आखिर भारतीय उद्योगपतियों की गलती क्या हैं ?

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फिर से बकवास शुरू, जाहिल, आलसी, कामचोर,जलनखोरो की ..

कमीनो सिर्फ इतना बताओ की राबर्ट वाड्रा या मोदी जी गौतम अडानी से मिलते हैं तो क्या गलत करते हैं?

क्या गौतम अडानी आतंकवादी हैं ? या कोई अपराधी हैं वो?

अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर आज उन्होंने अपना मुकाम हासिल किया हैं, बेहद गरीबी का दौर उन्होंने देखा. गरीबी की वजह से पढाई पूरी नहीं कर पाए मुबई में जाकर छोटी नौकरी की और अपनी मेहनत और क़ाबलियत से अपना बिजनेस खड़ा किया.

यह वही दौर था जब तुम लोग अपने बाप की कमाई पर ऐयाशी कर रहे थे, मजाक उड़ा रहे थे गौतम अडानी जैसे लडको का जिनके पास पहनने के लिए कपडा तक नहीं होता था.

कैसा माहौल देश का बनाया जा रहा हैं मिडिया द्वारा और निर्लज्ज कमअक्ल लोगो द्वारा, की देश के उद्योगपतियों के खिलाफ ऐसा विष-वमन, अब जो अम्बानी या अदानी से मिलेगा वो भ्रष्ट होगा ... मानसिक बिमारी हो गयी हैं.

साजिश हैं यह, गहरी साजिश .. देश के उद्योगपतियों का मनोबल तोडा जा रहा हैं, अब लोग किसी उद्योगपति से मिलने में डरेंगे, उद्योगपतियों के काम नहीं होंगे, जरा सोचिये वो कैसे अपना बिजनेस इस देश में कर पायेंगे जब देश का राजनैतिक वर्ग उनसे सिर्फ इसलिए नहीं मिलेगा की उनसे मिलने पर उनका वोट बैंक प्रभावित होगा.

और यह सब विदेशी पैसे पर इस देश में हो रहा हैं, क्योकि अम्बानी और अदानी जैसे उद्योगपतियों ने स्वदेशी तकनिकी से देश में उच्चकोटि का सामान बनाना शुरू कर दिया है. जिसका सीधा असर अमेरिका जैसे उत्पादक देश पर पड़ रहा हैं उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा रही हैं इसलिए वो बेहिसाब पैसे खर्च कर रहे हैं भारतीय मिडिया को खरीदने के लिए. नहीं तो भारतीय मिडिया यह बताये की अम्बानी और अदानी ने क्या गलत किया हैं?  क्यों उनसे मिलना अपराध बनाने पर तुली हैं यह बिकाऊ और दलाल मिडिया?

और मूर्खो की तरह खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले लोगो ने अदानी और राबर्ट वाड्रा की फोटो शेयर करना शुरू कर दी? अरे यह प्रश्न क्यों नहीं पूछा जाता की गौतम अडानी पर क्या गंभीर आरोप हैं??

समझो इनकी चाल वरना मिट जाओ, देश बचाओ अपने देशभक्त व्यवसायी लोगो को बचावो और पूरी मजबूती के साथ अपने देश के उद्योगपतियों के साथ खड़े हो जाओ !!

मिसाल

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मुन्नावती कुमारी मिसाल हैं, उनके लिए जो गरीबी के नाम पर शिक्षा से दूर हो जाते हैं। मुन्नावती मजदूरी यानी रेजा का काम करती हैं, लेकिन उन्होंने पीजी संस्कृत में यूनिवर्सिटी टॉप किया है। सत्र 2010-12 में उन्होंने कुल 1600 अंक में से 1046 यानी 65.35 फीसदी अंक लेकर रांची यूनिवर्सिटी में टॉप किया और गोल्ड मेडल पर कब्जा जमा लिया। करीब एक सप्ताह पहले रांची विश्वविद्यालय ने विभिन्न विभागों के टॉपरों की घोषणा की है। उन्हें नवंबर में होने वाले 28वें दीक्षांत समारोह में मेडल दिया जाएगा।मुन्नावती ने बताया कि उनका सपना एमफिल की पढ़ाई कर लेक्चरर बनने का है। इस साल राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) दूंगी और पूरा भरोसा है कि इसमें सफल भी रहूंगी।उनका अब तक का पूरा सफर चुनौतीपूर्ण रहा है। जब मैट्रिक पास किया, तब तीन भाई बेरोजगार थे। मां देव कुंवर देवी किडनी की बीमारी से ग्रस्त। उनका इलाज रांची के करमटोली चौक स्थित डॉ. अशोक कुमार वैद्य से अब भी चल रहा है। घर का गुजारा जैसे-तैसे चल रहा था। इस बीच 2010 में पिता देवी दयाल साहू की मृत्यु हो गई। लेकिन, मुन्नावती ने कभी हिम्मत नहीं हारी। और अब उनकी मेहनत रंग लाई।

मोदी विरोधियो के दोहरे मापदंड ...!!

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जब कोई दो टके का लेखक जिसको कोई नहीं जानता वह कहता हैं कि "मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर देश छोड़ दूँगा"

या कोई अनर्थ-शास्त्री जिसने लोगो का जीवन स्तर उठाने के लिए कुछ ना किया हो सिर्फ किताबी ज्ञान से नोबल पुरस्कार पा गया हो वह लोगो को राय देते हुए फिरता हैं की "मोदी देश के प्रधानमन्त्री बनने की योग्यता नहीं रखते"

बुझी और बेरोजगार पूर्व फ़िल्मी अभिनेत्री जिनके चरित्र तक को भारत की आम जनता संदिग्ध नजरो से देखती हैं वो कहती हैं कि "मोदी की प्रधानमंत्री बनने से देश की छवि को धक्का लगेगा"

तब मोदी विरोधी खुश होकर उन्हें हीरो बनाने पर तुल जाते हैं और जगह जगह उनकी कही गयी बातो का लिंक चेपने लगते हैं ... और बोलते हैं उन्हें अपनी अभिवयक्ति की स्वतन्त्रता हैं

पर अगर कोई सेलेब्रेटी मोदी के पक्ष में बोलता हैं तो उसे ये खलनायक बनाने पर तुल जाते हैं कि उन्हें इस तरह के राजनैतिक विचार सार्वजानिक जीवन में नहीं देना चाहिए यहाँ तक की उस पर कीचड़ उछाल प्रतियोगिता सी चालु हो जाती हैं ...

आखिर ऐसा दोगलापन क्यों ??

की आप जो कहे वही सही हैं, बाकी लोग मुर्ख हैं उन्हें अपना नेता चुनने की तमीज नहीं हैं

अगर ऐसा हैं तो, अपनी घटिया सोच अपने पास रखिये हम मुट्ठी भर तमीजदार विरोधियो के बजाय उस "बदतमीज" जनसैलाब के साथ हैं जो मोदी का समर्थक हैं क्योकि आपके सेकुरिज्ल्म और वामपंथ में हम खुद को असुरक्षित, ठगा हुआ पाते हैं, और खुद को बेरोजगार पाते हैं|

आखिर हम लतखोर क्यों हैं, क्यों जरुरत हैं इस देश की मोदी को ?

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समझ में नहीं आता कि आखिर क्यों हमारे देश के नागरिको के साथ ही विदेशो में अपमानजनक व्यवहार होता हैं??

आखिर क्यों हमारे देश का सामान और दवाये(तत्कालीन मामला हिमालयन दवा कम्पनी) स्वास्थ्य मानको पर खरा ना उतर पाने की वजह से विदेश के रिजेक्ट कर दी जाती हैं?

आखिर क्यों हमारे देश में दुनिया भर का "रिजेक्टेड कूड़ा" बेचा जाता हैं ..??

आखिर क्यों हमारे देश के नागरिक विदेशो में "नस्लीय हिंसा" के शिकार होते हैं??

हैं कोई जवाब ..

हमारे देश की सरकार अपना आत्मविश्वास खो चुकी हैं, अपनी गरिमा का ख्याल नहीं हैं, आत्मविश्वास या आत्मसम्मान किसे कहते हैं यह भूल चुकी हैं..!!

आखिर हम कब तक यूँ लतियाए और अपमानित होते रहेंगे ..??

शर्म तक हम बेच कर खा गए हैं, चिढ होने लगी हैं अब खुद से ...

बस मुझे इसीलिए मोदी चाहिए की वो आये दिल्ली की गद्दी पर और यह बेशर्मी, लतखोरी दूर करके लोगो को यह बताये आत्मसम्मान क्या चीज होती हैं, देश की इज्जत किसे कहते हैं ...

और इन विदेशियो को इनकी असली औकात बताये की अगर हमने अपने बाजार तुम्हारे लिए बंद कर लिए तो तुम्हारी सारी चकाचौध अंधियारे में डूब जायेगी और हाथ में कटोरा आ जाएगा, तुम्हारे यहाँ की जनता बेरोजगार हो जायेगी सारी खुशहाली भुखमरी में बदल जायेगी ...

अब दिल्ली की गद्दी को ऐसे ही शेर की जरुरत हैं जिसकी दहाड़ सिर्फ इस्लामाबाद या बीजिंग तक ही नहीं लन्दन और वार्शिगटन तक सुनाई दे ...

तब जाकर मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र का यह शेर सार्थक होगा "गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की... तख़्त-ए-लन्दन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की"

शहीद वीर मोहनचंद शर्मा जी की पुण्यतिथि पर विशेष

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शहीद वीर मोहनचंद शर्मा जी को भाव भीनी श्रद्धांजलि
आज १९ सितम्बर है, आज ही के दिन दिल्ली में सीरियल विस्फोट करके निर्दोषों का खून बहाने वाले आतंकियों से संघर्ष करते हुए दिल्ली के बटला हाउस में इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा जी ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था .
दिल्ली पुलिस के रणबांकुरे इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा जितने जांबाज थे उतने ही जिंदादिल भी। उनकी जांबाजी के कारण उन्हें सात बार वीरता पुरस्कार और राष्ट्रपति पदक भी मिला। वह मरणोपरांत अशोक चक्र से भी सम्मानित हुए। 23 सितंबर, 1965 को अल्मोड़ा में जन्मे शर्मा 26 जून, 1989 को दिल्ली पुलिस में बतौर सब इंस्पेक्टर भर्ती हुए थे।
1995 में वह बारी से पहले तरक्की पाकर इंस्पेक्टर बने। वह 35 आतंकियों को मार गिराने और 80 से अधिक की गिरफ्तारी के अभियानों में शामिल रहे। उनकी टीम ने 40 से अधिक कुख्यात अपराधियों को भी ढेर किया और सौ से
इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा
इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा
ज्यादा को गिरफ्त में लिया। 19 सितंबर 2008 को बटला मुठभेड़ के दौरान शहीद इंस्पेक्टर मोहनचंद ने जिन बड़े मामलों को सुलझाया उनमें 2000 में लालकिला गोली कांड, 2001 में संसद पर हमला और 2005 में दिल्ली में हुए सीरियल बम धमाके भी शामिल हैं। 2006 में मोहनचंद की टीम ने निजामुद्दीन इलाके में लश्कर के दो आतंकियों को गिरफ्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन आतंकियों की निशानदेही पर लश्कर का ऑपरेशनल चीफ मोहम्मद इकबाल उर्फ अबू हमजा को मुठभेड़ में मार गिराया गया था।
सीजीओ कांप्लेक्स के पास आधा घंटे से भी ज्यादा समय तक चली उस मुठभेड़ में मोहनचंद ने आतंकियों का डटकर मुकाबला किया था। चूंकि शर्मा आतंकियों के खिलाफ खासा सक्रिय रहते थे इसलिए वह आइबी के सीधे संपर्क में रहते थे। उनकी बहादुरी का स्मरण करते हुए दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त वाईएस डडवाल ने कहा, ‘इंस्पेक्टर शर्मा आतंक के खिलाफ लड़ाई में पूरे देश की शान थे। उन्होंने हमेशा आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। बटला हाउस में इंडियन मुजाहिदीन आतंकियों से लोहा लेते समय शहीद हुए मोहनचंद के रूप में देश ने एक जाबांज अफसर खोया। इसकी क्षतिपूर्ति होना संभव नहीं है।’

 नम आँखों से उन्हें शत शत नमन !!!

मोहनचंद  शर्मा अमर रहें

साभार - न्यूज़ वेबसाइट

सेकुलर सरकार का नकाब खीच चूका हैं

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रविशंकर प्रसाद जी पूछ रहे हैं कि "गुजरात पर बोलने वाले ऑपरेशन दंगा पर खामोश क्यों हैं.."

हम भी यही पूछ रहे हैं कि आखिर ये कैसी चुप्पी हैं??

मुझे तो आज से कुछ साल पहले अनिल कपूर की आई फिल्म "नायक" की याद आ रही हैं बड़ी शिद्दत से अमरेश पूरी का जो दंगो के समय मुख्यमंत्री थे फिल्म में उनका बोला हुआ एक एक संवाद याद आ रहा हैं ...

क्या आपको भी याद आ रहा हैं .. और याद आ रहा हैं तो फिर कब तक सोने का नाटक करते रहेंगे, याद रखिये मित्रो दंगो में सिर्फ इंसान मरता हैं... मरती हैं तो सिर्फ इंसानियत, कब तक इनकी कुर्सी के लिए हम अपना घर जलाते रहेंगे ... नकाब खीच चूका हैं रंगमंच का पर्दा उठ चूका हूँ असलियत देखिये, पहचानिए की कौन गुनहगार हैं मासूमो का ....क्यों सुनी हो गयी माँ की कोख ...

अब जाग जाइए बहुत हो गया अब.... देश की तक़दीर आपके हाथ में हैं सही व्यक्ति का चुनाव करिए .. जो देश में विकास की लहर लाये, बेरोजगार के हाथ में रोजगार हो नाकि बेरोजगारी भत्ते की भीख ...

सेकुलर सरकार का कारनामा

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ऑपरेशन दंगा: मुजफ्फरनगर में दंगे पर समाजवादी नेताओं ने कहा था, जो हो रहा है होने दो. समाजवादी नेताओ का दंगे में हाथ, आज तक पर स्टिंग ऑपरेशन में बड़ा खुलासा ...

स्टिंग ऑपरेशन पर तिलमिलाई यूपी सरकार, दो अफसरों के तबादले ..

यह हैं सेकुलर सरकार की असलियत अब करवाओ SIT जांच, अब नहीं छाती पिटी जायेगी, कहाँ गए वो चिरकुट जो दंगो के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे...
आज तक के रिपोर्टर ने पूछा- "मेन रोल मेरे ख्याल से आज़म xxxxx का है, कि उन्होंने pressurise किया."

पुलिस अफसर का जवाब पढ़िए ...

आर एस भगौर, सैकेंड अफसर- "बिल्कुल ठीक है...बिल्किल ठीक है....."

अब भी कुछ कहना बाकी रह गया की इन दंगो के पीछे कौन जिम्मेदार था ...

"27 अगस्त से शुरू हुए दंगे 8 सितंबर तक मुजफ्फरनगर को दहलाते रहे, लेकिन प्रशासन से लेकर सरकार तक, दंगाइयों पर काबू पाने में नाकाम रही. जाहिर तौर पर दंगों की आड़ में नेता अपना अपना फायदा देख रहे थे. मीरापुर थाने के एसएचओ अनिरुद्ध कुमार गौतम के हल्के में भी दंगाइयों ने सड़कों पर मासूमों के मौत के घाट उतारा. और हैरतअंगेज़ बात ये है कि दंगाइयों पर कार्रवाई करने से पुलिस कतराती रही. गौतम मानते हैं कि डीएम एसपी को एक साथ हटाने की वजह से जिला प्रशासन नेतृत्वविहीन हो गया था. गौतम का कहना है कि समाजवादी पार्टी के कुछ नेता डीएम एसपी को कई दिनों से एसपी को हटाने का दबाव बना रहे थे, और उन्हें आखिरकार मौका मिल गया."

यह हैं सेकुलर सरकार का कारनामा ..!!