मैं पहले भी लिख चुका हूं कि अपनी पत्नी के साथ मैं दांतों के डॉक्टर के
पास गया था और डॉक्टर ने उसे देखने से मना कर दिया था। उन दिनों हम अमेरिका
में थे और एक शाम अचानक पत्नी के दांतों
में दर्द शुरू हुआ। हमने डॉक्टर को फोन किया, डॉक्टर ने फोन पर इमरजंसी
वाली दवाएं बताईं और अगले महीने मिलने का समय दिया।
जिस दिन हमें डॉक्टर से मिलने जाना था, उस दिन सुबह से ही खूब बर्फ गिर रही थी। किसी तरह बर्फ में गाड़ी चलाते हुए हम डॉक्टर तक पहुंचे, तो डॉक्टर ने मेरी पत्नी को देखने से मना कर दिया और कहा कि आप दस मिनट देर से आए हैं, अब दूसरे मरीज़ को बेजवह इंतज़ार करना पड़ेगा।
मैंने बहुत अनुरोध किया, उससे कहा कि आप देख ही रहे हैं कि बाहर कितनी बर्फ गिर रही है, ऐसे में इतनी देर तो स्वाभाविक है। मेरी बात पर डॉक्टर हैरान हो गया। बर्फ गिर रही है, इसलिए देर हो गई? उसने बहुत सधे हुए लहज़े में कहा कि बर्फ तो उसके लिए भी गिर रही थी, पर वो तो समय पर आया।
***
जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था, तब स्कूल के किसी फंक्शन में शहर के महापौर बतौर चीफ गेस्ट आने वाले थे। हम सारे बच्चे धूप में बैठ कर उनका इंतज़ार कर रहे थे। महापौर महोदय सुबह आठ बजे आने वाले थे, हम बारह बजे तक धूप में बैठे रहे। चार घंटे बाद महापौर जी आए, पर उनके चेहरे पर रत्ती भर अफसोस नहीं था कि हम भूखे-प्यासे गर्मी में उनका इंतज़ार करते रहे। उन्होंने एक बार भी अपने देर से आने के लिए हम बच्चों से माफी नहीं मांगी थी।
***
मैं पत्रकारिता में आया। तब राजेश खन्ना दिल्ली से चुनाव लड़ रहे थे। एक बार मुझे उनके साथ उनके प्रचार में रिपोर्टिंग के लिए जाने का मौका मिला। वो अपने समय से कोई तीन घंटे देर से वहां पहुंचे। तब तक राजेश खन्ना का थोड़ा जलवा बचा था, शायद यही कि तब तक फिल्मी कलाकार दर्शकों को साक्षात बहुत कम दिख पाते थे। भीड़ को रोके रहने के लिए कोई कविता पाठ कर रहा था, कोई छुटभैया नेता भाषण दे रहा था और बार-बार अनाउंस हो रहा था कि बस अब आपके चहेते राजेश खन्ना आने ही वाले हैं। मैंने राजेश खन्ना से पूछा भी था कि आपको इस बात का अफसोस नहीं कि इतनी देर से लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं? उन्होंने कहा था कि यहां इंडियन स्टैंडर्ड टाइम चलता है। इतनी देर की तो पब्लिक को आदत ही होती है।
***
इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर अगर लिखने बैठा तो लिखता चला जाऊंगा, कहानी खत्म नहीं होगी। आप भी जानते हैं कि भारत में समय की कीमत लोगों की निगाह में क्या है? जब तक कम्यूटर पर दफ्तर जाने का समय दर्ज होना शुरू नहीं हुआ, मैंने किसी सरकारी अफसर को समय पर दफ्तर जाते नहीं देखा। कई बड़े लोगों की हेकड़ी ही इस बात में होती है कि वो देर से वहां पहुंचें। मैं अपने पत्रकारिता के इतने लंबे करीयर में एक पूरी लिस्ट बना सकता हूं कि कौन कहां टाइम से पहुंचता है, कौन देर से? किसे अपने देर से आने पर शर्मिंदगी महसूस होती है, किसे अकड़ महसूस होती है कि इतनी देर बाद भी लोग उसके इंतज़ार में बैठे रहे।
***
मैं किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ा। देश के ज्यादातर नेताओं, अभिनेताओं से मेरा परिचय है। कांग्रेस, बीजेपी, वामपंथी दलों सबके लिए मैंने रिपोर्टिंग की है। इसलिए आज जो मैं लिखने जा रहा हूं, उसमें किसी तरह की राजनीति तलाशने की प्लीज़ कोशिश मत कीजिएगा। मेरे लिखे को एक पत्रकार, एक चैनल हेड की हैसियत से लिखा मत समझिएगा। आज मेरे लिखे को एक बेहद सामान्य आदमी की सहज टिप्पणी भर मानिएगा।
***
कल मैं अपने दफ्तर की ओर से आयोजित स्वच्छ भारत कार्यक्रम में शामिल हुआ। वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आना था। तय समय के मुताबिक उन्हें शाम साढ़े आठ बजे उस कार्यक्रम में शामिल होना था। मुझे मालूम था कि प्रधानमंत्री सुबह से बिहार दौरे पर गए हैं। कई जगहों पर उनका भाषण था। अब कोई दिन भर भाषण दे, गर्मी और उमस में हज़ारों लाखों लोगों से मिले और फिर सीधे हमारे कार्यक्रम में आना हो, तो उसे कुछ देर तो हो ही जाएगी। मेरे मन में था कि आधा घंटा देर से अगर वो आए, तो कोई ख़ास बात नहीं।
मेरा यकीन कीजिए, घड़ी में आठ बज कर बीस मिनट हुए होंगे, हमें एसपीजी ने अलर्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री आ रहे हैं। और ठीक साढ़े आठ बजे प्रधानमंत्री हमारे सामने थे। आते ही उन्होंने कहा कि सारा दिन भाषण देकर उनका गला बैठ गया है, उन्होंने एक घूंट पानी पिया और कार्यक्रम में शिरकत करने बैठ गए।
मैं उनके सामने बैठा अपनी सोच में डूबा था।
***
आप मुझसे समहत हों, असहमत हों। पर इतना तय है कि इससे पहले मैंने किसी नेता को समय की इस तरह इज्ज़त करते नहीं देखा था। मैं तमाम नेताओं के साथ दौरे पर गया हूं। मैं किसी का नाम नहीं लिख रहा, पर मैंने किसी को समय की इस तरह परवाह करते नहीं देखा। अभिनेताओं में अगर एक अमिताभ बच्चन को छोड़ दूं, तो ज्यादातर नेता और अभिनेता लोगों इंतज़ार कराने में ही अपनी शान समझते हैं।
मैं अपने अनुरोध को दुहरा रहा हूं कि आप मेरी आज की पोस्ट में राजनीति को मत तलाशिएगा। मैंने एक आदमी की तारीफ की है, क्योंकि मैंने उसे समय की इज्ज़त करते हुए अपनी आंखों से देखा है।
***
मां सच कहती थी। जो समय की परवाह करते हैं, समय उन्हीं की परवाह करता है।
#Rishtey
Crtsy-Sanjay Sinha
जिस दिन हमें डॉक्टर से मिलने जाना था, उस दिन सुबह से ही खूब बर्फ गिर रही थी। किसी तरह बर्फ में गाड़ी चलाते हुए हम डॉक्टर तक पहुंचे, तो डॉक्टर ने मेरी पत्नी को देखने से मना कर दिया और कहा कि आप दस मिनट देर से आए हैं, अब दूसरे मरीज़ को बेजवह इंतज़ार करना पड़ेगा।
मैंने बहुत अनुरोध किया, उससे कहा कि आप देख ही रहे हैं कि बाहर कितनी बर्फ गिर रही है, ऐसे में इतनी देर तो स्वाभाविक है। मेरी बात पर डॉक्टर हैरान हो गया। बर्फ गिर रही है, इसलिए देर हो गई? उसने बहुत सधे हुए लहज़े में कहा कि बर्फ तो उसके लिए भी गिर रही थी, पर वो तो समय पर आया।
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जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था, तब स्कूल के किसी फंक्शन में शहर के महापौर बतौर चीफ गेस्ट आने वाले थे। हम सारे बच्चे धूप में बैठ कर उनका इंतज़ार कर रहे थे। महापौर महोदय सुबह आठ बजे आने वाले थे, हम बारह बजे तक धूप में बैठे रहे। चार घंटे बाद महापौर जी आए, पर उनके चेहरे पर रत्ती भर अफसोस नहीं था कि हम भूखे-प्यासे गर्मी में उनका इंतज़ार करते रहे। उन्होंने एक बार भी अपने देर से आने के लिए हम बच्चों से माफी नहीं मांगी थी।
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मैं पत्रकारिता में आया। तब राजेश खन्ना दिल्ली से चुनाव लड़ रहे थे। एक बार मुझे उनके साथ उनके प्रचार में रिपोर्टिंग के लिए जाने का मौका मिला। वो अपने समय से कोई तीन घंटे देर से वहां पहुंचे। तब तक राजेश खन्ना का थोड़ा जलवा बचा था, शायद यही कि तब तक फिल्मी कलाकार दर्शकों को साक्षात बहुत कम दिख पाते थे। भीड़ को रोके रहने के लिए कोई कविता पाठ कर रहा था, कोई छुटभैया नेता भाषण दे रहा था और बार-बार अनाउंस हो रहा था कि बस अब आपके चहेते राजेश खन्ना आने ही वाले हैं। मैंने राजेश खन्ना से पूछा भी था कि आपको इस बात का अफसोस नहीं कि इतनी देर से लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं? उन्होंने कहा था कि यहां इंडियन स्टैंडर्ड टाइम चलता है। इतनी देर की तो पब्लिक को आदत ही होती है।
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इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर अगर लिखने बैठा तो लिखता चला जाऊंगा, कहानी खत्म नहीं होगी। आप भी जानते हैं कि भारत में समय की कीमत लोगों की निगाह में क्या है? जब तक कम्यूटर पर दफ्तर जाने का समय दर्ज होना शुरू नहीं हुआ, मैंने किसी सरकारी अफसर को समय पर दफ्तर जाते नहीं देखा। कई बड़े लोगों की हेकड़ी ही इस बात में होती है कि वो देर से वहां पहुंचें। मैं अपने पत्रकारिता के इतने लंबे करीयर में एक पूरी लिस्ट बना सकता हूं कि कौन कहां टाइम से पहुंचता है, कौन देर से? किसे अपने देर से आने पर शर्मिंदगी महसूस होती है, किसे अकड़ महसूस होती है कि इतनी देर बाद भी लोग उसके इंतज़ार में बैठे रहे।
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मैं किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ा। देश के ज्यादातर नेताओं, अभिनेताओं से मेरा परिचय है। कांग्रेस, बीजेपी, वामपंथी दलों सबके लिए मैंने रिपोर्टिंग की है। इसलिए आज जो मैं लिखने जा रहा हूं, उसमें किसी तरह की राजनीति तलाशने की प्लीज़ कोशिश मत कीजिएगा। मेरे लिखे को एक पत्रकार, एक चैनल हेड की हैसियत से लिखा मत समझिएगा। आज मेरे लिखे को एक बेहद सामान्य आदमी की सहज टिप्पणी भर मानिएगा।
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कल मैं अपने दफ्तर की ओर से आयोजित स्वच्छ भारत कार्यक्रम में शामिल हुआ। वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आना था। तय समय के मुताबिक उन्हें शाम साढ़े आठ बजे उस कार्यक्रम में शामिल होना था। मुझे मालूम था कि प्रधानमंत्री सुबह से बिहार दौरे पर गए हैं। कई जगहों पर उनका भाषण था। अब कोई दिन भर भाषण दे, गर्मी और उमस में हज़ारों लाखों लोगों से मिले और फिर सीधे हमारे कार्यक्रम में आना हो, तो उसे कुछ देर तो हो ही जाएगी। मेरे मन में था कि आधा घंटा देर से अगर वो आए, तो कोई ख़ास बात नहीं।
मेरा यकीन कीजिए, घड़ी में आठ बज कर बीस मिनट हुए होंगे, हमें एसपीजी ने अलर्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री आ रहे हैं। और ठीक साढ़े आठ बजे प्रधानमंत्री हमारे सामने थे। आते ही उन्होंने कहा कि सारा दिन भाषण देकर उनका गला बैठ गया है, उन्होंने एक घूंट पानी पिया और कार्यक्रम में शिरकत करने बैठ गए।
मैं उनके सामने बैठा अपनी सोच में डूबा था।
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आप मुझसे समहत हों, असहमत हों। पर इतना तय है कि इससे पहले मैंने किसी नेता को समय की इस तरह इज्ज़त करते नहीं देखा था। मैं तमाम नेताओं के साथ दौरे पर गया हूं। मैं किसी का नाम नहीं लिख रहा, पर मैंने किसी को समय की इस तरह परवाह करते नहीं देखा। अभिनेताओं में अगर एक अमिताभ बच्चन को छोड़ दूं, तो ज्यादातर नेता और अभिनेता लोगों इंतज़ार कराने में ही अपनी शान समझते हैं।
मैं अपने अनुरोध को दुहरा रहा हूं कि आप मेरी आज की पोस्ट में राजनीति को मत तलाशिएगा। मैंने एक आदमी की तारीफ की है, क्योंकि मैंने उसे समय की इज्ज़त करते हुए अपनी आंखों से देखा है।
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मां सच कहती थी। जो समय की परवाह करते हैं, समय उन्हीं की परवाह करता है।
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