आजादी के बाद देश में करीब 900 जातीय या सामुदायिक नरसंहार हुये हैं

1984 के सिख दंगों को भी नाम नरसंहार का ही दिया गया था और 2002 के गुजरात दंगों को भी नरसंहार ही कहा गया. 1984 के नरसंहार में मारे गये लोगों की संख्या 8000 से ज्यादा थी और गुजरात नरसंहार में मारे गये लोगों की तादाद 2 हजार से ज्यादा. 1984 में देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कहा था कि जब कोई बड़ा वृक्ष गिरता है तो जमीन हिलती ही है और गोधरा कांड के बाद संघ ने खुले तौर पर गुजरात नरसंहार को क्रिया की प्रतिक्रिया करार दिया था. लेकिन 1984 में कभी किसी सांसद ने राजीव गांधी को वीजा ना दिये जाने का सवाल नहीं उठाया और राजीव गांधी ने जो पहली विदेशी यात्रा की वह अमेरिका की ही थी. अमेरिका में उस वक्त राजीव गांधी से कोई सवाल सिख दंगों को लेकर नहीं पूछा गया. तो क्या उस वक्त देश के कानून और जांच एजेंसी पर सांसदों को भरोसा था या फिर तब केन्द्र में भी कांग्रेस की दो तिहाई बहुमत पाई सरकार थी और राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे. नरसंहार को लेकर सांसद कितने संवेदनशील होते हैं और कैसे नरसंहार के कंधे पर सवार होकर सत्ता पाई जाती है, यह त्रिपुरा के निली में हुये 1983 के उस नरसंहार से भी समझा जा सकता है जिसमें दो हजार से ज्यादा मुस्लिमों को मार दिया गया था या फिर मेरठ के हाशिमपुरा में 42 लोगों को पीएसी ने ही गोली मार कर नदी में बहा दिया था. बावजूद इसके दोनों ही मामले आज भी अदालत की चौखट पर ही अटके हुये हैं और इस दौर में सत्ता के सबसे मजबूत दावेदार आरोपी ही रहे और इन आरोपियों ने कई बार अमेरिकी यात्रा की और इन नरसंहारों की अहमियत देश के सांसदों के लिये इतनी ही है कि संसद के भीतर आज भी गाहे-बगाहे प्रश्‍नकाल में ऐसे दर्जनों नरसंहार पर न्याय का सवाल उठाकर या कहें चिल्ला कर कहते हुये सांसद खामोश हो जाते हैं. वैसे आजादी के बाद देश में करीब 900 जातीय या सामुदायिक नरसंहार हुये हैं और संयोग से सभी नरसंहार राजनीतिक मुनाफे घाटे में ही गुम भी हो गये. लेकिन कभी संसद के भीतर यह सवाल नहीं उठा की नरसंहार के आरोपियों को फैसला आने तक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही दूर रखा जाये. उल्टे फैसले आये नहीं और आरोपी संसद तक पहुंच गये. तो क्या संसदीय राजनीति में अंधायुग होने की वजह से ही नरेन्द्र मोदी निशाने पर हैं और अंधायुग है इसलिये दिल्ली में मोदी को अमेरिका का वीजा ना देने का हंगामा मचा है! दूसरी ओर अमेरिका ने कहा कि यदि नरेद्र मोदी वीजा के लिए आवेदन करते हैं तो वह विचार जरूर करेंगे।

Source : dainik jagran

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