आपने गौर किया, की आजकल हॉस्पिटल में जितने भी बच्चे पैदा होते हैं सभी सिजेरियन होते हैं, ना के बराबर नार्मल डिलेवरी होती हैं। अभी जेस्ट एक मूवी "गब्बर" देखी, उसका एक सीन देखकर मैं सोचने लगी की पिछले पाँच साल में मेरे परचित कितनी महिलाओ को नॉर्मल डिलेवरी हुई और कितने बच्चे सिजेरियन से पैदा हुए? आश्चर्य होगा जानकार की मेरी जानकारी में पिछले पाँच साल में एक भी नार्मल डिलेवरी नहीं हुई सिर्फ उन केसेज को छोड़कर जिनमे घरवाले किसी प्राइवेट नर्सिंग होम का खर्च नहीं उठा सकते हैं। क्या मतलब निकालूँ इसका, की डॉक्टर्स ने इसको धंधा बना लिया हैं या वाकई में आज नार्मल डिलेवरी हो ही नहीं सकती?
दरअसल हम कभी गम्भीरता से सोचते ही नहीं, और मेडिकल प्रोफेशन एक प्रकार की मोनोपॉली चलाता हैं और इन सभी के बीच गजब की एकता होती हैं। पहले से डर के मारे सूखे मरीज को थोड़ा और डराओ, उनके मेडिकल लैग्वेज में कम्प्लिकेशन समझाओ और बाकी का काम मरीज के रिश्तेदार कर डालते हैं की "अरे सभी का तो आजकल ऐसे ही हो रहा हैं, कुछ पैसे के चक्कर में रिस्क क्यों लेना?" और हो गयी डॉक्टरों की चाँदी प्रेगनेंट होने के बाद से लेकर डिलेवरी तक कभी ये टेस्ट करना तो कभी वो टेस्ट करना और फिर सिजेरियन मतलब की जैसे खाने में नमक स्वादानुसार होता हैं वैसे ही एक बच्चा पैदा होने में आपकी औकतानुसार धन लगवा देता हैं। अगर आपके पास पैसा नहीं हैं तो वही बच्चा बिना किसी परेशानी के दुनिया में आ जाता हैं चिकित्सा सेवाओं में यह लूट सिर्फ यही तक सिमित नहीं हैं, मामूली सर्दी जुखाम हो जाए बुखार हो जाए और आप गलती से डॉक्टर के पास चले जाए तो बेमतलब के फ़ालतू टेस्ट के जरिये आपको डराकर आपसे हजारों रूपये के टेस्ट करा लिए जाते हैं। आप और हम सभी ने यह अनुभव किया हैं पर हमने ध्यान नही दिया, आवाज नही उठायी आइये मिलकर आवाज उठाते हैं क्योकि यह भी करप्शन हैं और डॉक्टर कोई भगवान नहीं बल्कि
व्यापारी हैं।
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