कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी "रंग दे बसंती" फिल्म का नायक एक संवाद बोलता हैं की "कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता हैं" और बनाता कौन हैं उस देश का नागरिक|
पर हम क्या कर रहे हैं सिर्फ सारा दोष दुसरो पर मढ़ रहे हैं और ये मानकर चल रहे हैं की हमारी कोई गलती नहीं हैं, हमें तकलीफ हैं की इस देश में लोग भ्रष्ट्र हैं, हमें तकलीफ हैं की हम विकसित नहीं हैं हमें तकलीफ हैं की सरकार हमें रोजगार उपलब्ध नहीं करवा पा रही हैं ऐसी बहुत सी तकलीफों का रोना हम हर जगह रोते हुए दीखते हैं| दूसरी तरफ सच ये हैं की हम सिर्फ रोते हैं करते कुछ नहीं और अगर कोई करना भी चाहे तो हम उसकी टाँगे खीचने का, उसका मजाक उड़ाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते, अपने इगो को शांत करने के लिए उससे फ़ालतू के सवाल पूछते हैं ताकि वह भटक जाए और फिर वही रोना शुरू कर देते हैं की हम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं|
पहली बात तो वोट देने हमें जाना नहीं होता और जब वोट देने चले जाते हैं तो ये देखते हैं की किसने हमें बेरोजगारी भत्ता, सस्ते राशन और मुफ्त सामान देने की भीख देने की पेशकश की हैं, और अगर यहाँ से भी छूटे तो ये देखने में लग जाते हैं की कौन सा उम्मीदवार मेरी जाति का हैं फिर हम वोट ऐसे ही लोगो को दे आते हैं विकास का मुद्दा गौड़ हो जाता हैं और फिर हम रोते हैं की देश का विकास नहीं हो रहा|
दर्जनों की तादाद में बच्चा पैदा करेंगे, और रोयेंगे की सरकार रोजगार नहीं दे रही खाने को नहीं दे रही, स्वास्थ्य सेवाए नहीं उपलब्ध करवा पा रही मगर अपनी तैयार की हुई फौज नहीं देखेंगे की कितनी भी सुविधाए उपलब्ध करवा दी जाए पर उस फौज के लिए कम ही पड़ेगी|
दो रुपये की पेप्सी और चिप्स के रूप में हवा खरीद कर खायेंगे पर वही देशी आयटम नहीं खायेंगे तो रोजगार कैसे बढेगा, जब विदेशी चीजे ही हम प्रयोग करेंगे तो अपने देश में बना हुआ माल कौन खरीदेगा सरकार को सुविधाए देने के लिए टैक्स कैसे मिलेगा| मगर नहीं सारी गलती तो सरकार की होती हैं हम तो जनता हैं हमारी कोई गलती नहीं, और हमारा देश अच्छा नहीं इसमें रहने लायक नहीं|
पर हम क्या कर रहे हैं सिर्फ सारा दोष दुसरो पर मढ़ रहे हैं और ये मानकर चल रहे हैं की हमारी कोई गलती नहीं हैं, हमें तकलीफ हैं की इस देश में लोग भ्रष्ट्र हैं, हमें तकलीफ हैं की हम विकसित नहीं हैं हमें तकलीफ हैं की सरकार हमें रोजगार उपलब्ध नहीं करवा पा रही हैं ऐसी बहुत सी तकलीफों का रोना हम हर जगह रोते हुए दीखते हैं| दूसरी तरफ सच ये हैं की हम सिर्फ रोते हैं करते कुछ नहीं और अगर कोई करना भी चाहे तो हम उसकी टाँगे खीचने का, उसका मजाक उड़ाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते, अपने इगो को शांत करने के लिए उससे फ़ालतू के सवाल पूछते हैं ताकि वह भटक जाए और फिर वही रोना शुरू कर देते हैं की हम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं|
पहली बात तो वोट देने हमें जाना नहीं होता और जब वोट देने चले जाते हैं तो ये देखते हैं की किसने हमें बेरोजगारी भत्ता, सस्ते राशन और मुफ्त सामान देने की भीख देने की पेशकश की हैं, और अगर यहाँ से भी छूटे तो ये देखने में लग जाते हैं की कौन सा उम्मीदवार मेरी जाति का हैं फिर हम वोट ऐसे ही लोगो को दे आते हैं विकास का मुद्दा गौड़ हो जाता हैं और फिर हम रोते हैं की देश का विकास नहीं हो रहा|
दर्जनों की तादाद में बच्चा पैदा करेंगे, और रोयेंगे की सरकार रोजगार नहीं दे रही खाने को नहीं दे रही, स्वास्थ्य सेवाए नहीं उपलब्ध करवा पा रही मगर अपनी तैयार की हुई फौज नहीं देखेंगे की कितनी भी सुविधाए उपलब्ध करवा दी जाए पर उस फौज के लिए कम ही पड़ेगी|
दो रुपये की पेप्सी और चिप्स के रूप में हवा खरीद कर खायेंगे पर वही देशी आयटम नहीं खायेंगे तो रोजगार कैसे बढेगा, जब विदेशी चीजे ही हम प्रयोग करेंगे तो अपने देश में बना हुआ माल कौन खरीदेगा सरकार को सुविधाए देने के लिए टैक्स कैसे मिलेगा| मगर नहीं सारी गलती तो सरकार की होती हैं हम तो जनता हैं हमारी कोई गलती नहीं, और हमारा देश अच्छा नहीं इसमें रहने लायक नहीं|
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1 comments: (+add yours?)
बढ़िया लिखा है
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