये जलजले में भी संघ ने ग्राउंड जीरो पर उतरकर भारतीय सेना के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर बचाव और राहत  कार्य किया।


चीन युद्ध में इनके कार्यो से प्रसन्न होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इनको आरडी परेड में शामिल किया जो अभी तक किसी भी गैर सरकारी सेवा संगठन को नहीं मिला हैं| अगर बात साम्प्रदायिकता की जाए तो मैंने इनका अखबार और किताबे पढ़ी एक भी साम्प्रदायिक बात मुझे नजर नहीं आई उल्टा ये उग्र राष्ट्रवाद की बात करते हैं और प्राणियों में धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते हैं इनके संगठन से हर धर्म के लोग जुड़े हुए हैं ये “वसुधैव कुटुम्बकम “ सर्वे भवन्ति सुखिन जैसे सूत्र से सबको जोड़ने का प्रयास करते हैं अपने किसी भी स्वयंसेवक के उपनाम से ना पुकार कर नाम के आगे जी लगा कर पुकारते हैं और ये सब तो उन्ही को गलत लगेगा जो देशद्रोही होंगे|

“नमस्ते सदा वत्सले मात्र भूमि” इतने पवित्र भाव से धरती को माँ कह कर नमस्कार करने वाले इनको देशद्रोही और वन्देमातरम का विरोध करने वाले देशभक्त लगते हैं| खुद इन्होने कभी भी कोई सेवा का काम नहीं किया होगा मगर ये आरएसएस को कोसते नजर आयेंगे वहाँ हिन्दू तकलीफ में हैं आरएसएस क्या कर रही हैं और ध्यान दीजियेगा मित्रो एक तरफ ये आरएसएस का दुष्प्रचार करके उसकी जड़े भी कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और खुद कुछ करने की अपेक्षा आरएसएस से उम्मीद लगाए बैठे हैं अरे उस संगठन की जितनी क्षमता हैं वह उतना कार्य कर रही हैं और अगर आप चाहते हैं की वह और ज्यादा काम करे तो उससे जुड़े अपना सहयोग दे वह और भी कार्य करेगी, मगर नहीं ये करेंगे तो यहाँ आलोचना कौन करेगा?

दुनिया में शायद ही कोई इस तरह से निस्वार्थ काम करने वाला संगठन होगा। आप सभी से निवेदन हैं की आप लोग भी मेरी तरह सिर्फ एक बार संघ कार्यालय पर जाए उनके कार्यो को बारे में जाने और उनसे पूछे फिर फैसला ले की क्या गलत हैं और क्या सही, और ऐसा मुझे विश्वास हैं की आप उनके बारे में एक बार जान लेंगे तो आप भी उनके मुरीद हो जायेंगे|

जनरल वीके सिंह विवाद और भाजपा प्रवक्ता

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जनरल वी के सिंह और मिडिया के विवाद में सबसे ज्यादा चिंतित करने वाला व्यवहार बीजेपी प्रवक्ताओ का रहा, बीजेपी प्रवक्ता सरकार का पक्ष रखने में हमेशा नाकाम साबित होते हैं। ना इनके पास होमवर्क होता हैं और ना ही सरकार के कार्यो की जानकारी, जिसकी वजह से न्यूज़ चैनेल के दफ्तरों में शर्मनाक समर्पण करते हुए दीखते हैं। यहाँ तक की इनमे आपसी सामजस्य की भी कमी साफ़ तौर पर दृष्ट्रिगोचर होती हैं, सम्बित पात्रा साहब जहाँ टीवी पर यह कहते नजर आते हैं कि जनरल साहब का यह निजी बयान हैं वही दूसरी बीजेपी प्रवक्ता शाजिया इल्मी के अंदर का पत्रकार जाग उठता है। और वो जनरल को गलत ठहराते पत्रकारो की अस्मिता बचाने की बात कहती नजर आती हैं। जबकि आम आदमी के प्रवक्ता पत्रकारो पर भी आक्रमक तरीके से हमला करते हैं।

प्रधानमन्त्री चुनावों के दौरान पत्रकारो की दहाड़कर न्यूज़ ट्रेडर बताया करते थे, और पत्रकार उनके सामने सहमे नजर आते थे। परन्तु आज बीजेपी प्रवक्ता इन्ही न्यूज़ ट्रेडर्स presstitutes के सामने शर्मनाक समर्पण की मुद्रा में हैं। यहाँ तक की बीजेपी का हर प्रवक्ता अलग अलग बात कर रहा हैं इनसे लाख दर्जे अच्छा संजय झा और AAP के प्रवक्ता हैं उनके नेता रंगे हाथ पकड़े जाते, करप्शन के आरोपो से पार्टी घिरी होती हैं फिर भी वो अपनी पार्टी और अपने नेताओ का जबरदस्त डिफेंड करते हैं मिडिया में और बीजेपी प्रवक्ता अपने नेताओ के घिरने पर साथ देने की कौन कहे पल्ला झाड़ लेते हैं।
जनरल साहब को मिडिया के खिलाफ जिस तरह से सोशल मिडिया पर जनसमर्थन मिला उससे भी बीजेपी प्रवक्ता हवा के रुख का अनुमान लगाने में अक्षम रहे, जबकि आम आदमी पार्टी सोशल मिडिया के रुख से यह तय करती हैं कि उन्हें टीवी पर क्या बोलना हैं? बीजेपी प्रवक्ताओ को समझना होगा "एकपक्षीय आदर्शवाद" हमेशा आत्मघाती होता हैं, इसी एकपक्षीय आदर्शवाद के चलते ये 2004 में हारे और इस रवैये के साथ आगे भी इसी तरह हारेंगे।

याद रखिये, टीवी की पहुँच घर घर में हैं जबकि सोशल
मिडिया अभी भी भारत में अधिकतर लोगो के लिए दूर की कौड़ी हैं। आप अगर टीवी पर अपने काम जनता तक नहीं बता पाये, अपने नेताओ को डिफ़ेम होने से नहीं रोक पाये तो अगला चुनाव भी आपके लिए दिल्ली साबित होगा।

और अंतिम बात, यूपी विधानसभा चुनाव में अब बेहद कम वक्त बचा हैं, दूसरी पार्टियो ने कमर कस ली हैं युद्ध में उतरने की पर बीजेपी दूर दूर तक नहीं दिख रही हैं।
विधानसभा में आपको यहाँ मोदी जी के चेहरे पर वोट नहीं मिलेगा, बीजेपी से कोई लोकप्रिय चेहरा आगे करिये और SP के खिलाफ सड़को पर जंग तेज करिये नहीं तो दिल्ली की तरह यहाँ भी कलपना पड़ सकता हैं !!

नारी सशक्तिकरण के अर्थ

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डियर फेमनिस्ट,

कृपया नारी सशक्तिकरण की सही परिभाषा मुझ अबला को बताने का कृपा कीजिये, आपकी जानकारी के लिए मैं अपने बारे में आपको बताना चाहती हूँ कि मेरे घरवालो ने मुझे "मेरी क्षमतानुसार" शिक्षा दिलवाई, खाने पहनने घूमने की मुझे उतनी ही स्वतंत्रता हैं जितना मेरे भाइयो को प्राप्त हैं। और हाँ इश्क वगैरह वाले मामले में भी पकड़े जाने पर जितनी चप्पले मेरे भाई पर तोड़ी जायेगी उतनी ही मुझ पर भी तोड़ी जायेगी। मेरा भाई भी घर से पुरे कपड़े पहनकर बाहर निकलता हैं और मुझे भी पुरे कपड़े ही पहनकर घर से बाहर निकलना पड़ता हैं, हाँ मेरे भाई को घर में पैसे लेने के लिए नाक रगड़नी पड़ती हैं पर मैं आसानी से घरवालो से पैसे ले लेती हूँ। क्या यह मेरे घरवालो का मुझ पर अत्याचार हैं? कृपया ज्ञानवर्धन करे की क्या मेरे घरवाले पुरुष सत्ता की मानसिकता वाले हैं?


मैं उत्सुक हूँ की नारी सशक्तिकरण की सही परिभाषा क्या होगी? क्या नारी की आजादी सही मायने में तभी होगी जब वो "देहमुक्ति" का आंदोलन चलाये? आपके नारी मुक्ति आंदोलनों से प्रतीत होता हैं कि आपके हिसाब से नारी तभी स्वतंत्र हैं जब वो अपने वस्त्र उतारकर प्रदर्शन करे, और अपनी मर्जी के अनुसार अनगिनत पुरुषो के साथ गमन करे! अगर आपके हिसाब से नारी का यही असली सशक्तिकरण तो हैं तन बेचने वाली वैश्या सबसे ज्यादा सशक्त होनी चाहिए। और इस बात की क्या गारन्टी हैं की इस तरह से सशक्त नारी पुरुषो के हाथ की खिलौना भर नहीं रह जायेगी।

कृपया मेरी शंकाए दूर करे।

Written by- Awantika Singh

दीपिका पादुकोण, #MyChoice और हम

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हैरानी की बात हैं ना, इसके पहले दीपिका पादुकोण का वुमेन इम्पावरमेंट "फाइंडिंग फेनी' के टाइम जागा था और आज पीकु के रिलीज के टाइम फिर अन्दर से अंगडाई ले रहा हैं| खैर मैं कहना यह चाहती थी, कि समय के साथ दिन प्रतिदिन मेरी आस्था जस्टिस काटजू सर के प्रति बढ़ती जा रही हैं, कितना सही उन्होंने कहा था की इस देश की 90% जनता मुर्ख हैं गलत नहीं कहा था उन्होंने, यकीन करियेगा हैं |

अब देखिये ना दीपिका पादुकोण कितने शानदार तरीके से अभिनय करके अपने पक्ष में पब्लिसिटी जुटा रही हैं, और हम मुर्ख अपने अपने तरीके से अपने अपने खेमे में लामबंद होकर आपस में लड़ कर उसकी पब्लिसिटी कर रहे हैं|

जबकि हमारे पास और बहुत सारे गम्भीर मुद्दे हैं जिनपर हम सार्थक चर्चा कर सकते हैं और वैसे भी जब बात #MyChoice , "माई लाइफ, माई रुल" पर हैं तो यहाँ आकर सारे तर्क वितर्क खत्म हो जाते हैं| ऐसा सिर्फ दीपिका के साथ नहीं बल्कि हम सभी के साथ हैं| ऐसी परिस्थिति में आपका ऐतराज तभी काबिलेगौर होगा जब किसी की माई चॉइस या रुल आपकी स्वतंत्रता में बाधक हो, और जब ऐसा होता आपको नजर आये तो फिर वो कोई भी क्यों ना हो विरोध की आवाज खड़ी करना आपका हक़ हैं, लेकिन दीपिका की my choice से मुझे नहीं लगता किसी की स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न होती हैं जब तक की वो ऐसे कर्म वो खुलेआम सड़क पर ना करे|

एक तरफ जहाँ लोग दीपिका की नितांत निजी मर्जी की भौडेपन से समर्थन कर रहे हैं तो उसके विरोध में उठने वारे स्वर जो खुद को "संस्कृति रक्षक" समझते हैं, ऐसे घटिया और अभद्र शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं की जिसे भारतीय संस्कृति पढ़कर किसी कुंए में कूदकर आत्महत्या कर लेगी| अरे भाई जब भारतीय संस्कृति के इतने बड़े योद्धा हो तो शब्दों तो कम से कम शब्दों का तो उचित चयन करो ताकि लोग तुम्हारे विरोध को गंभीरता से ले| दूसरी तरफ इतनी "खुली मानसिकता" का समर्थन करने वाले के सामने दो चार द्रिअर्थी जोक या शब्द कह दो तो वो भी संस्कारित हो जाते हैं, भई क्या मजाक बना रखा हैं आपने एक तरफ तो आप "मेरी मर्जी" की वकालत कर रहे हैं दूसरी तरफ दुसरे की मर्जी का सम्मान नहीं कर रहे हैं|

खैर पूरी पोस्ट का लब्बोलुआब मेरी तरफ से ये हैं की दोनों पक्ष के लोग निरे मूर्खे हैं और काटजू सर की 90% जनता को डिफाइन करते हैं|

आखिर में दीपिका पादुकोण से यह कहना चाहुँगी की किसने रोका हैं आपको जिसके साथ जैसे मर्जी करे वैसे रहिये, और आपको तो कोई रोक भी नहीं सकता और आपको ही क्यों किसी को भी कोई नहीं रोक सकता, फिर फ़ालतू का बवाल क्यों? यह आपकी निजी राय हैं पर आप यह हमे क्यों बता रही हैं? अपने तक रखिये ना, और जो मर्जी आये वो करिए बस हमारी स्वतंत्रता की सीमा से परे, अपनी स्वतंत्रता के हद में हमे कोई ऐतराज नहीं, उल्टा हम ताली पीटकर आपके मजे ही लेंगे!!

शादी !!!

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शादी!!

शादी तो किसी घोर "अहिंसावादी" सेकुलर से ही करनी चाहिए और रोज सुबह उठते ही उसको चार लात लगाते हुए कहना चाहिए "क्यों बे अभी तक मुर्दे से शर्त लगा कर सोया पड़ा है चाय क्या तेरा मरा हुआ बाप आकर बनाएगा"।

और अगर कभी हिंसा जैसी वाहियात चीज के बारे में वो सोचे तो तुरंत बोलना चाहिए "फेसबुक और ट्विटर पर तो बड़ी बड़ी बकवास करता है बड़ा अहिंसावादी बनता है चल तेरी पोल वही खोलती हूँ कमीने"

लड़कियों हैं हिम्मत !!

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सुनो बे संस्कृति के ठेकेदारों, और गली छाप शोहदो तुम भी ध्यान देकर सुनना मेरे भरोसे अपनी संस्कृति मत बचाओ पहनूँगी जींस पैंट, क्योकि दम रखती हूँ चिरकुटो और मानसिक रोगियों को लतियाने का, हमें कुछ सलाह देने के पहले तुम टुच्चे लोग भारतीय वेशभूषा अपनाओ।

और हाँ लडकियों अगर तुम भी इनको लतियाने का दम रखती हो तो तुम्हे भी पहनने को आजादी है याद रखना "समरथ को ना कुछ दोष गोसाई"!

लड़कियो के सहारे संस्कृति बचाने की कोशिस!!

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लडकिया शराब पीती हैं सिगरेट पीती हैं देर रात पब में डांस करती हैं और भी बहुत से वर्जित काम करती हैं संस्कृति की तो कोई परवाह ही नही हैं, ना जाने क्या होगा देश का??

मूर्खो क्या संस्कृति बचाने का सारा ठेका लड़कियों ने ले रखा हैं, तुम लोगो के शराब पीकर, सड़क पर महिलाओ को छेड़ने से संस्कृति और सभ्यता में चार चाँद
लगते हैं?

और किस अमेरिका और यूरोप को कोस रहे हो? वो तुमसे आगे ही नहीं, बहुत आगे हैं चाँद से लेकर मंगल तक की दुरी उन्होंने तय की, लाइलाज बीमारियों का निदान खोजा, और तुमसे कही ज्यादा महिलाओ का सम्मान भी करते हैं, पिछले दो सौ वर्षो में उन्होंने कामयाबी की हर सीढ़ी पर कदम रखा हैं और विश्व को अपना कायल बनाया हैं और तुम अभी भी अपने गौरवमयी इतिहास से चिपके अपना वर्तमान अँधेरे में बर्बाद कर रहे हो!!

आखिर आपको क्या परेशानी हैं भारतीय व्यवसायियो से?

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आखिर आपको क्या परेशानी हैं भारतीय
व्यवसायियो से??


यह सवाल मैं उन तमाम लोगो से पूछना चाहती हूँ जो अम्बानी अडानी पर हर चुनाव में कीचड़ उछालते हैं और उनकी आड़ में छिपकर विरोधी राजनैतिक दलो पर अपना कुत्सित हित साधने के लिए हमले करते हैं।

क्या यह जलन हैं?

हाँ यह मामला जलन का ही हैं क्योकि यहाँ सभी धनवान और सफल बनना चाहते हैं पर बिना मेहनत किये और जब नहीं बन पाते हैं तो हर अमीर आदमी को कोसना शुरू कर देते हैं और उन्हें चोर बताते फिरते हैं जबकि देखा जाए तो इस देश के हर नागरिक को "समान अवसर" उपलब्ध थे, अम्बानी अडानी बनने के लिए और जिसने मेहनत की वो उस स्तर तक पहुँचा!

ये आरोप लगाते हैं की उन्हें बैंको से कर्ज दिया जाता हैं, अच्छा आप बताइये बैंक का व्यवसायी को कर्ज देना क्या संविधान के विरुद्ध हैं? और कर्ज देते हैं दान नहीं करते, बैंक दिए हुए कर्ज पर ब्याज लेता हैं और कर्ज
भी उन्ही को देता हैं जिनकी लौटाने की औकात होती हैं। दुनिया का हर देश अपने व्यवसायी वर्ग के लिए कर्ज, अनुदान और दूसरे देशो में व्यवसाय के लिए सम्भावनाये तलाश करता हैं। जार्ज बुश से लेकर बिल क्लिंटन और
अभी ओबामा जितनी बार भी भारत आते हैं अपने साथ अपने देश के व्यवसायिक प्रतिनिधिमण्डल लेकर आते हैं उनके लिए सम्भावनाये खोजते हैं ताकि उनके देश में पैसा आये और उनकी अर्थव्यवस्था मजबूत बने।

और यहाँ भारत में अम्बानी की फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारी का बेटा अम्बानी को चोर बोलता हैं, सरकार से ये लोग रोजगार माँगते हैं, क्या सरकार फैक्ट्री चलाती हैं जो देश के हर बेरोजगार को जॉब देगी, भारत के 70 प्रतिशत लोगो के घर इन्ही व्यवसायी वर्ग की वजह से चूल्हा जलता हैं।

जलना छोडो बराबरी करो, मेहनत
करो क्योकि तुम तरक्की करोगे तो देश
तरक्की करेगा।

(मैं किसी अम्बानी अडानी के खानदान से
नहीं आती, आम मध्यमवर्गीय परिवार से हूँ पर
भारत के हर व्यवसायी के साथ हूँ और उनके
अधिकार के लिए हमेशा कम्युनिस्ट
नक्सलियों को जवाब देने के लिए तैयार हूँ )

AAP की दिल्ली जीत का सच!!

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एक सच यह भी !!

AAP की सोशल मिडिया टीम, बीजेपी से ज्यादा तेज तर्रार और संगठित हैं, उनका विजन क्लियर हैं, उन्हें पता हैं की कैसे प्रोपोगंडा फैलाकर माहौल को अपने पक्ष में बनाना हैं। जब वो सही होते हैं तो उनके पास बेमिसाल अकाट्य तर्क होते हैं, पूरा होमवर्क करके हर सवाल का तर्कपूर्ण जवाब देते हैं और जब वो प्रोपोगंडा फैला रहे होते हैं तो "कीचड़ फेंको और भागो" की नीति अपनाते हैं।

उसके उलट सोशल मिडिया में बीजेपी समर्थक जब सही होते हैं तब भी अपनी बात सही तरीके से रख नहीं पाते, कुछ लोगो को छोड़ दिया जाए तो तर्को के धरातल पर बाकी सभी शून्य नजर आते हैं, और इरिटेट होने पर गाली गलौज करके लोगो को चुप कराना चाहते हैं, हाँ गाली गलौज AAP वाले भी करते हैं पर वो उसको भी अपने हक में इस्तेमाल करके खुद को विक्टिम भी बना लेते हैं।

प्रोपागण्डा फैलाने में बीजेपी समर्थक बच्चो की तरह हैं की इनका प्रोपोगंडा बच्चे भी पकड़ ले। दूसरी सबसे बड़ी कमी की बीजेपी समर्थक AAP वालो के प्रोपोगंडा को तोड़ नहीं पाते सच जानते हुए भी उसे व्यक्त करने में पीछे रह जाते हैं। अब आप देखिये की मोदी जी के सूट की कीमत सिर्फ 12 हजार रूपये थी जो यही भारत में
बना था और गिफ्ट किया हुआ था पर बीजेपी समर्थक इस पर अनर्गल तर्क देते नजर आये, कई तो यह बोलते नजर आये की PM हैं तो 12 लाख का सूट भी नहीं पहन सकते।

दूसरा मामला कालेधन को लेकर था बीजेपी के किसी नेता ने यह कभी नहीं कहा की 15 लाख सबके अकॉउंट में दिए जाएंगे, और शायद आपको जानकारी ना हो पर बीजेपी ने 35 सौ करोड़ काला धन वापस रिकवर कर चुकी हैं और मार्च लास्ट तक 10 हजार करोड़ और वापस लाने वाली हैं पर पुरे चुनाव में इसकी कोई
चर्चा नही हुई ऐसे बहूत से मामले हैं जब हम फेल रहे।

बहुत कम लोग ही फेसबुक पर ऐसे दीखते हैं जो जबरदस्त तरीके से खुद को डिफेंड करते हुए ऐसा पलटवार करते हैं की वैचारिक दुश्मन सामने
पड़ने की अपेक्षा ब्लाक करने में ही अपनी बहादुरी समझता हैं। कई बार मैंने इस तरफ RW वालो का ध्यान खींचने की कोशिस की हैं पर लोग समझने में असफल रहे।

पढ़िए खूब पढ़िए इतिहास पढ़िए, समाचार पढ़िए, लोगो का लिखा पढ़िए समझिये आत्मसात करिये और फिर न्याय धर्म नैतिकता आदि किनारे रखकर लड़िये, याद रखिये महाभारत युद्ध में भी बहुत से धर्म नियम आदि शत्रु को हराने के लिए तोड़े गए थे, आप "अच्छे काम" के लिए थोड़ा धर्म विरुद्ध भी कार्य करेंगे तो भी यह गलत नहीं होगा बस नियत साफ़ होनी चाहिए और लक्ष्य देश का भला होना चाहिए !!

आपकी "जलन" ही हमारी ताकत हैं !!

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-देश की जीडीपी 7.4% पहुँच गयी!!

-घरेलू सामान की मंहगाई दर लगातार घट रही है !!

-35 सौ करोड़ का काला धन रिकवर कर लिया गया, मार्च तक 6500 करोड़ और आ रहा हैं, इस साल कुल तीस हजार करोड़ काला धन वापसी का लक्ष्य रखा गया हैं।

जनधन योजना के तहत देश में गरीबो को मुफ़्त बीमा और पांच हजार की OD की सुविधा भी प्रदान कर दी हैं, बदले में गरीबो ने देश का खजाना लबालब कर दिया हैं
मतलब सकारात्मकता और जमीनी विकास ने अपनी गति पकड़ ली हैं।

और उधर TOI-let पेपर ने PM के कोट का अधिक
मूल्य बताने पर माफ़ी भी मांग ली हैं।

पर आपका क्या? आपको तो मोदी जी के खिलाफ विषवमन से फुरसत नहीं, आपकी उनके प्रति अथाह नफरत और जलन हमे उनके और करीब लाती हैं, रोज सुबह उठने पर अपने खून में "भक्ति लेवल" बढ़ा हुआ पाती हूँ !!

समझिये, क्योकि इसी समझ में आपकी गति हैं !!

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ये कुछ उदाहरण हैं, इनमे छिपे सन्देश को गहराई से
समझने का प्रयास करियेगा।

1- गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले
वर्ष 266 मन्दिरो में चोरी की वारदाते हुई
लेकिन इलेक्ट्रानिक मिडिया की छोड़िये
प्रिंट मिडिया में भी कोई चर्चा नहीं!!

2- 266 किलोग्राम सोना स्वामी पद्मनाभ मन्दिर से गायब हैं, पर कही कोई चर्चा नहीं !!

मगर एक "कान्वेंट स्कूल" में एक चोर आता हैं CCTV
कैमरों की वायर कट करता हैं और 8 हजार रूपये चुराकर भाग जाता हैं।

इलेक्ट्रानिक मिडिया पर यह बड़ी खबर बनती हैं, घण्टों के प्रोग्राम बनाये जाते हैं इसे चर्च पर हमला करार दिया जाता हैं, धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जाती हैं प्रधानमन्त्री से जवाब माँगा जाता हैं।

नवनिर्वाचित दिल्ली के मुख्यमन्त्री श्री केजरीवाल जी, यह मुद्दा शपथ ग्रहण समारोह में उठाते हैं।

और जब स्कूल के "फादर" ने यह बोला की यह कोई
रिलिजियस मसला नहीं, बल्कि सिर्फ चोरी का मामला हैं तो मिडिया "कान्वेंट" शब्द पर जोर देकर चोरी की वारदात कवर कर रही हैं।

समझिये की ये क्या सन्देश देना चाहते हैं,
क्योकि इसी "समझ" में आपकी गति हैं !!

सच्चा स्वराज

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मित्रो इस देश में सच्चा लोकतन्त्र और स्वराज उस दिन
लौट कर आएगा जब सरकार आपके पैदा किये 12 बच्चों को रोटी, कपड़ा, दवा और शिक्षा के
समुचित प्रबन्ध करते हुए उनके बालिग़ होने पर
किसी सरकारी दफ्तर में "पान खाकर थूकने"
की नौकरी देगी, और साल दर साल
पदोन्नति देते हुए वेतनमान
की वृद्धि करती रहेगी। इसके साथ ही सभी के
घरो में फ्री बिजली दो रूपये किलो का चावल
आटा अनवरत विपणन करती रहेगी। वृद्ध होने पर
सरकारी पेंशन, चिकित्सा खर्च
की जिम्मेदारी भी सरकारी तौर पर निर्वहन
हो।

मित्रो, हमे अब ऐसी ही सरकार चुननी हैं
जो उपरोक्त वर्णित स्वराज इस देश में लाने के
लिए प्रतिबद्ध हो, जयहिंद !!