कल रात बाइक स्टंट करने वाले की मौत से कोई अफ़सोस नहीं है वे थे ही गोली मार देने लायक, कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है पर...
दिल्ली पुलिस उस दिन कहाँ थी जिस दिन पाँच हजार सफ़ेद जालीदार टोपी वाले शबे बारात पर बाइक्स से निकल कर लडकियों और महिलाओ के साथ छेड़खानी कर रहे थे? उस दिन पुलिसवालों ने गोली क्यों नहीं चलायी क्यों उनके सामने अपनी नाक रगडती दिख रही थी? क्या वे बाइक राईडर सिर्फ इसलिए मार गिराए गए की वो हिन्दू थे उनकी जान की कोई कीमत नहीं हैं। आखिर एक देश में दो अलग अलग कानून और तरीका क्यों लोगो पर अजमाया जा रहा हैं?
इसी तरह गुजरात पुलिस जो वेलनोन आतंकियों को मारकर गिराती है तो इसके लिए नरेन्द्र मोदी को दोषी बनाया जाता है,आतंकियों को मारने वाले पुलिस वालो को जेल भेजा जाता है जबकि देश की गुप्तचर एजेंसिया इशरत जहां और उसके साथियो को आतंकी करार देती है, उसके लिए तमाम मानवाधिकार वाले छाती पीटकर विलाप करते है क्या वो इसके लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शिला दिक्षित को दोषी ठहराएंगे। सिर्फ बाइक स्टंट करने वाले लडको को जिन पर पुलिस आरोप लगा रही हैं की उन्होंने पुलिस पर पत्थर फेके जबकि दिल्ली की उस सड़क पर कही पत्थर नहीं था सिर्फ पुलिस की गाडी के पास ही दो चार पत्थर दिख रहे थे उसके लिए दिल्ली पुलिस के लोगो को जेल भेजा जाएगा।
अगर एक बार यह मान भी लिया जाए की लडको ने पुलिस पर पत्थर फेके तो क्या पत्थर का जवाब गोली होता है?
क्या आज बटाला हाउस इनकाउन्टर पर घडियाली आँसू बहाने वाले चिरकुट सेकुलर नेता इन लडको की मौत पर आँसू बहाते हुए इनके लिए इन्साफ की मांग करेंगे?
और हाँ चिरकुट सेकुलर हिन्दुओ तुम तो बस यही सोचना की यह घटना तुम्हारे साथ या तुम्हारे बच्चो के साथ नही होगी बंद कर लो अपनी आँखे इस घटना से बिलकुल उस बगुले की तरह जो सामने बिल्ली देखकर अपनी आँखे यह सोचकर बंद कर लेता है कि खतरा अब टल गया।
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