बढ़ता हुआ तुष्टिकरण और लगातार होती उपेक्षा मन में विद्रोह पैदा करती हैं, अगर मैं अपने बीते हुए सिर्फ दो वर्षो या अभी बीते हुए सिर्फ दो महीनो का रिव्यू करती हूँ तो मैं अपने विचारो को बिलकुल बदला हुआ पाती स्थिति ये आ गयी है की गुस्सा जो पहले करप्शन और सिस्टम से था आज हिन्दुओ की बढती हुई उपेक्षा से हो गया है। अब शायद एक बार मैं करप्शन को स्वीकार भी कर लूँ की यह लगभग हर देश के सिस्टम में हैं पर अपनी उपेक्षा स्वीकार ही नहीं होती।
आखिर इस देश के लिए हमने क्या नहीं किया आजादी हासिल करने के लिए सबसे ज्यादा बेटे हमने कुर्बान किये, उस आजादी को बरक़रार रखने के लिए अपने भाइयो का खून पानी की तरह हमने बहाए, जिन माथो पर हम तिलक लगा कर अपने भाइयो की लम्बी आयु की प्रार्थना करते थे उनके धडो से उन मस्तको को ही हमने गायब पाया, आजादी के बाद जब देश के पास पैसा नहीं था तो राजपूत राजाओ ने अपने खजाने तक खोल दिए, पर हम आज उसी देश में उपेक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं।
अपने ही देश में दो कानून बनाकर हमारे साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है यहाँ तक की शहीदों को सम्मान देने में भी दो आँख की जा रही हैं कुंडा डीएसपी की मौत पर पचास लाख और पांच नौकरी वही इलाहाबाद में डीएसपी द्रिवेदी की हत्या पर सिर्फ पांच लाख रुपये, बटाला हाउस में मारे गए आतंकवादियों का सम्मान और उनसे बहादुरी से लड़ते हुए मारे गए हुतात्मा मोहन शर्मा का अपमान आखिर हम कैसे बर्दास्त करे?
उनकी गरीब लडकियों को उच्च शिक्षा के लिए वजीफा और हमें ठेंगा आखिर क्यों ये सौतेला व्यवहार हमारे साथ हो रहा हैं?
मन में गुस्सा भरता जा रहा हैं, यह उपेक्षा बर्दास्त के बाहर होती जा रही हैं, उनकी भयानक गलतियों को भी शरारत समझा जा रहा है और हमसे सयंम की उम्मीद लगायी जा रही है, नहीं हैं हम कम्यूनल पर हमें कम्युनल बनने के लिए मजबूर किया जा रहा हैं और मैं भी लगातार खुद को बदलती हुई महसूस किये जा रही हूँ।
आखिर इस देश के लिए हमने क्या नहीं किया आजादी हासिल करने के लिए सबसे ज्यादा बेटे हमने कुर्बान किये, उस आजादी को बरक़रार रखने के लिए अपने भाइयो का खून पानी की तरह हमने बहाए, जिन माथो पर हम तिलक लगा कर अपने भाइयो की लम्बी आयु की प्रार्थना करते थे उनके धडो से उन मस्तको को ही हमने गायब पाया, आजादी के बाद जब देश के पास पैसा नहीं था तो राजपूत राजाओ ने अपने खजाने तक खोल दिए, पर हम आज उसी देश में उपेक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं।
अपने ही देश में दो कानून बनाकर हमारे साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है यहाँ तक की शहीदों को सम्मान देने में भी दो आँख की जा रही हैं कुंडा डीएसपी की मौत पर पचास लाख और पांच नौकरी वही इलाहाबाद में डीएसपी द्रिवेदी की हत्या पर सिर्फ पांच लाख रुपये, बटाला हाउस में मारे गए आतंकवादियों का सम्मान और उनसे बहादुरी से लड़ते हुए मारे गए हुतात्मा मोहन शर्मा का अपमान आखिर हम कैसे बर्दास्त करे?
उनकी गरीब लडकियों को उच्च शिक्षा के लिए वजीफा और हमें ठेंगा आखिर क्यों ये सौतेला व्यवहार हमारे साथ हो रहा हैं?
मन में गुस्सा भरता जा रहा हैं, यह उपेक्षा बर्दास्त के बाहर होती जा रही हैं, उनकी भयानक गलतियों को भी शरारत समझा जा रहा है और हमसे सयंम की उम्मीद लगायी जा रही है, नहीं हैं हम कम्यूनल पर हमें कम्युनल बनने के लिए मजबूर किया जा रहा हैं और मैं भी लगातार खुद को बदलती हुई महसूस किये जा रही हूँ।
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